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नेपाल में 100 रुपये से ज्यादा सामान पर टैक्स लगाने की योजना पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, सीमावर्ती लोगों को बड़ी राहत

भारत-नेपाल सीमा पर रोजमर्रा की खरीदारी करने वाले लाखों लोगों के लिए नेपाल के सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। अदालत ने नेपाल सरकार के उस विवादित फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत भारत से नेपाल ले जाए जाने वाले 100 रुपये से अधिक कीमत के सामान पर कस्टम ड्यूटी वसूलने की तैयारी की जा रही थी। इस फैसले के बाद सीमा से जुड़े इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों ने राहत की सांस ली है, क्योंकि उनकी दैनिक जरूरतें दोनों देशों के बाजारों पर काफी हद तक निर्भर करती हैं।

नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की संयुक्त पीठ, जिसमें जस्टिस हरि प्रसाद फुयाल और जस्टिस टेक प्रसाद ढुंगाना शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सरकार को फिलहाल इस नियम को लागू न करने का निर्देश दिया। अदालत ने प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रिपरिषद, वित्त मंत्रालय और अन्य संबंधित सरकारी एजेंसियों को साफ आदेश दिया है कि अगली सुनवाई या अंतिम फैसला आने तक 100 रुपये से अधिक कीमत वाले सामान पर कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं लगाया जाएगा।

दरअसल, नेपाल सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव पिछले कुछ समय से विवादों में था। सीमावर्ती जिलों में रहने वाले लोगों का कहना था कि वे रोजमर्रा की जरूरतों जैसे खाद्य सामग्री, कपड़े, दवाइयां और घरेलू सामान खरीदने के लिए अक्सर भारतीय बाजारों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में यदि छोटी-छोटी खरीदारी पर भी टैक्स लगाया जाता, तो आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ता।

इस फैसले के खिलाफ नेपाल में कई सामाजिक संगठनों, व्यापारियों और अधिवक्ताओं ने आवाज उठाई थी। अधिवक्ता अमितेश पंडित, आकाश महतो, सुयोगी सिंह और प्रशांत बिक्रम शाह ने सरकार की नीति को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी कि सरकार का यह फैसला नेपाल के ‘भंसार ऐन’ यानी सीमा शुल्क अधिनियम, 2081 के प्रावधानों के खिलाफ है।

याचिका में कहा गया कि कानून में पहले से ही आम नागरिकों को कुछ सीमा तक टैक्स छूट और रियायत देने का प्रावधान मौजूद है। ऐसे में सरकार द्वारा 100 रुपये से अधिक के सामान पर टैक्स लगाने का निर्णय न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह आम जनता के हितों के भी खिलाफ है। अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में इन दलीलों को गंभीर माना और तत्काल प्रभाव से नीति पर रोक लगाने का आदेश दे दिया।

इस मामले ने नेपाल की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महंगाई और आर्थिक दबाव के दौर में इस तरह के फैसले जनता पर अतिरिक्त बोझ डालने वाले हैं। वहीं, सरकार का पक्ष यह रहा कि सीमा पार से आने वाले सामानों पर नियंत्रण और राजस्व बढ़ाने के लिए यह कदम जरूरी था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल यह नीति लागू नहीं हो पाएगी। सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का कहना है कि यदि यह नियम लागू हो जाता, तो सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ता। भारत-नेपाल सीमा खुली होने के कारण दोनों देशों के नागरिक वर्षों से छोटी दूरी की खरीदारी करते रहे हैं और इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी जुड़ी हुई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह फैसला सिर्फ टैक्स से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह आम नागरिकों के अधिकारों और सरकार की नीतियों के बीच संतुलन बनाने का भी संकेत देता है। अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि सरकार की यह योजना भविष्य में लागू होगी या पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी।

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