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तमिलनाडु की राजनीति में थलापति विजय का ‘ब्लॉकबस्टर’: आखिर वो क्या कर गए, जो रजनीकांत और कमल हासन नहीं कर पाए?

The Hill India News
Last updated: May 5, 2026 3:53 am
The Hill India News
Published: May 5, 2026
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तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राज्य में डीएमके और एआईएडीएमके का ऐसा दबदबा रहा कि किसी तीसरे विकल्प की कल्पना तक मुश्किल मानी जाती थी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में जो हुआ, उसने तमिलनाडु की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया। साउथ सिनेमा के सुपरस्टार थलापति विजय ने अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कझगम’ (TVK) के जरिए ऐसा राजनीतिक धमाका किया, जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। विजय की पार्टी ने न केवल शानदार प्रदर्शन किया, बल्कि कई राजनीतिक दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए खुद को राज्य की सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित कर दिया।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर विजय ने ऐसा क्या किया, जो उनसे पहले राजनीति में उतरे रजनीकांत और कमल हासन नहीं कर पाए? आखिर क्यों जनता ने विजय को गंभीरता से लिया, जबकि अन्य सुपरस्टार राजनीतिक मैदान में टिक नहीं सके? इसके पीछे कई बड़े कारण हैं, जिन्होंने विजय को एक सफल राजनीतिक चेहरा बना दिया।

तमिलनाडु में फिल्म सितारों का राजनीति में आना कोई नई बात नहीं है। एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और जयललिता जैसे सितारों ने फिल्मी लोकप्रियता को राजनीतिक ताकत में बदला और मुख्यमंत्री तक बने। लेकिन बाद के दौर में यह फॉर्मूला कमजोर पड़ता दिखा। रजनीकांत और कमल हासन जैसे बड़े नाम राजनीति में उतरे, लेकिन जनता का भरोसा पूरी तरह जीतने में असफल रहे। जबकि विजय ने अपने पहले ही चुनाव में ऐसा प्रभाव छोड़ा कि द्रविड़ राजनीति की दशकों पुरानी दीवारें हिल गईं।

विजय की सबसे बड़ी ताकत उनका ‘क्लियर मैसेज’ रहा। आमतौर पर जनता फिल्म सितारों को राजनीति में गंभीरता से नहीं लेती। लोगों को लगता है कि अभिनेता राजनीति को केवल लोकप्रियता बढ़ाने का माध्यम बनाते हैं और जनता की समस्याओं पर फुल टाइम नेताओं जैसी गंभीरता नहीं दिखा पाएंगे। विजय इस मानसिकता को अच्छी तरह समझते थे। यही कारण है कि उन्होंने राजनीति में उतरने से पहले एक ऐसा फैसला लिया, जिसने लोगों की सोच बदल दी।

विजय ने साफ ऐलान किया कि वह फिल्मों से दूरी बनाकर पूरी तरह राजनीति को समय देंगे। करीब 30 साल के फिल्मी करियर और करोड़ों की कमाई को दांव पर लगाकर राजनीति में उतरना लोगों को यह संदेश देने में सफल रहा कि वह ‘टाइम पास पॉलिटिक्स’ करने नहीं आए हैं। जनता को लगा कि विजय राजनीति को करियर नहीं, मिशन की तरह देख रहे हैं। यही वजह रही कि युवाओं से लेकर मध्यम वर्ग तक, लोगों ने उन्हें गंभीर नेता के रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया।

इसके उलट रजनीकांत की राजनीति में स्पष्टता की कमी दिखाई दी। उन्होंने लंबे समय तक राजनीति में आने के संकेत दिए, लेकिन कभी पूरी मजबूती से मैदान में नहीं उतरे। लोग यह समझ ही नहीं पाए कि रजनीकांत फिल्मों को ज्यादा महत्व देंगे या राजनीति को। एक दशक तक अटकलों का दौर चला, फिर उन्होंने पार्टी बनाने का संकेत दिया और आखिरकार चुनावी लड़ाई शुरू होने से पहले ही पीछे हट गए। इससे जनता के बीच यह संदेश गया कि रजनीकांत राजनीति में लंबी रेस के खिलाड़ी नहीं हैं।

रजनीकांत की लोकप्रियता बेहद विशाल थी। उनकी फिल्मों का क्रेज सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं, पूरे देश में दिखाई देता था। लेकिन राजनीति में केवल स्टारडम काफी नहीं होता। मतदाता यह देखना चाहते हैं कि नेता जनता के मुद्दों के लिए कितना समर्पित है। रजनीकांत इस भरोसे को मजबूत नहीं कर पाए।

