फीचर्डविदेश

संविधान दिवस पर वैश्विक मंच पर भारत का गौरव: यूनेस्को मुख्यालय में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा का भव्य अनावरण

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस अवसर को “भारत के महान राष्ट्रनिर्माता को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मिली उपयुक्त और अत्यंत गौरवपूर्ण श्रद्धांजलि” बताया

नई दिल्ली/पेरिस। संविधान दिवस 2025 भारत के लिए ऐतिहासिक बन गया, जब पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में भारत के संविधान निर्माता, सामाजिक न्याय के प्रखर आवाज और विश्वभर में समानता के प्रतीक डॉ. भीमराव आंबेडकर की एक आवक्ष प्रतिमा का भव्य अनावरण किया गया। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की वैचारिक विरासत को स्थापित करने वाली यह घटना न केवल कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के मूल्यों को वैश्विक पटल पर नए आयाम प्रदान करती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस अवसर को “भारत के महान राष्ट्रनिर्माता को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मिली उपयुक्त और अत्यंत गौरवपूर्ण श्रद्धांजलि” बताया। उन्होंने ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि संविधान दिवस जैसे विशेष अवसर पर यूनेस्को जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थान में आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होना भारत की लोकतांत्रिक परंपरा और संवैधानिक दर्शन की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रमाण है। प्रधानमंत्री ने लिखा, “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचार—समानता, न्याय, मानव अधिकार और सामाजिक समावेशन—आज भी दुनिया भर में करोड़ों लोगों को प्रेरित करते हैं।”


वैश्विक राजनयिक उपस्थिति ने समारोह को बनाया ऐतिहासिक

यूनेस्को मुख्यालय में आयोजित इस अनावरण समारोह में 50 से अधिक देशों के राजदूतों और वरिष्ठ राजनयिकों की उपस्थिति ने इसे एक अत्यंत प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय आयोजन का स्वरूप दिया। कार्यक्रम में यूनेस्को के महानिदेशक खालिद अल एनानी, भारत की फ्रांस स्थित राजदूत जावेद अशरफ, यूनेस्को एक्सपर्ट कमेटी के वरिष्ठ सदस्य और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

महानिदेशक अल एनानी ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा यूनेस्को के उस संकल्प को और मजबूत बनाती है, जो शिक्षा, मानवाधिकार, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय के वैश्विक आदर्शों पर केंद्रित है। उन्होंने कहा, “डॉ. आंबेडकर ने अपने विचारों से न केवल भारत को दिशा दी बल्कि आधुनिक विश्व में समानता और न्याय का ऐसा आधार प्रस्तुत किया, जो आज भी यूनेस्को के मूल उद्देश्यों से गहराई से संगत है।”


कूटनीतिक दृष्टि से बड़ा कदम: भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ को मिला नया आयाम

भारत पिछले एक दशक में वैश्विक मंचों पर अपनी सांस्कृतिक और वैचारिक उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है। महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और अब डॉ. भीमराव आंबेडकर—इन सभी महान व्यक्तित्वों के विचार भारत की सॉफ्ट पावर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
यूनेस्को मुख्यालय में आंबेडकर की प्रतिमा स्थापित होना इस दिशा में एक मील का पत्थर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की “वैल्यू-डिप्लोमेसी” (मूल्य आधारित कूटनीति) को महत्वपूर्ण मजबूती देगा। दुनिया भर में सामाजिक असमानताओं, लोकतांत्रिक चुनौतियों और मानव अधिकारों के सवालों पर डॉ. आंबेडकर का दर्शन आज और भी प्रासंगिक होता जा रहा है।
भारत इस प्रासंगिकता को वैश्विक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है, और यह अनावरण कार्यक्रम उसी लक्ष्य का प्रतीक है।


डॉ. आंबेडकर: भारत से लेकर वैश्विक समाज तक—एक महान विचारक की विरासत

डॉ. आंबेडकर को भारत में संविधान निर्माता, समाज सुधारक और दलितों के अधिकारों के अग्रदूत के रूप में जाना जाता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनका प्रभाव उतना ही व्यापक रहा है।
अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने आर्थिक नीतियों, सामाजिक संरचना, श्रम सुधार और संवैधानिक ढांचे पर जो काम किया, उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देती है।

उनका दर्शन—कि कोई भी समाज तभी प्रगतिशील हो सकता है जब वह अपने सबसे कमजोर व्यक्ति को भी समान अवसर दे—आज वैश्विक मानवाधिकार विमर्श का मूल तत्व है।
आंबेडकर का यह विचार यूनेस्को की उस धुरी से मेल खाता है, जहां शिक्षा, समानता, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से मानव कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।


प्रतिमा का अनावरण: भारत के संविधान की वैश्विक यात्रा का प्रतीक

संविधान दिवस के अवसर पर आयोजित इस समारोह ने भारत के संविधान को भी अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में एक नई पहचान दी है।
भारतीय संविधान को विश्व के सबसे आधुनिक और समावेशी संविधानों में से एक माना जाता है, जिसमें मौलिक अधिकारों, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक संरचना का संतुलित संयोजन है।

भारत के संविधान की धारा-धारा में वह दर्शन है, जो डॉ. आंबेडकर ने सामाजिक वास्तविकताओं और मानवीय गरिमा को आधार बनाकर गढ़ा था।
इसलिए यूनेस्को में उनकी प्रतिमा स्थापित होना न केवल उनके सम्मान का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की वैचारिक यात्रा की भी वैश्विक मान्यता है।


भारतीय समुदाय में उत्साह, अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा

इस आयोजन को लेकर पेरिस, फ्रांस और यूरोपीय देशों में बसे भारतीय समुदाय में उत्साह देखा गया। कई संगठनों ने इसे भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण क्षण बताते हुए कहा कि यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इस घटना को व्यापक रूप से कवर किया और इसे “भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों का अंतरराष्ट्रीय उत्सव” बताया।


भविष्य के लिए क्या संकेत देता है यह आयोजन?

कूटनीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि यह घटना भविष्य में निम्न आयामों को मजबूत करेगी—

  1. भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता
  2. मानवाधिकार और सामाजिक न्याय पर भारत की भूमिका
  3. सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर भारत की सॉफ्ट पावर
  4. विश्व मंच पर संवैधानिक मूल्यों की भारत द्वारा प्रस्तुति

डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा का यूनेस्को में स्थापित होना सिर्फ एक सांस्कृतिक पहल नहीं, बल्कि वैश्विक नीतिगत विमर्श में भारत की बढ़ती प्रासंगिकता का संकेत है।


विश्व समुदाय में भारत की विचारधारा का सम्मान

संविधान दिवस पर डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा का यूनेस्को मुख्यालय में अनावरण दुनिया को यह संदेश देता है कि भारत न केवल अपने लोकतांत्रिक आदर्शों पर गर्व करता है, बल्कि वह इन्हें विश्व समुदाय के साथ साझा करने में अग्रणी भी है।
समाज में समानता, न्याय और गरिमा—ये वो स्तंभ हैं जिन्हें आंबेडकर ने अपने जीवन और विचारों से मजबूत किया। आज इन विचारों को वैश्विक मंच पर एक प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित होते देखना भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि है।

डॉ. आंबेडकर की यह प्रतिमा न सिर्फ भारत की विरासत का प्रतीक है, बल्कि यह उस वैश्विक मान्यता का प्रमाण भी है जो भारत के संवैधानिक मूल्यों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से प्राप्त हो रही है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button