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महिला खतना प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस — दाऊदी बोहरा समुदाय की परंपरा पर उठे सवाल

The Hill India News
Last updated: November 29, 2025 1:31 am
The Hill India News
Published: November 29, 2025
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Image Source: ANI
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नई दिल्ली, 29 नवंबर: उच्चतम न्यायालय ने मुसलमानों में, विशेषकर दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित महिला खतना (Female Genital Mutilation – FGM) की प्रथा पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर गंभीरता से विचार करने का निर्णय लिया है। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

Contents
क्या है मामला?सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुखNGO की दलील — ‘यह कुप्रथा है जो लड़कियों के अधिकारों का हनन करती है’दाऊदी बोहरा समुदाय का पक्ष — ‘धार्मिक स्वतंत्रता का मामला’केंद्र का रुख—पिछले मामलों में बदलता रहा है रुखFGM पर अंतरराष्ट्रीय नजरिया- दुनिया में कड़ा कानूनभारत में कानूनी स्थिति — क्या FGM अपराध है?महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रियाआगे क्या? — अगली सुनवाई महत्वपूर्ण

यह फैसला महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़े एक संवेदनशील मुद्दे को लेकर न्यायपालिका द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

क्या है मामला?

महिला खतना, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर FGM के रूप में जाना जाता है, महिलाओं और किशोरियों के जननांगों को चिकित्सकीय आवश्यकता के बिना आंशिक या पूर्ण रूप से काटने की प्रथा है।
भारत में यह प्रथा मुख्यतः दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में पाई जाती है, जहां इसे धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।
देश में लंबे समय से इस पर प्रतिबंध की मांग हो रही है, जिसमें अब एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और रुख

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने शुक्रवार को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मुद्दा “महिलाओं की गरिमा, शरीर की स्वायत्तता और मानवाधिकारों” से संबंधित है।
कोर्ट ने केंद्र सरकार, महाराष्ट्र सरकार, गुजरात सरकार और दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रतिनिधियों को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब मांगा।

पीठ ने कहा—
“यह मुद्दा बेहद संवेदनशील और सामाजिक प्रभाव वाला है। यदि किसी प्रथा से महिलाओं के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो अदालत इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती।”

NGO की दलील — ‘यह कुप्रथा है जो लड़कियों के अधिकारों का हनन करती है’

याचिका दायर करने वाले NGO ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि—

  • FGM का कोई चिकित्सकीय या धार्मिक औचित्य नहीं है।
  • यह प्रक्रिया 8 से 12 वर्ष की बच्चियों पर की जाती है।
  • इससे जीवनभर के लिए दर्द, ट्रॉमा, संक्रमण, जटिलताएं और मानसिक पीड़ा हो सकती है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र (UN) और कई अंतरराष्ट्रीय संगठन इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन मानते हैं।

NGO ने यह भी कहा कि कई देशों ने FGM को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है, लेकिन भारत में यह प्रथा अब भी जारी है। इसलिए इसे IPC और POCSO के तहत दंडनीय अपराध घोषित किया जाना चाहिए।

दाऊदी बोहरा समुदाय का पक्ष — ‘धार्मिक स्वतंत्रता का मामला’

दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ संगठनों ने पहले भी अदालत में कहा है कि यह प्रथा ‘खफ्ज़’ के नाम से जानी जाती है और उनका दावा है कि—

  • यह हल्की और नियंत्रित प्रक्रिया होती है,
  • समुदाय इसे अपनी धार्मिक परंपरा मानता है,
  • और संविधान उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करता है।

समुदाय ने तर्क दिया है कि यह उनकी धार्मिक पहचान का हिस्सा है और कोर्ट को धार्मिक रीति-रिवाज़ों में दखल देने से बचना चाहिए।

केंद्र का रुख—पिछले मामलों में बदलता रहा है रुख

इससे पहले वर्ष 2018 में जब मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था, तब केंद्र सरकार ने इसे महिलाओं के खिलाफ हिंसा बताते हुए प्रथा को प्रतिबंधित करने का समर्थन किया था।
हालांकि बाद के वर्षों में केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि इस विषय पर विस्तृत अध्ययन और सभी पक्षों की सुनवाई आवश्यक है।

अब नए नोटिस के तहत केंद्र को अपना स्पष्ट रुख प्रस्तुत करना होगा।

FGM पर अंतरराष्ट्रीय नजरिया- दुनिया में कड़ा कानून

विश्व भर के लगभग 40 देशों में FGM प्रतिबंधित है, जिनमें शामिल हैं:

  • ब्रिटेन
  • अमेरिका
  • फ्रांस
  • कनाडा
  • मिस्र
  • केन्या
  • ऑस्ट्रेलिया
  • नाइजीरिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार FGM महिलाओं के मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है और इसका कोई चिकित्सकीय लाभ नहीं है।

WHO का अनुमान है कि दुनिया भर में 20 करोड़ से अधिक महिलाएं और लड़कियां किसी न किसी रूप में FGM का शिकार हुई हैं।

भारत में कानूनी स्थिति — क्या FGM अपराध है?

वर्तमान में भारत में महिला खतना पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
हालांकि कई कानूनी धाराएं, जैसे—

  • IPC की धारा 326 (गंभीर चोट),
  • POCSO अधिनियम,
  • महिलाओं के प्रति हिंसा संबंधी कानून,

FGM के मामलों में लागू हो सकते हैं। परंतु चूंकि यह प्रथा पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर चुपचाप की जाती है, इसलिए इसके खिलाफ शिकायतें भी बहुत कम दर्ज होती हैं।

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया

देश की कई महिला अधिकार कार्यकर्ता लंबे समय से FGM के खिलाफ संघर्ष कर रही हैं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस को एक बड़ा कदम माना है और कहा—

“यह सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि बच्चियों के मूल अधिकारों का सवाल है। उम्मीद है कि कोर्ट इस प्रथा को खत्म करने की दिशा में ठोस आदेश देगा।”

आगे क्या? — अगली सुनवाई महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अगली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकारें और दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रतिनिधि कोर्ट के सामने अपने-अपने पक्ष रखेंगे।
इसके आधार पर कोर्ट यह तय कर सकता है कि:

  • क्या FGM को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए?
  • क्या इसे IPC और POCSO के तहत विशेष अपराध घोषित किया जाए?
  • या क्या समुदाय को सीमित स्वतंत्रता दी जाए?

यह मामला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बनाम महिलाओं के अधिकारों की बहस को नई दिशा देगा, बल्कि भारत में FGM भविष्य में जारी रहेगा या नहीं — इस पर भी निर्णायक प्रभाव डालेगा।

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