
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य के सरकारी विभागों और निगमों में अदालती आदेशों की अनदेखी पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। मंगलवार को न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने उत्तराखंड परिवहन निगम (UTC) के प्रबंध निदेशक (MD) के खिलाफ दायर अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हक में दिए गए आदेश का अनुपालन न करना गंभीर विषय है।
मामला 1: परिवहन निगम के रिटायर्ड कर्मियों के हक पर डाका, एमडी से जवाब तलब
उत्तराखंड परिवहन निगम के दर्जनों सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए न्याय की लड़ाई एक नए मोड़ पर पहुँच गई है। लंबे समय से अपने ग्रेच्युटी, पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों (Retiral Benefits) के लिए भटक रहे पूर्व कर्मचारियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने निगम प्रबंधन को आड़े हाथों लिया है।
क्या है पूरा विवाद?
मामले के अनुसार, हीरा लाल एवं अन्य कर्मचारियों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा था कि वे निगम के विभिन्न पदों से सेवानिवृत्त हुए हैं। नियमानुसार, सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद उनके समस्त देयकों का भुगतान होना चाहिए था। लेकिन, निगम ने न केवल उनके भुगतान रोके, बल्कि उनके बकाया देयकों से ‘रिकवरी’ (वसूली) के आदेश भी जारी कर दिए।
कर्मचारियों का तर्क है कि उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय है और बुढ़ापे में जीवन यापन के लिए जमापूंजी का न मिलना उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
कोर्ट का पिछला आदेश और निगम की हठधर्मिता
इससे पूर्व, हाईकोर्ट की एकलपीठ ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए निगम के रिकवरी आदेश पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने निगम को सख्त निर्देश दिए थे कि:
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सभी रिटायर्ड कर्मचारियों के समस्त देयकों का तीन माह के भीतर भुगतान किया जाए।
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जो अवैध कटौतियां की गई हैं, उन्हें ब्याज सहित वापस किया जाए।
इस आदेश को चुनौती देने के लिए परिवहन निगम ने खण्डपीठ में विशेष अपील (Special Appeal) दायर की थी, जिसे खण्डपीठ ने खारिज करते हुए एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखा। बावजूद इसके, एमडी परिवहन निगम ने आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया, जिसके बाद अब कोर्ट ने 4 मई 2026 की तिथि नियत करते हुए एमडी को व्यक्तिगत रूप से जवाब देने को कहा है।
मामला 2: एचएमटी रानीबाग फैक्ट्री बंदी और श्रमिकों का संघर्ष
हाईकोर्ट में आज एक और महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई हुई, जो कुमाऊं की पहचान रही ‘एचएमटी रानीबाग’ फैक्ट्री से जुड़ा है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खण्डपीठ ने एचएमटी कामगार संघ द्वारा दायर 37 अपीलों पर सुनवाई की।
2007 के वेतनमान और VRS का पेंच
17 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार ने एचएमटी रानीबाग को बंद करने की अनुमति दी थी। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने नीतिगत निर्णय लिया था कि फैक्ट्री बंद करने से पहले कर्मचारियों को वर्ष 2007 में निर्धारित वेतनमान के आधार पर VRS (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना) पैकेज दिया जाएगा।
कामगार संघ का आरोप है कि एचएमटी प्रबंधन ने इस महत्वपूर्ण शर्त का उल्लंघन किया और कर्मचारियों को उचित लाभ दिए बिना ही फैक्ट्री के गेट पर ताला जड़ दिया।
अब 25 मार्च पर टिकी निगाहें
पूर्व में एकलपीठ ने श्रमिकों की याचिका को खारिज कर दिया था, जिसे अब खण्डपीठ में चुनौती दी गई है। आज की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से समय मांगे जाने पर कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 25 मार्च 2026 की तारीख तय की है। श्रमिक संघ ने कोर्ट से मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शीघ्र निस्तारण की अपील की है।
न्यायिक सक्रियता और कर्मचारियों की उम्मीदें
उत्तराखंड हाईकोर्ट के ये दोनों फैसले राज्य के हजारों कर्मचारियों के भविष्य से जुड़े हैं। परिवहन निगम के मामले में अवमानना नोटिस (Contempt Notice) जारी होना यह दर्शाता है कि न्यायालय अब प्रशासनिक सुस्ती को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
विशेषज्ञों का मत:
“जब उच्च न्यायालय की खण्डपीठ किसी आदेश की पुष्टि कर देती है, तो विभाग के पास उसे लागू न करने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता। परिवहन निगम द्वारा की जा रही देरी न केवल कानूनी प्रक्रिया का अपमान है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के भी खिलाफ है।”
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट संदेश दिया है कि चाहे वह परिवहन निगम हो या एचएमटी प्रबंधन, नीतिगत निर्णयों और न्यायिक आदेशों का पालन अनिवार्य है। जहाँ एक ओर परिवहन निगम के एमडी को मई में जवाब देना है, वहीं दूसरी ओर एचएमटी के हजारों श्रमिक मार्च के अंत में आने वाले फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
राज्य के इन प्रमुख संस्थानों के विवादों का समाधान न केवल कानूनी जीत होगी, बल्कि यह उन बुजुर्ग कर्मचारियों के लिए भी एक बड़ी राहत होगी जो अपने जीवन भर की कमाई के लिए अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।



