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ट्रंप का ‘टैरिफ वार’: ईरान से किया व्यापर तो अमेरिका को देना होगा 25% दंड, भारत और चीन के लिए बढ़ी मुसीबत

वॉशिंगटन/तेहरान। वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) में एक बार फिर ‘ट्रंप युग’ की आक्रामकता दिखाई देने लगी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चौतरफा घेरने के लिए एक ऐसे आर्थिक हथियार का इस्तेमाल किया है, जिसने दुनिया भर के बाजारों में खलबली मचा दी है। ट्रंप ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि दुनिया का जो भी देश ईरान के साथ व्यापारिक संबंध रखेगा, उसे अमेरिका के साथ व्यापार करने पर 25 प्रतिशत का भारी-भरकम टैरिफ (Tariff) चुकाना होगा।

यह कदम न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने की दिशा में है, बल्कि उन देशों के लिए भी एक कड़ी चेतावनी है जो वॉशिंगटन और तेहरान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रंप का ‘ट्रुथ सोशल’ पर हंटर: “आदेश अंतिम और निर्णायक”

डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी इस आक्रामक नीति का ऐलान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा:

“तुरंत प्रभाव से, इस्लामी गणराज्य ईरान के साथ व्यापार करने वाला कोई भी देश, संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ होने वाले सभी व्यापार पर 25% टैरिफ देगा। यह आदेश अंतिम और निर्णायक है।”

ट्रंप का यह बयान केवल एक व्यापारिक फैसला नहीं, बल्कि ईरान की खामेनेई सरकार के खिलाफ एक सीधा मोर्चा है। यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब ईरान के भीतर मानवाधिकारों के उल्लंघन और विरोध प्रदर्शनों पर हिंसक कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आक्रोश है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान में हालिया प्रदर्शनों के दौरान कम से कम 648 लोग मारे गए हैं और हजारों की गिरफ्तारियां हुई हैं।

सैन्य कार्रवाई की आहट: क्या युद्ध की ओर बढ़ रहा है अमेरिका?

टैरिफ का यह ऐलान केवल आर्थिक दबाव तक सीमित नहीं है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट के हालिया बयानों ने संकेत दिया है कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर हवाई हमले (Air Strikes) जैसे सैन्य विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रहा है। हालांकि, अमेरिका ने कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं।

ईरान के पास ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के जरिए बातचीत का एक विकल्प खुला है। लेविट ने दावा किया कि ईरान सार्वजनिक रूप से जो बयान दे रहा है, वह उसके निजी बातचीत के लहजे से बिल्कुल अलग है, जो संकेत देता है कि अमेरिकी दबाव काम कर रहा है।

भारत पर असर: करोड़ों का दांव और कूटनीतिक चुनौती

ट्रंप के इस फैसले से भारत के सामने एक बड़ी धर्मसंकट की स्थिति पैदा हो गई है। चीन के बाद भारत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और तुर्की ईरान के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल हैं।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में आंकड़े: भारतीय दूतावास (तेहरान) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और ईरान के बीच व्यापारिक संबंध कुछ इस प्रकार हैं:

  • निर्यात (Export): 1.24 अरब डॉलर

  • आयात (Import): 0.44 अरब डॉलर

  • कुल व्यापार: 1.68 अरब डॉलर (लगभग 14,000 – 15,000 करोड़ रुपये)

भारत के लिए चुनौती दोहरी है। एक तरफ चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) जैसी रणनीतिक परियोजना है, जो मध्य एशिया तक भारत की पहुंच के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यदि भारत ईरान के साथ व्यापार जारी रखता है, तो अमेरिका को किए जाने वाले अरबों डॉलर के निर्यात पर 25% का टैरिफ भारतीय कंपनियों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

चीन और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

चीन, जो ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार और व्यापारिक मित्र है, ट्रंप के इस निशाने पर सबसे ऊपर है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस कदम के जरिए चीन को ईरान से दूर करना चाहते हैं। यदि चीन पर 25% का अतिरिक्त टैरिफ लगता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन (Global Supply Chain) बुरी तरह प्रभावित होगी, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाएगा।

ईरान में बढ़ता आंतरिक दबाव

अमेरिका की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (Maximum Pressure) नीति का मुख्य उद्देश्य ईरान की सत्ता के खिलाफ जन-असंतोष को हवा देना है। पहले से ही आर्थिक तंगी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जूझ रही खामेनेई सरकार के लिए अब अपने व्यापारिक मित्रों को बचाना मुश्किल होगा। 648 लोगों की मौत के बाद भड़का आंतरिक विद्रोह और अब अमेरिका की आर्थिक नाकेबंदी, ईरान को बातचीत की मेज पर झुकने के लिए मजबूर कर सकती है।

डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला वैश्विक कूटनीति में ‘जीरो सम गेम’ (Zero Sum Game) जैसा है। या तो देश अमेरिका के साथ व्यापार कर सकते हैं, या ईरान के साथ। भारत जैसे देशों के लिए आने वाले दिन काफी चुनौतीपूर्ण होंगे, जहाँ उन्हें अपने राष्ट्रीय हितों और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा पर चलना होगा।

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