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उत्तराखंड में वनाग्नि का बढ़ता संकट: गढ़वाल मंडल में रिकॉर्ड आग की घटनाएं, बारिश से मिली अस्थायी राहत

The Hill India News
Last updated: May 1, 2026 5:38 am
The Hill India News
Published: May 1, 2026
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इस साल वनाग्नि ने समय से पहले ही विकराल रूप लेना शुरू कर दिया है। खासकर गढ़वाल मंडल में जंगलों में लगी आग ने वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। हर वर्ष 15 फरवरी से 15 जून तक चलने वाला फॉरेस्ट फायर सीजन इस बार अप्रैल महीने में ही बेहद खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया। लगातार बढ़ती गर्मी, शुष्क मौसम और जंगलों में जमा सूखी पत्तियों ने आग को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभाई है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 29 अप्रैल तक गढ़वाल क्षेत्र में वनाग्नि की 145 से अधिक घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें करीब 96.08 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो गया।

इस बार की वनाग्नि ने पिछले वर्षों के रिकॉर्ड भी तोड़ दिए हैं। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, बीते वर्ष की तुलना में इस बार लगभग 40 प्रतिशत अधिक जंगल प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन और मानवीय लापरवाही का संयुक्त परिणाम मान रहे हैं। पहाड़ों में बढ़ता तापमान और नमी की कमी जंगलों को बेहद संवेदनशील बना रही है, जिससे छोटी सी चिंगारी भी बड़े हादसे में बदल रही है।

गढ़वाल मंडल इस समय वनाग्नि का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक ही यहां 100 से अधिक आग की घटनाएं सामने आ चुकी थीं। बदरीनाथ वन प्रभाग सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है, जहां 41 घटनाएं दर्ज की गईं और लगभग 65 हेक्टेयर जंगल जल गए। वहीं रुद्रप्रयाग वन प्रभाग में कुल 30 घटनाएं सामने आईं, जिनमें 10 आरक्षित वन क्षेत्रों और 20 सिविल वनों में आग लगी। वन विभाग के अनुसार कुल 81 घटनाएं आरक्षित वन क्षेत्रों में और 64 घटनाएं सिविल वनों में हुई हैं।

वनाग्नि का असर केवल पेड़ों और हरियाली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। जंगलों में आग लगने से कई वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। जानवर अपनी सुरक्षा के लिए आबादी वाले क्षेत्रों की ओर भागने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ गया है। कई ग्रामीण इलाकों में लोगों ने जंगलों से निकलकर गांवों की ओर आते जंगली जानवरों को देखा है, जिससे स्थानीय लोगों में डर का माहौल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में फैल रही आग का सबसे बड़ा कारण सूखी घास, चीड़ की पत्तियां और लंबे समय तक बारिश का न होना है। इसके अलावा कई बार पर्यटकों या स्थानीय लोगों की लापरवाही भी आग की वजह बनती है। जंगलों में जलती बीड़ी-सिगरेट फेंकना, कूड़ा जलाना और अवैध गतिविधियां भी आग को बढ़ावा देती हैं। लगातार बढ़ते तापमान ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है।

वनाग्नि का प्रभाव अब वायु गुणवत्ता पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। पहाड़ों की स्वच्छ और ठंडी हवा धुएं और प्रदूषण से प्रभावित हो रही है। कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। आग से निकलने वाला धुआं और ब्लैक कार्बन वातावरण में मिलकर तापमान को और बढ़ा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार ब्लैक कार्बन हिमालयी ग्लेशियरों के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है। जब यह कण बर्फ पर जमते हैं तो सूरज की गर्मी अधिक मात्रा में अवशोषित होती है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघलने लगते हैं। इसका असर भविष्य में जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सामने आ सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी वनाग्नि को लेकर चिंता जताई है। धुएं के कारण सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। बुजुर्गों, बच्चों और अस्थमा के मरीजों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। कई क्षेत्रों में लोगों को आंखों में जलन, सांस लेने में दिक्कत और एलर्जी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

हालांकि, प्रदेश के कई हिस्सों में हुई हालिया बारिश ने फिलहाल राहत जरूर दी है। हल्की और मध्यम बारिश के कारण जंगलों में आग के फैलाव में कमी आई है और तापमान में भी गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विभाग का अनुमान है कि आने वाले कुछ दिनों तक प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रुक-रुक कर बारिश हो सकती है, जिससे वनाग्नि पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी। लेकिन विशेषज्ञ इसे केवल अस्थायी राहत मान रहे हैं। उनका कहना है कि जैसे ही मौसम फिर से शुष्क होगा, आग की घटनाएं दोबारा बढ़ सकती हैं।

वन विभाग और प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है। कई स्थानों पर विशेष टीमें तैनात की गई हैं जो आग लगने की सूचना मिलते ही तुरंत मौके पर पहुंच रही हैं। सीसीएफ वन अग्नि सुशांत पटनायक ने बताया कि इस वर्ष तापमान में तेजी से वृद्धि और लंबे समय तक शुष्क मौसम रहने के कारण वनाग्नि की घटनाएं बढ़ी हैं। उन्होंने कहा कि विभाग लगातार अलर्ट मोड में है और बड़ी आग की घटनाओं को रिकॉर्ड समय में नियंत्रित किया गया है।

उन्होंने लोगों से भी सहयोग की अपील की है। उनका कहना है कि जंगलों को बचाने के लिए आम नागरिकों की भागीदारी बेहद जरूरी है। यदि लोग सतर्क रहें और जंगलों में आग फैलाने वाली गतिविधियों से बचें तो बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है।

उत्तराखंड में बढ़ती वनाग्नि की घटनाएं आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह संकट पर्यावरण, वन्यजीवों और मानव जीवन के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। सरकार, वन विभाग और आम जनता को मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान खोजने की आवश्यकता है, ताकि हिमालय की हरियाली और प्राकृतिक संतुलन को सुरक्षित रखा जा सके।

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