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उत्तराखंडफीचर्ड

POCSO मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पीड़िता के मुकरने और संदिग्ध साक्ष्यों के आधार पर दोषी की सजा निलंबित

The Hill India News
Last updated: February 12, 2026 2:02 pm
The Hill India News
Published: February 12, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को निलंबित कर दिया है। न्यायालय ने यह आदेश साक्ष्यों की विसंगतियों और पीड़िता के बयानों में आए यू-टर्न को आधार बनाते हुए जारी किया। न्यायमुर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमुर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक अपील विचाराधीन है, तब तक देहरादून की निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश प्रभावी नहीं रहेगा।

Contents
क्या है पूरा मामला?पीड़िता का मुकरना बना ‘टर्निंग पॉइंट’FSL रिपोर्ट और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल‘न्याय के सिद्धांत’ और हाईकोर्ट की टिप्पणीविधिक विशेषज्ञों की राय

क्या है पूरा मामला?

देहरादून स्थित विशेष सत्र न्यायालय ने 31 जुलाई 2024 को एक मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी सुनील को पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत दोषी करार दिया था और सजा सुनाई थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए सुनील ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी। अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने साक्ष्यों के वैज्ञानिक और जमीनी विश्लेषण में चूक की है, जिसके कारण एक निर्दोष व्यक्ति को सजा भुगतनी पड़ रही है।

पीड़िता का मुकरना बना ‘टर्निंग पॉइंट’

उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि इस मामले की मुख्य गवाह, यानी स्वयं पीड़िता, अपने पूर्व के बयानों से पूरी तरह मुकर गई है। अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने बेंच को बताया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि आरोपी सुनील ने उसके साथ किसी भी प्रकार का कोई गलत काम नहीं किया है। इतना ही नहीं, पीड़िता ने आरोपी को पहचानने से भी इनकार कर दिया।

अदालत ने इस पर गौर किया कि जब अभियोजन पक्ष का मुख्य गवाह (Hostile Witness) ही आरोपी के पक्ष में बयान दे रहा हो, तो निचली अदालत द्वारा दी गई कठोर सजा का आधार प्रथम दृष्टया कमजोर नजर आता है। उच्च न्यायालय ने इसे जमानत और सजा के निलंबन का एक ठोस आधार माना।

FSL रिपोर्ट और जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल

राज्य सरकार की ओर से अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट आरोपी के खिलाफ एक पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण है। सरकार का दावा था कि पीड़िता के कपड़ों पर आरोपी का सीमेन पाया गया था। हालांकि, जांच अधिकारी (IO) कुसुम लता पुरोहित के क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) ने इस वैज्ञानिक दावे की विश्वसनीयता को ही कटघरे में खड़ा कर दिया।

खंडपीठ ने पाया कि:

  • साक्ष्यों का अवैध संग्रह: जांच अधिकारी ने जिरह के दौरान यह स्वीकार किया कि उन्होंने घटना के समय पीड़िता द्वारा पहने गए कपड़ों को आधिकारिक तौर पर अपने कब्जे में नहीं लिया था।

  • सुरक्षा और चैन ऑफ कस्टडी: अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि यदि पुलिस ने कपड़े विधिवत जब्त ही नहीं किए थे, तो वे सीलबंद अवस्था में FSL तक कैसे पहुंचे? साक्ष्यों की ‘चैन ऑफ कस्टडी’ (Chain of Custody) टूटने के कारण वैज्ञानिक रिपोर्ट की प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है।

‘न्याय के सिद्धांत’ और हाईकोर्ट की टिप्पणी

उच्च न्यायालय ने माना कि आपराधिक कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक कि संदेह से परे आरोप सिद्ध न हो जाएं। इस मामले में, एक तरफ पीड़िता का मुकरना और दूसरी तरफ जांच प्रक्रिया में रही गंभीर खामियां, आरोपी को लाभ देने के लिए पर्याप्त हैं।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि अपील पर अंतिम निर्णय होने तक आरोपी की सजा को निलंबित रखा जाना न्यायसंगत है। खंडपीठ ने निचली अदालत के रिकॉर्ड का संज्ञान लेते हुए कहा कि साक्ष्यों को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

विधिक विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय जांच एजेंसियों के लिए एक सबक है। पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में जहां सजा का प्रावधान बहुत कड़ा है, वहां जांच की सूक्ष्मता और साक्ष्यों का संरक्षण अत्यंत अनिवार्य है। यदि जांच अधिकारी प्रक्रियात्मक त्रुटियां करते हैं, तो वैज्ञानिक साक्ष्य भी अदालत में अपनी अहमियत खो देते हैं।

देहरादून की निचली अदालत के आदेश पर हाईकोर्ट की रोक ने सुनील के लिए कानूनी राहत के द्वार खोल दिए हैं। अब इस मामले की विस्तृत सुनवाई अपील के माध्यम से जारी रहेगी, लेकिन वर्तमान में हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए सवाल पुलिस की कार्यप्रणाली और अभियोजन की कहानी पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

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