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वैश्विक ईंधन संकट के बीच उत्तराखंड में ‘गैस पाइपलाइन’ की रफ्तार तेज, अप्रैल तक 1.5 लाख घरों में जलेगी पीएनजी की लौ

देहरादून। मध्य पूर्व में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी युद्ध की तपिश अब भारतीय रसोई घरों के प्रबंधन को बदलने जा रही है। वैश्विक स्तर पर ईंधन और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने के बाद केंद्र सरकार के निर्देशों पर उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘पाइप नेचुरल गैस’ (PNG) के विस्तार का अभियान तेज कर दिया है। राज्य के खाद्य आपूर्ति विभाग ने स्पष्ट किया है कि आगामी अप्रैल महीने तक प्रदेश में उत्तराखंड में पीएनजी कनेक्शन धारकों की संख्या को डेढ़ लाख के पार पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।

ईंधन आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक अस्थिरता ने भारत जैसे देशों को घरेलू संसाधनों और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर किया है। भारत में लगभग 30 से 35 प्रतिशत गैस का उत्पादन स्थानीय स्तर पर होता है। ऐसे में एलपीजी (LPG) सिलेंडरों पर निर्भरता कम करने के लिए पीएनजी को एक सशक्त विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

खाद्य आपूर्ति विभाग के सचिव आनंद स्वरूप के अनुसार, “पीएनजी न केवल सुरक्षित और सस्ती है, बल्कि यह लॉजिस्टिक्स के दबाव को भी कम करती है। हमारा लक्ष्य एलपीजी के बढ़ते बोझ को कम कर हर घर तक सीधे पाइपलाइन से गैस पहुँचाना है।”

पांच दिग्गज कंपनियां संभाल रही हैं मोर्चा

उत्तराखंड के दुर्गम भौगोलिक परिवेश और शहरी क्षेत्रों में गैस ग्रिड बिछाने के लिए शासन ने पांच प्रमुख कंपनियों को मैदान में उतारा है। इन कंपनियों को आवश्यक सभी वैधानिक अनुमतियां (Permissions) जारी कर दी गई हैं:

  1. गेल गैस लिमिटेड (GAIL Gas Limited)

  2. हरिद्वार नेचुरल गैस प्राइवेट लिमिटेड (HNGPL)

  3. इंडियन ऑयल-अदानी गैस प्राइवेट लिमिटेड (IOAGPL)

  4. हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL)

  5. गैसोनेट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड

इन कंपनियों के साथ विभाग की अब तक दो दौर की उच्च स्तरीय बैठकें हो चुकी हैं, जिसमें तकनीकी बाधाओं और पाइपलाइन विस्तार में आ रही दिक्कतों का समाधान निकाला गया है।

चारधाम यात्रा मार्ग पर ‘क्लस्टर मॉडल’ से मिलेगी गैस

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की कठिन बनावट को देखते हुए विभाग ने एक अभिनव ‘क्लस्टर आधारित मॉडल’ तैयार किया है। सचिव आनंद स्वरूप ने जानकारी दी कि हर जगह लंबी पाइपलाइन बिछाना व्यावहारिक नहीं है। ऐसे में विशेषकर चारधाम यात्रा मार्ग और पहाड़ी बस्तियों में क्लस्टर बनाकर पीएनजी कनेक्शन दिए जाएंगे।

इस तकनीक के तहत एक निश्चित दायरे में गैस का छोटा भंडार (Storage) बनाया जाएगा, जहाँ से छोटे पाइप नेटवर्क के जरिए आसपास के घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को गैस सप्लाई की जाएगी। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना दुर्गम क्षेत्रों में भी स्वच्छ ईंधन पहुँचाया जा सकेगा।

सड़कों की मरम्मत और वित्तीय पेंच: सरकार का सख्त रुख

परियोजना की राह में एक बड़ी बाधा सड़कों की खुदाई को लेकर आ रही थी। पीएनजी कंपनियां चाहती थीं कि पाइपलाइन बिछाने के लिए खोदी गई सड़कों की मरम्मत का खर्च संबंधित विभाग वहन करे। हालांकि, शासन ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाया है।

बैठक के दौरान कंपनियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि यदि वे पाइपलाइन के लिए सड़क काटते हैं, तो उन्हें बहाली (Restoration) के लिए निर्धारित शुल्क जमा करना होगा। सचिव ने दो टूक शब्दों में कहा, “उत्तराखंड इतना संपन्न राज्य नहीं है कि निजी कंपनियों द्वारा किए गए गड्ढों को भरने का खर्च वहन करे। कंपनियों को बुनियादी ढांचे के नुकसान की जिम्मेदारी खुद लेनी होगी।”

अधर में लटके कनेक्शन जल्द होंगे ‘एक्टिव’

देहरादून समेत कई जिलों में पाइपलाइन बिछने के बावजूद अभी तक गैस सप्लाई शुरू न होने पर जनता में नाराजगी थी। इस पर कंपनियों ने तर्क दिया था कि ग्राहकों की संख्या (Connection Density) कम होने के कारण लाइन को चार्ज नहीं किया गया है। विभाग ने अब निर्देश दिए हैं कि जहाँ भी बुनियादी ढांचा तैयार है, वहां प्राथमिकता के आधार पर नए कनेक्शन दिए जाएं और सप्लाई बहाल की जाए।

उत्तराखंड में पीएनजी कनेक्शन की यह मुहिम न केवल गृहणियों को भारी-भरकम सिलेंडर से मुक्ति दिलाएगी, बल्कि यह राज्य की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए भी एक ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाली है।

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