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AK-47 छोड़ 62 की उम्र में थामी कलम: 1 करोड़ के इनामी पूर्व नक्सली कमांडर देवजी ने दी 12वीं की परीक्षा

तेलंगाना के जगित्याल जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने लोगों को चौंकाने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर कर दिया है। कभी जंगलों में AK-47 लेकर घूमने वाला और देश के सबसे बड़े नक्सली चेहरों में शामिल रहा थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी अब शिक्षा के जरिए नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहा है। करीब 44 साल तक माओवादी आंदोलन का हिस्सा रहे 62 वर्षीय देवजी ने बुधवार को इंटरमीडिएट पब्लिक एडवांस्ड सप्लीमेंट्री परीक्षा देकर अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया।

एक समय था जब देवजी का नाम सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में गिना जाता था। उन पर करीब 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और वह प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन के शीर्ष नेताओं में शामिल रहे। लेकिन अब वही देवजी परीक्षा केंद्र में बैठकर 12वीं का तेलुगु पेपर लिखते दिखाई दिए। यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि हिंसा से मुख्यधारा की ओर लौटने की मिसाल बनता नजर आ रहा है।

जानकारी के मुताबिक, देवजी ने जगित्याल जिले के कोरुतला कस्बे स्थित मास्ट्रो जूनियर कॉलेज में सेकेंड ईयर का तेलुगु पेपर दिया। यह परीक्षा तेलंगाना बोर्ड ऑफ इंटरमीडिएट एजुकेशन द्वारा आयोजित सप्लीमेंट्री एग्जाम्स का हिस्सा है, जो 12 मई से 20 मई तक राज्यभर में कराए जा रहे हैं।

देवजी मूल रूप से कोरुतला के अंबेडकर नगर इलाके के रहने वाले हैं। उन्होंने 1983 में इंटरमीडिएट एमपीसी की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन इसी दौरान वह नक्सली आंदोलन से प्रभावित हो गए। धीरे-धीरे उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और माओवादी संगठन से जुड़ गए। वर्ष 1985 में उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा दी थी, लेकिन सेकेंड ईयर के तेलुगु विषय में फेल हो गए थे। इसके बाद वह पूरी तरह से अंडरग्राउंड हो गए और फिर चार दशक तक कभी पढ़ाई की ओर लौटकर नहीं देख पाए।

बताया जाता है कि माओवादी संगठन में देवजी की भूमिका बेहद अहम रही। उन्होंने संगठन में केंद्रीय समिति सदस्य, पोलित ब्यूरो नेता और पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) के सैन्य विंग प्रमुख जैसे बड़े पदों पर काम किया। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, कई राज्यों में हुए माओवादी अभियानों की रणनीति तैयार करने में उनकी अहम भूमिका रही थी। यही वजह थी कि उन पर करोड़ों रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

करीब 44 साल तक जंगलों और गुप्त ठिकानों में जिंदगी बिताने के बाद फरवरी 2026 में देवजी ने तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। आत्मसमर्पण के बाद उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ सामान्य जीवन जीने का फैसला किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी अधूरी शिक्षा पूरी करने की इच्छा भी जाहिर की।

हथियार छोड़ने के बाद देवजी ने घर पर रहकर पढ़ाई शुरू की। खबरों के अनुसार, कोरुतला के अरुणोदय डिग्री कॉलेज की लेक्चरर गंगुला लावण्या ने उन्हें विशेष कोचिंग दी और परीक्षा की तैयारी कराई। लंबे समय बाद किताबों और कॉपियों के बीच लौटना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

परीक्षा केंद्र पर देवजी को देखने वाले कई लोग हैरान रह गए। कभी पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने इस व्यक्ति को अब शांत माहौल में परीक्षा लिखते देखना अपने आप में अलग तस्वीर पेश कर रहा था। परीक्षा के बाद देवजी ने कहा कि वह आगे भी पढ़ाई जारी रखना चाहते हैं और उच्च शिक्षा हासिल कर पूरी तरह समाज की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना समाज के लिए सकारात्मक संदेश देती है। यह बताती है कि चाहे व्यक्ति कितना भी भटक गया हो, यदि वह सही रास्ते पर लौटना चाहे तो उसके लिए नए अवसर हमेशा मौजूद रहते हैं। शिक्षा किसी भी इंसान की जिंदगी बदल सकती है और देवजी का उदाहरण इसी बात को साबित करता है।

तेलंगाना में देवजी की यह कहानी अब चर्चा का विषय बनी हुई है। सोशल मीडिया पर भी लोग इस बदलाव को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कुछ लोग इसे पुनर्वास नीति की सफलता मान रहे हैं तो कुछ इसे इंसानी इच्छाशक्ति की मिसाल बता रहे हैं।

एक दौर में AK-47 उठाने वाले हाथों का अब कलम थामना यह दिखाता है कि जिंदगी में बदलाव कभी भी संभव है। देवजी की कहानी आने वाले समय में उन लोगों के लिए प्रेरणा बन सकती है, जो किसी कारण से अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ चुके हैं या जिंदगी में नई शुरुआत करना चाहते हैं।

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