
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य पर नाकेबंदी की चेतावनी और अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाले ईरान द्वारा इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर “टोल” लगाने की चर्चा ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि जब स्वेज नहर, पनामा नहर और बोस्फोरस जलडमरूमध्य जैसे रास्तों से गुजरने पर शुल्क लिया जाता है, तो फिर होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान ऐसा क्यों नहीं कर सकता?
इस सवाल का जवाब अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और इन मार्गों की प्रकृति में छिपा है। दरअसल, दुनिया के समुद्री रास्तों को broadly दो हिस्सों में बांटा जाता है—प्राकृतिक जलडमरूमध्य (Straits) और मानव निर्मित नहरें (Canals)। इन दोनों पर लागू नियम अलग-अलग होते हैं, और यही फर्क ईरान की मांग को विवादित बनाता है।
सबसे पहले नहरों की बात करें। स्वेज नहर, जो भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है, पूरी तरह मिस्र के नियंत्रण में है। यह एक कृत्रिम जलमार्ग है, जिसे इंसानों ने बनाया है और इसकी देखरेख, रखरखाव तथा सुरक्षा का खर्च भी मिस्र ही उठाता है। इसी कारण मिस्र को यहां से गुजरने वाले जहाजों से भारी-भरकम टोल वसूलने का अधिकार है। इसी तरह पनामा नहर भी एक मानव निर्मित मार्ग है, जो अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ता है। पनामा सरकार इसके जरिए अरबों डॉलर की कमाई करती है और जहाजों से ट्रांजिट फीस, स्लॉट बुकिंग और अन्य सेवाओं के नाम पर शुल्क लेती है।
तुर्की का मामला थोड़ा अलग है। बोस्फोरस और डार्डानेल्स जैसे जलडमरूमध्य प्राकृतिक हैं, लेकिन 1936 के मॉन्ट्रो कन्वेंशन के तहत तुर्की को यहां सीमित प्रकार के शुल्क लेने की अनुमति है। ये शुल्क सीधे “टोल” नहीं होते, बल्कि लाइटहाउस, सुरक्षा, और बचाव सेवाओं के लिए लिए जाते हैं। यानी यहां भी पूरी तरह से स्वतंत्र टोल वसूली की अनुमति नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत सीमित अधिकार दिए गए हैं।
अब बात आती है होर्मुज जलडमरूमध्य की, जो फारस की खाड़ी को हिंद महासागर से जोड़ता है और दुनिया की लगभग 20% तेल आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है। यह एक प्राकृतिक जलडमरूमध्य है और यहां लागू होता है UNCLOS यानी संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन। इस कानून के तहत ऐसे सभी जलडमरूमध्यों में “ट्रांजिट पैसेज” का अधिकार होता है, जिसका मतलब है कि किसी भी देश के जहाज बिना रुकावट और बिना शुल्क दिए यहां से गुजर सकते हैं।
UNCLOS साफ कहता है कि कोई भी तटीय देश केवल इस आधार पर शुल्क नहीं ले सकता कि जहाज उसके समुद्री क्षेत्र से गुजर रहा है। हालांकि, वह कुछ विशेष सेवाओं—जैसे पायलटेज (जहाज को रास्ता दिखाना), टग बोट सहायता या आपातकालीन सेवाओं—के लिए शुल्क ले सकता है, लेकिन यह शुल्क सभी देशों के लिए समान होना चाहिए और इसे “टोल” के रूप में नहीं देखा जाता।
यही वजह है कि ईरान का यह प्रस्ताव कि वह होर्मुज से गुजरने वाले तेल पर प्रति बैरल 1 डॉलर का शुल्क लगाएगा, अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ माना जा रहा है। यदि ईरान ऐसा करने की कोशिश करता है, तो इसे वैश्विक स्तर पर चुनौती दी जा सकती है और यह समुद्री व्यापार में बड़े टकराव का कारण बन सकता है।
इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य केवल ईरान के नियंत्रण में नहीं है। इसका एक हिस्सा ओमान के अधिकार क्षेत्र में भी आता है, जिससे यह और भी जटिल हो जाता है। इस कारण कोई भी एक देश इस पर पूर्ण एकाधिकार का दावा नहीं कर सकता।
अगर ईरान जबरन टोल लागू करने की कोशिश करता है, तो इसका सबसे ज्यादा असर खाड़ी देशों—जैसे यूएई, सऊदी अरब और कतर—पर पड़ेगा, जिनकी अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर निर्भर है। इन देशों ने पहले ही साफ कर दिया है कि इस मार्ग पर स्वतंत्र और सुरक्षित आवाजाही उनका अधिकार है और किसी भी तरह की बाधा स्वीकार नहीं की जाएगी।
वैश्विक स्तर पर भी इसका असर गंभीर हो सकता है। तेल की कीमतों में उछाल, सप्लाई चेन में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अस्थिरता जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। यही कारण है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान की इस मांग का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि तुर्की, मिस्र या पनामा की तुलना ईरान से करना पूरी तरह सही नहीं है। जहां नहरें देशों की “आंतरिक संपत्ति” मानी जाती हैं और उन पर टोल लेना वैध है, वहीं प्राकृतिक जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय मार्ग होते हैं, जिन पर सभी देशों का समान अधिकार होता है। इसी कानूनी अंतर के कारण ईरान की होर्मुज पर टोल वसूली की मांग न सिर्फ विवादास्पद है, बल्कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती भी बन सकती है।



