
देहरादून: कभी देहरादून की सड़कों पर ट्रैफिक लाइट के पास नन्हे हाथों में कटोरा या कूड़ा बीनने की मजबूरी थी, लेकिन आज वही हाथ कलम पकड़कर अपना भविष्य लिख रहे हैं। उत्तराखंड की राजधानी में जिलाधिकारी सविन बंसल (DM Savin Bansal) के विजनरी नेतृत्व और मुख्यमंत्री के मार्गदर्शन में एक ऐसी मौन क्रांति हो रही है, जिसने न केवल ‘भिक्षा’ को ‘शिक्षा’ में बदला है, बल्कि समाज की मुख्यधारा से कटे हुए मासूमों को मेडल और मैराथन तक पहुँचा दिया है।
आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर (ICC): उम्मीदों का नया पता
जिला प्रशासन द्वारा संचालित आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर मात्र एक पुनर्वास केंद्र नहीं, बल्कि उन बच्चों के लिए ‘सपनों की वर्कशॉप’ बन गया है, जिन्हें समाज ने भुला दिया था। जिलाधिकारी सविन बंसल की संवेदनशीलता का ही परिणाम है कि अब तक 174 से अधिक बच्चों को बाल श्रम और भिक्षावृत्ति के दलदल से सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है।
इन बच्चों को रेस्क्यू करने के बाद सीधे स्कूलों में नहीं झोंका जाता, बल्कि आईसीसी में लाकर उनकी काउंसलिंग की जाती है। यहाँ उन्हें:
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ब्रिज कोर्स: ताकि वे अपनी उम्र के अनुसार स्कूली शिक्षा के स्तर तक पहुँच सकें।
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मानसिक संबल: सड़कों के कड़वे अनुभवों को भुलाने के लिए मनोवैज्ञानिक मदद।
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पोषण और स्वास्थ्य: नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और संतुलित आहार।
हारिश की कहानी: सड़क से ‘साधुराम इंटर कॉलेज’ तक का सफर
इस बदलाव की सबसे सुंदर तस्वीर हारिश के रूप में सामने आई है। मई 2025 तक हारिश का औपचारिक शिक्षा से कोई नाता नहीं था। वह उन हजारों बच्चों में से एक था जो सड़कों पर भटकते थे। जिलाधिकारी के निर्देशन में जब उसे आईसीसी (ICC) लाया गया, तो उसकी खेल के प्रति रुचि को पहचाना गया।
मात्र तीन महीने की तैयारी के बाद, अगस्त 2025 में उसे साधुराम इंटर कॉलेज में कक्षा 6 में प्रवेश दिलाया गया। आज हारिश न केवल नियमित छात्र है, बल्कि खेल स्पर्धाओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहा है। हारिश जैसे दर्जनों बच्चे अब मैराथन में हिस्सा ले रहे हैं और उनकी आँखों में अब हीनभावना नहीं, बल्कि जीत का जज्बा झलकता है।
रंगों से भरी होली: उपेक्षा नहीं, अब उत्सव का समय
हाल ही में 03 मार्च 2026 को देहरादून में एक अलग ही नजारा देखने को मिला। आधुनिक इंटेंसिव केयर सेंटर के बच्चों ने जब उत्साहपूर्वक होली का पर्व मनाया, तो उनकी खिलखिलाहट ने यह साबित कर दिया कि अब यह बचपन उपेक्षा का शिकार नहीं है।
डीएम सविन बंसल का मानना है कि तीज-त्योहारों में इन बच्चों की सहभागिता उनके आत्मविश्वास को बढ़ाती है। जब ये बच्चे रंगों के साथ खेलते हैं, तो वे समाज के साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। प्रशासन का लक्ष्य केवल बच्चों को बचाना (Rescue) नहीं है, बल्कि उन्हें एक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी नागरिक बनाना है।
डीएम सविन बंसल का विजन: “शिक्षा हर बच्चे का अधिकार”
जिलाधिकारी सविन बंसल ने इस मुहिम पर बात करते हुए स्पष्ट किया कि प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित, सम्मानजनक और शिक्षित जीवन जीने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा:
“हमारा उद्देश्य केवल सड़कों से बच्चों को हटाना नहीं है, बल्कि उन्हें एक ऐसा वातावरण देना है जहाँ वे सामान्य बच्चों की तरह स्कूल जा सकें, खेल सकें और अपने सपने पूरे कर सकें। प्रशासन, पुलिस और शिक्षा विभाग के समन्वय से हम हर उस बच्चे तक पहुँचेंगे जो मुख्यधारा से वंचित है।”
प्रशासन की रणनीति: रेस्क्यू से रिहैबिलिटेशन तक
जिला प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
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निरंतर रेस्क्यू ऑपरेशन: चिन्हित हॉटस्पॉट पर नियमित निगरानी ताकि कोई बच्चा श्रम या भिक्षावृत्ति में न धकेला जाए।
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समन्वित कार्यवाही: महिला एवं बाल विकास, शिक्षा विभाग और पुलिस के बीच बेहतर तालमेल।
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कौशल विकास: पढ़ाई के साथ-साथ संगीत, योग और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से सर्वांगीण विकास।
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सामाजिक सहयोग: समाज के प्रबुद्ध वर्ग को इस मुहिम से जोड़ना ताकि पुनर्वास स्थायी हो सके।
समाज के लिए एक प्रेरणा
देहरादून जिला प्रशासन की यह पहल आज पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बन रही है। जो बच्चे कल तक तिरस्कार की नजर से देखे जाते थे, आज वे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मंच साझा कर रहे हैं। जिलाधिकारी सविन बंसल के इन प्रयासों ने साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो ‘सड़क पर बिखरे बचपन’ को सहेजकर राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में लाया जा सकता है।
आज देहरादून की सड़कों पर भिक्षावृत्ति के खिलाफ जो जंग छिड़ी है, उसका परिणाम ‘शिक्षा के उजाले’ के रूप में सबके सामने है। यह मुरझाए चेहरों पर वापस आई वह मुस्कान है, जिसकी कीमत किसी भी मेडल से बढ़कर है।



