
ऋषिकेश | उत्तराखंड के ऋषिकेश में वन भूमि अतिक्रमण (Forest Land Encroachment) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। शनिवार को अमित ग्राम क्षेत्र में उस समय भारी तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का अनुपालन करने पहुँची वन विभाग की टीम को स्थानीय निवासियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। विरोध इतना तीव्र था कि विभाग को तारबाड़ (Fencing) का काम बीच में ही रोकना पड़ा।
अमित ग्राम गली नंबर 25 बना अखाड़ा
शनिवार सुबह जैसे ही वन विभाग की टीम दलबल के साथ अमित ग्राम की गली नंबर 25 में सर्वेक्षित वन भूमि पर तारबाड़ लगाने पहुँची, वैसे ही बड़ी संख्या में स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक थी, जिन्होंने विभाग की कार्रवाई के सामने मोर्चा संभाल लिया।
प्रदर्शनकारी महिलाओं ने सरकार और वन विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। लोगों का स्पष्ट कहना है कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन वन विभाग के कब्जे में नहीं जाने देंगे। देखते ही देखते मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया और वन विभाग की टीम बेबस नजर आई।
“पांच दशकों की मेहनत का सवाल”: प्रदर्शनकारियों का तर्क
विरोध कर रहे ग्रामीणों का दावा है कि यह जमीन उनकी गाढ़ी कमाई से खरीदी गई है। प्रदर्शनकारियों ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “हम इस भूमि पर पिछले पांच दशकों (50 साल) से अधिक समय से खेती कर रहे हैं। हमारे बुजुर्गों ने इस जमीन को संवारा है। अब अचानक इसे वन भूमि बताकर हमसे छीनने की कोशिश की जा रही है, जिसे हम बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
ग्रामीणों का तर्क है कि उनके पास जमीन से जुड़े दस्तावेज़ हैं और वे वर्षों से यहाँ काबिज हैं, ऐसे में वन विभाग की कार्रवाई उनके जीवन और आजीविका पर सीधा प्रहार है।
सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन और प्रशासनिक दबाव
ऋषिकेश में वन भूमि अतिक्रमण का यह मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि इसकी निगरानी सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) कर रहा है। अदालत ने उत्तराखंड वन विभाग को कड़े निर्देश देते हुए 5 जनवरी तक स्टेटस रिपोर्ट सौंपने का आदेश जारी किया था। इसी समय सीमा के दबाव में वन विभाग जल्द से जल्द चिन्हित भूमि को अपने कब्जे में लेने का प्रयास कर रहा है।
एसडीओ अनिल रावत (SDO Anil Rawat) ने मामले की गंभीरता स्पष्ट करते हुए कहा कि विभाग केवल अदालत के आदेशों का पालन कर रहा है। उन्होंने बताया, “हमने एक दिन पहले ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी और उनसे सहयोग की अपील की थी। उन्हें स्पष्ट कर दिया गया था कि यह कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अधीन है, इसलिए इसमें बाधा डालना न्यायपालिका की अवमानना के समान है।”
इसके बावजूद, शनिवार को हुए विरोध ने प्रशासनिक तैयारियों की पोल खोल दी है। फिलहाल क्षेत्र में भारी पुलिस बल की तैनाती के बावजूद काम ठप पड़ा है।
पहले भी हो चुका है हिंसक प्रदर्शन और पथराव
ऋषिकेश में वन भूमि को खाली कराने का यह अभियान पिछले कई दिनों से विवादों में है।
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27 दिसंबर: सर्वे के दौरान पहली बार लोगों ने विरोध दर्ज कराया था।
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28 दिसंबर: यह विरोध हिंसक रूप ले चुका था। प्रदर्शनकारियों ने न केवल रेल मार्ग अवरुद्ध किया था, बल्कि राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highway) को भी जाम कर दिया था।
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पुलिस पर हमला: उस दौरान उत्तेजित भीड़ ने पुलिस टीम पर पथराव किया था और महिला रेंजर के साथ बदसलूकी की खबरें भी सामने आई थीं।
पुलिस ने इस हिंसा के बाद सरकारी कार्य में बाधा डालने, पथराव करने और बदसलूकी करने के आरोप में कई नामजद और अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।
क्या है आगे की राह?
सुप्रीम कोर्ट की निर्धारित तारीख (5 जनवरी) पास आते देख वन विभाग और जिला प्रशासन के हाथ-पांव फूल रहे हैं। एक ओर अदालत का सख्त आदेश है, तो दूसरी ओर हजारों लोगों का आक्रोश और विस्थापन का डर। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन ने बातचीत के जरिए बीच का रास्ता नहीं निकाला, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी विस्फोटक हो सकती है।
फिलहाल, अमित ग्राम में सन्नाटा तो है, लेकिन यह किसी बड़े तूफान से पहले की शांति लग रही है। वन विभाग के अधिकारी अब उच्चाधिकारियों और शासन से दिशा-निर्देश मांग रहे हैं ताकि कोर्ट में रिपोर्ट पेश करने से पहले जमीनी स्तर पर कुछ ठोस प्रगति दिखाई जा सके।
ऋषिकेश का यह भूमि विवाद अब केवल अतिक्रमण का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और न्यायिक आदेशों के बीच के संघर्ष का प्रतीक बन गया है। जहाँ वन विभाग कानून के डंडे के साथ खड़ा है, वहीं ग्रामीण अपनी ‘अस्तित्व की लड़ाई’ लड़ रहे हैं। अब सबकी नजरें 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में पेश होने वाली रिपोर्ट पर टिकी हैं।



