नई दिल्ली: UPI पेमेंट को लेकर देशभर में चल रही बहस अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI पेमेंट पर Merchant Discount Rate (MDR) लागू करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है। अदालत ने फिलहाल इस व्यवस्था पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन केंद्र सरकार समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सबसे अहम बात यह रही कि सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि आखिर यह रकम फीस है, टैक्स है या कुछ और? मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। अदालत ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और संबंधित UPI समिति को नोटिस जारी किया है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने 15 सितंबर को UPI के चुनिंदा Person-to-Merchant (P2M) लेनदेन पर MDR व्यवस्था की घोषणा की थी। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक ₹2,000 तक के UPI लेनदेन पर MDR नहीं लगाया जाएगा, जबकि ₹2,000 से अधिक के पात्र मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू करने की व्यवस्था की गई है। यह नया ढांचा 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होने की बात कही गई है।
याचिका में क्या दी गई दलील?
सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका अधिवक्ता अंजन दत्ता की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में केंद्र की ओर से जारी संबंधित अधिसूचना और 15 सितंबर को घोषित MDR फ्रेमवर्क को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया है कि इस तरह का शुल्क लागू करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद नहीं है।
याचिका में अदालत से इस व्यवस्था को रद्द करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि सरकार द्वारा लाई गई इस व्यवस्था की कानूनी प्रकृति क्या है और इसके लिए किस प्रावधान के तहत शुल्क वसूली का रास्ता तैयार किया गया है।
अदालत ने रोक लगाने से किया इनकार
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल MDR व्यवस्था पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए मामले पर उनका जवाब मांगा है। जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया गया है।
इसका मतलब यह है कि फिलहाल अदालत ने MDR व्यवस्था को रद्द या स्थगित नहीं किया है। अब केंद्र सरकार, RBI, NPCI और संबंधित UPI समिति को अदालत के सवालों और याचिका में उठाए गए कानूनी मुद्दों पर अपना पक्ष रखना होगा।
क्या आम UPI यूजर से वसूला जाएगा पैसा?
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल आम लोगों के लिए यही है कि क्या ₹2,000 से अधिक UPI पेमेंट करने पर सीधे उनकी जेब से अतिरिक्त पैसा कटेगा?
सरकार और NPCI की ओर से अब तक स्पष्ट किया गया है कि MDR टैक्स, सेस या सरचार्ज नहीं है, बल्कि भुगतान व्यवस्था से जुड़ा मर्चेंट-साइड प्रोसेसिंग चार्ज है। सरकार ने यह भी कहा है कि ग्राहक से सीधे यह शुल्क वसूलने का प्रावधान नहीं है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा है कि निर्धारित MDR ग्राहकों पर नहीं डाला जाएगा और यह भुगतान इकोसिस्टम के संबंधित पक्षों द्वारा वहन किया जाएगा।
वहीं, NPCI ने स्पष्ट किया है कि ₹2,000 तक के UPI मर्चेंट पेमेंट पर MDR नहीं लगेगा और इस वजह से इन लेनदेन पर MDR से जुड़ा अतिरिक्त GST प्रभाव भी नहीं होगा।
क्यों महत्वपूर्ण है सुप्रीम कोर्ट का सवाल?
सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल कि “यह फीस है, टैक्स है या कुछ और?” पूरे विवाद के कानूनी पक्ष को सामने लाता है। क्योंकि किसी भी प्रकार की सरकारी वसूली की प्रकृति और उसका कानूनी आधार महत्वपूर्ण होता है। अब अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि MDR व्यवस्था किस कानूनी ढांचे के तहत लाई गई है और इससे जुड़े अधिकार एवं दायित्व क्या हैं।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि MDR भुगतान इकोसिस्टम से जुड़ा शुल्क है और इसका उद्देश्य डिजिटल पेमेंट सिस्टम से जुड़े खर्चों तथा भुगतान नेटवर्क के संचालन को समर्थन देना है। सरकार और NPCI ने यह भी कहा है कि इसका असर सभी UPI लेनदेन पर नहीं पड़ेगा।
₹2,000 की सीमा क्यों चर्चा में है?
नई व्यवस्था में ₹2,000 की सीमा अहम है। सरकार ने ₹2,000 तक के UPI भुगतान को शुल्क से बाहर रखा है, जबकि इससे अधिक के पात्र मर्चेंट पेमेंट पर MDR लागू होगा। Person-to-Person यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले सामान्य UPI ट्रांसफर भी इस MDR व्यवस्था से अलग रखे गए हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट में आगे की सुनवाई के दौरान इस व्यवस्था के कानूनी आधार, शुल्क की प्रकृति और इसके लागू होने से जुड़े सवालों पर सरकार तथा अन्य संबंधित संस्थाओं का जवाब सामने आएगा।
फिलहाल अदालत ने MDR पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन केंद्र समेत संबंधित पक्षों से जवाब मांगकर इस पूरे मामले की कानूनी पड़ताल का रास्ता खोल दिया है। अब चार सप्ताह के भीतर दाखिल होने वाले जवाब यह स्पष्ट करने में अहम होंगे कि ₹2,000 से ऊपर के कमर्शियल UPI पेमेंट पर प्रस्तावित MDR को किस कानूनी आधार पर लागू किया गया है।
