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पौड़ी में फिर गूंजी चीख: खेतों में चारा लेने गए बुजुर्ग को गुलदार ने बनाया निवाला; वन विभाग के खिलाफ फूटा ग्रामीणों का गुस्सा

पौड़ी: उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है। गुलदार, बाघ और भालू के बढ़ते आतंक ने पहाड़ों के शांत जनजीवन को पूरी तरह से खौफ के साए में धकेल दिया है। ताजा और बेहद दर्दनाक मामला पौड़ी गढ़वाल जिले के पौड़ी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले कमन्द गांव से सामने आया है। यहाँ एक बार फिर नरभक्षी हो चुके गुलदार ने घात लगाकर एक बुजुर्ग ग्रामीण को अपना निवाला बना लिया।

इस रोंगटे खड़े कर देने वाले पौड़ी गुलदार हमला कमन्द गांव मामले के बाद से पूरे इलाके में न सिर्फ सनसनी फैल गई है, बल्कि स्थानीय वन विभाग की कार्यप्रणाली के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। घटना की सूचना मिलते ही गांव में मातम छा गया है और डरे-सहमे ग्रामीण अब शाम ढलने से पहले ही अपने घरों के किवाड़ बंद करने को मजबूर हैं।


खेतों की तरफ गए थे मोहन चंद्र, वापस लौटी सिर्फ खौफनाक खबर

घटनाक्रम के अनुसार, पौड़ी ब्लॉक के कमन्द गांव के निवासी 62 वर्षीय मोहन चंद्र मलासी शुक्रवार, 15 मई की शाम को रोजमर्रा की तरह अपनी मवेशियों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। शाम के करीब 6 बजे वे गांव के ही पास स्थित खेतों में अपनी गायों के लिए चारा-पत्ती लेने गए हुए थे। पहाड़ों में इस समय आमतौर पर लोग जंगलों और खेतों का रुख करते हैं, लेकिन उन्हें क्या पता था कि मौत झाड़ियों में छिपकर उनका इंतजार कर रही है।

जब काफी देर होने के बाद भी मोहन चंद्र मलासी घर वापस नहीं लौटे, तो परिजनों की चिंता बढ़ने लगी। रात ढलने पर अनहोनी की आशंका से घबराए परिजनों ने ग्रामीणों को इसकी सूचना दी। इसके बाद ग्रामीणों और परिजनों ने टॉर्च और लाठी-डंडों के साथ खेतों और आसपास के जंगली इलाकों में उनकी खोजबीन शुरू की।


झाड़ियों में मिला क्षत-विक्षत शव, दहल उठा पूरा इलाका

काफी देर तक नाम पुकारने और ढूंढने के बाद, खेतों से कुछ दूरी पर झाड़ियों के बीच जो मंजर ग्रामीणों ने देखा, उसने सबकी रूह कंपा दी। मोहन चंद्र मलासी का शव बेहद क्षत-विक्षत और लहूलुहान अवस्था में जमीन पर पड़ा हुआ था। शव की स्थिति को देखकर यह साफ हो गया कि घात लगाकर बैठे गुलदार ने उन पर उस समय अचानक हमला किया, जब वे खेतों में बिल्कुल अकेले थे। गुलदार ने उनके गले और शरीर के अन्य हिस्सों पर गहरे घाव किए थे, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी।

“मोहन चंद्र मलासी बेहद सीधे और कर्मठ व्यक्ति थे। वे मजदूरी करके किसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण और पेट पाल रहे थे। उनके जाने से न केवल उनका परिवार अनाथ हो गया है, बल्कि पूरा गांव गहरे सदमे में है।” — कमन्द गांव के स्थानीय निवासी


ग्रामीणों का दावा: “पहले से सक्रिय था गुलदार, वन विभाग सोता रहा”

इस दर्दनाक हादसे के बाद कमन्द गांव और आसपास के क्षेत्रों में वन विभाग के खिलाफ भारी आक्रोश देखा जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि इस क्षेत्र में पिछले कुछ समय से गुलदार की सक्रियता और गतिविधियां लगातार बढ़ती जा रही थीं। गुलदार को कई बार दिन के उजाले में भी गांव की सरहदों के आसपास देखा गया था, जिससे लोगों में पहले से ही भारी डर का माहौल बना हुआ था।

स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने वन विभाग को इसकी मौखिक और लिखित सूचना भी दी थी, लेकिन वन महकमे ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अगर समय रहते वन विभाग की टीम मुस्तैद होती, क्षेत्र में पिंजरा लगाया गया होता या गश्त बढ़ाई गई होती, तो आज मोहन चंद्र मलासी जिंदा होते और एक परिवार का सहारा नहीं छिनता।


पहाड़ों में पलायन और वीरान होते गांवों के बीच वन्यजीवों का राज

यह घटना उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों की उस कड़वी हकीकत को बयां करती है, जहां आज खेती-किसानी और पशुपालन करना जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि शाम ढलते ही गांवों में सन्नाटा पसर जाता है। अब खेतों और जंगलों की ओर जाना पूरी तरह से मौत को दावत देने के समान है। पानी लाने, घास काटने या मवेशियों को चराने जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी महिलाओं और बुजुर्गों को अपनी जान की बाजी लगानी पड़ रही है। इस वन्यजीव आतंक के कारण पहाड़ों से पलायन की रफ्तार भी लगातार तेज हो रही है।


मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम, ग्रामीणों ने की ये बड़ी मांगें

मोहन चंद्र मलासी की मौत की खबर फैलते ही वन विभाग की टीम भारी दबाव के बीच कमन्द गांव पहुंची। हालांकि, अधिकारियों को ग्रामीणों के तीव्र विरोध और तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। ग्रामीणों ने वन विभाग के अधिकारियों के सामने अपनी सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अपनाया है और निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी हैं:

  1. गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरा: कमन्द गांव और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से पिंजरा लगाया जाए और आदमखोर प्रवृत्ति के इस गुलदार को जल्द से जल्द पकड़ा या ट्रेंकुलाइज किया जाए।

  2. नियमित वन गश्त (फॉरेस्ट पेट्रोलिंग): शाम और सुबह के वक्त जब ग्रामीण खेतों की तरफ जाते हैं, उस दौरान वन कर्मियों की टीम गांव के पास गश्त सुनिश्चित करे।

  3. पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा: मृतक मोहन चंद्र मलासी के आश्रितों को तुरंत आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने की प्रक्रिया शुरू की जाए।

फिलहाल, वन विभाग की टीम ने ग्रामीणों को शांत कराते हुए आश्वासन दिया है कि क्षेत्र में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं और गुलदार की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए थर्मल कैमरे व पिंजरे लगाने की कार्रवाई की जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग की यह मुस्तैदी किसी और मासूम या बुजुर्ग की जान जाने से पहले धरातल पर दिख पाएगी?

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