मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। जून का महीना उद्धव ठाकरे के लिए एक बार फिर राजनीतिक परीक्षा लेकर आया है। वर्ष 2022 में इसी महीने शिवसेना में हुई ऐतिहासिक बगावत ने न केवल पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया था, बल्कि उद्धव ठाकरे की मुख्यमंत्री की कुर्सी भी छीन ली थी। अब चार साल बाद फिर ऐसी चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं। इन अटकलों ने उद्धव ठाकरे खेमे की चिंता बढ़ा दी है और पार्टी नेतृत्व को सक्रिय होने पर मजबूर कर दिया है।
इसी संभावित संकट को देखते हुए दिल्ली में उद्धव ठाकरे गुट ने अपने सभी नौ लोकसभा सांसदों की एक अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक पर पूरे महाराष्ट्र की राजनीति की नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक में सांसदों की मौजूदगी या गैरमौजूदगी से यह साफ हो जाएगा कि पार्टी में असंतोष कितना गहरा है और बगावत की चर्चाओं में कितनी सच्चाई है।
‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चाओं से बढ़ी हलचल
राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ दिनों से “ऑपरेशन टाइगर” की चर्चा तेज है। दावा किया जा रहा है कि शिवसेना (UBT) के छह सांसद पार्टी से अलग होने की तैयारी में हैं। हालांकि उद्धव ठाकरे गुट का कहना है कि जिन छह सांसदों के नाम सामने आ रहे हैं, उनमें से दो सांसद अब भी पार्टी के साथ हैं और उनके जाने की संभावना नहीं है। यदि ऐसा होता है तो दो-तिहाई संख्या पूरी नहीं होगी और दल-बदल कानून के तहत पार्टी टूटने की स्थिति भी नहीं बनेगी।
फिर भी, जिस तरह से कुछ सांसद लगातार पार्टी बैठकों से दूरी बनाए हुए हैं, उससे अटकलों का बाजार गर्म है। आइए जानते हैं उन छह सांसदों के बारे में जिनके नाम कथित बगावत की चर्चाओं में सामने आ रहे हैं।
ओमराजे निंबालकर: उद्धव के करीबी माने जाते रहे नेता
धाराशिव से सांसद ओमराजे निंबालकर लंबे समय से उद्धव ठाकरे के विश्वस्त नेताओं में गिने जाते रहे हैं। वे दिवंगत कांग्रेस नेता पवनराजे निंबालकर के पुत्र हैं और मराठवाड़ा क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। दो बार लोकसभा सांसद रह चुके निंबालकर पहले विधायक भी रह चुके हैं।
हाल ही में मातोश्री में आयोजित बैठक में उनकी अनुपस्थिति ने राजनीतिक चर्चाओं को हवा दे दी। उन्होंने पारिवारिक कारणों का हवाला दिया, लेकिन विपक्षी दलों का दावा है कि कुछ व्यक्तिगत और कानूनी कारणों के चलते वे राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। हालांकि निंबालकर की ओर से किसी संभावित बगावत की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
संजय जाधव: मराठवाड़ा में शिवसेना का मजबूत चेहरा
परभणी से सांसद संजय जाधव शिवसेना के अनुभवी नेताओं में शामिल हैं। वे लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं और मराठवाड़ा में पार्टी का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। संगठनात्मक स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत रही है और वे लंबे समय तक उद्धव ठाकरे के भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं।
पिछले कुछ समय से वे पार्टी गतिविधियों में कम सक्रिय दिखाई दिए हैं। कई महत्वपूर्ण बैठकों में उनकी गैरमौजूदगी ने उनके भविष्य को लेकर सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जाधव कोई बड़ा फैसला लेते हैं तो उसका असर मराठवाड़ा की राजनीति पर पड़ सकता है।
संजय देशमुख: विदर्भ की राजनीति का बड़ा नाम
यवतमाल-वाशिम क्षेत्र से जुड़े संजय देशमुख को विदर्भ की राजनीति में प्रभावशाली नेता माना जाता है। वे दो बार निर्दलीय विधायक रह चुके हैं और महाराष्ट्र सरकार में खेल मंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं।