कमल हासन ने जरूर राजनीति को लेकर गंभीरता दिखाई। उन्होंने ‘मक्कल नीधि मय्यम’ (MNM) बनाई और चुनाव भी लड़े। लेकिन उनकी राजनीति शहरी इलाकों तक सीमित रह गई। उनकी पार्टी को पढ़े-लिखे और शहरी वर्ग का कुछ समर्थन मिला, लेकिन ग्रामीण तमिलनाडु में वह प्रभाव नहीं बना पाए। उनकी छवि एक बुद्धिजीवी नेता की थी, लेकिन बड़े जनाधार वाले जननेता की नहीं बन सकी।

विजय ने यहां सबसे बड़ा दांव खेला। उन्होंने शुरुआत से ही खुद को द्रविड़ दलों से अलग दिखाया। टीवीके ने साफ कर दिया कि वह न डीएमके के साथ जाएगी और न एआईएडीएमके के साथ गठबंधन करेगी। इस फैसले ने विजय को एक ‘स्वच्छ और स्वतंत्र विकल्प’ के रूप में पेश किया। जनता को लगा कि वह पुरानी राजनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि नई राजनीति की शुरुआत करना चाहते हैं।

विजय ने भ्रष्टाचार विरोधी छवि बनाने पर भी खास ध्यान दिया। उन्होंने अपने भाषणों में बेरोजगारी, युवाओं की परेशानियां, शिक्षा, महंगाई और प्रशासनिक भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इससे युवा मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

सोशल मीडिया भी विजय की सफलता का बड़ा कारण बना। विजय के फैंस लंबे समय से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बेहद सक्रिय रहे हैं। उनकी फिल्मों के संवाद, भाषण और राजनीतिक संदेश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते रहे। विजय ने इस ताकत को राजनीतिक अभियान में बदल दिया। उनकी रैलियों और भाषणों के वीडियो लाखों लोगों तक पहुंचे। खास बात यह रही कि उन्होंने युवाओं की भाषा में संवाद किया।

राजनीति में उम्र भी एक बड़ा फैक्टर साबित हुई। जब रजनीकांत राजनीति में सक्रिय हुए, तब उनकी उम्र 70 साल से ज्यादा थी। कमल हासन भी 65 साल पार कर चुके थे। जबकि विजय अपेक्षाकृत युवा नेता के रूप में सामने आए। 51 वर्षीय विजय को नई पीढ़ी का प्रतिनिधि माना गया। तमिलनाडु में 18 से 39 वर्ष के मतदाताओं की संख्या काफी ज्यादा है। यही वर्ग सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है और बदलाव की राजनीति को समर्थन देता है।

विजय की लोकप्रियता सिर्फ स्टारडम तक सीमित नहीं रही। उन्होंने धीरे-धीरे अपने राजनीतिक संकेत भी देने शुरू कर दिए थे। 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर उनकी प्रतिक्रिया को राजनीतिक रुख के रूप में देखा गया। इसके बाद फिल्म रिलीज के दौरान भी वह कई बार सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी करते दिखाई दिए। इससे जनता को लगा कि विजय केवल अभिनेता नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच रखने वाले व्यक्ति भी हैं।

विजय का संगठनात्मक ढांचा भी मजबूत रहा। उनके फैन क्लब पहले से ही पूरे तमिलनाडु में फैले हुए थे। इन फैन क्लबों को उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल दिया। यही वजह रही कि टीवीके बहुत कम समय में गांव-गांव तक पहुंच बनाने में सफल रही। विजय के समर्थकों ने सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक लगातार प्रचार किया।

सबसे अहम बात यह रही कि विजय ने लोगों को उम्मीद दी। तमिलनाडु की जनता लंबे समय से दो प्रमुख द्रविड़ दलों के बीच राजनीति देख रही थी। ऐसे में एक नए चेहरे और नए विकल्प को लेकर उत्सुकता थी। विजय ने खुद को उसी विकल्प के रूप में पेश किया।

उनकी सभाओं में भारी भीड़ उमड़ी, लेकिन यह भीड़ केवल फिल्मी दीवानगी नहीं थी। लोगों को लगने लगा कि विजय वास्तव में राजनीति बदलना चाहते हैं। यही अंतर उन्हें रजनीकांत और कमल हासन से अलग बनाता है।

तमिलनाडु की राजनीति में विजय की यह सफलता केवल एक चुनावी जीत नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राज्य की राजनीति में नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। अब यह साफ हो चुका है कि विजय केवल सुपरस्टार नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक खिलाड़ी बन चुके हैं। आने वाले वर्षों में उनकी राजनीति किस दिशा में जाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि उन्होंने वह कर दिखाया है, जो लंबे समय तक तमिलनाडु की राजनीति में असंभव माना जाता था।

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