देशमुख को जमीनी राजनीति का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। हाल के दिनों में उनके रुख को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आई हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि वे शिवसेना (UBT) से दूरी बनाते हैं तो विदर्भ में पार्टी की स्थिति कमजोर हो सकती है।
नागेश पाटिल: पहली बार सांसद बने, लेकिन बढ़ी राजनीतिक चर्चाएं
हिंगोली से सांसद नागेश पाटिल पहली बार लोकसभा पहुंचे हैं। वे पहले महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं और अपने क्षेत्र में मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क रखते हैं।
नागेश पाटिल को हमेशा उद्धव ठाकरे का समर्थक माना गया, लेकिन हालिया बैठकों से उनकी दूरी ने अटकलों को जन्म दिया है। पार्टी नेतृत्व उनके संपर्क में बताया जा रहा है और उन्हें मनाने की कोशिशें भी जारी हैं। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि उनका फैसला भविष्य की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।
भाऊसाहेब वाकचौरे: पहले भी बदल चुके हैं राजनीतिक पाला
शिरडी से सांसद भाऊसाहेब वाकचौरे का नाम भी संभावित बागियों की सूची में शामिल किया जा रहा है। वे पहले भी राजनीतिक दल बदलने के कारण चर्चा में रह चुके हैं। सरकारी सेवा से राजनीति में आए वाकचौरे प्रशासनिक अनुभव रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं।
सूत्रों के अनुसार वे पिछले कुछ समय से पार्टी की बैठकों से दूरी बनाए हुए हैं। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन उनकी राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजर बनी हुई है।
संजय दीना पाटिल: मुंबई की राजनीति का चर्चित चेहरा
मुंबई की राजनीति में संजय दीना पाटिल एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में थे और बाद में शिवसेना में शामिल हुए। दो बार सांसद रह चुके पाटिल को महत्वाकांक्षी नेता माना जाता है।
उनका राजनीतिक अनुभव और मुंबई में प्रभाव उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है। हाल के दिनों में उनके रुख को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं सामने आई हैं। हालांकि उन्होंने भी अभी तक किसी संभावित राजनीतिक बदलाव को लेकर खुलकर कुछ नहीं कहा है।
क्या फिर दोहराएगा 2022 जैसा घटनाक्रम?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान स्थिति की तुलना सीधे 2022 की बगावत से करना जल्दबाजी होगी। उस समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 40 से अधिक विधायक अलग हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप महाराष्ट्र की सत्ता बदल गई थी। इस बार मामला लोकसभा सांसदों का है और अभी तक किसी भी सांसद ने सार्वजनिक रूप से पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है।
फिर भी, लगातार बैठकों से दूरी और राजनीतिक गतिविधियों को लेकर उठ रहे सवालों ने उद्धव ठाकरे खेमे की चिंता बढ़ा दी है। यदि छह सांसद वास्तव में अलग होते हैं तो यह शिवसेना (UBT) के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। वहीं यदि पार्टी नेतृत्व उन्हें साथ बनाए रखने में सफल रहता है तो यह उद्धव ठाकरे की राजनीतिक पकड़ का बड़ा संदेश होगा।
बैठक पर टिकीं महाराष्ट्र की निगाहें
दिल्ली में बुलाई गई बैठक को इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पार्टी की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है। कौन सांसद बैठक में पहुंचता है और कौन अनुपस्थित रहता है, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की पैनी नजर है।
फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चाओं और अटकलों का दौर जारी है। लेकिन इतना तय है कि जून का महीना एक बार फिर उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी के लिए बेहद अहम साबित होने जा रहा है। आने वाले दिनों में होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम न केवल शिवसेना (UBT) बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा भी तय कर सकते हैं।
