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कर्नाटक में सत्ता समीकरण पर बढ़ी हलचल: सिद्धारमैया–शिवकुमार गुट आमने-सामने, ‘200% मुख्यमंत्री’ वाले बयान से गरमाई राजनीति

नई दिल्ली/बेंगलुरु: कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने अपने कार्यकाल के आधे रास्ते पर कदम रख दिया है, लेकिन इसी समय पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असमंजस और शक्ति-प्रदर्शन ने नया मोड़ ले लिया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के समर्थकों के बीच लंबे समय से चल रहा संतुलन अब खुलकर टकराव में बदलता दिख रहा है। दिल्ली में डेरा डाले विधायकों की हलचल और बयानबाजी ने राज्य की राजनीति में नई गर्माहट ला दी है।

हाल ही में दिल्ली से लौटे शिवकुमार समर्थक विधायक इक़बाल खान ने ऐसा बयान दिया जिसने पूरे राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। मीडिया से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि “डीके शिवकुमार 200% मुख्यमंत्री बनेंगे… अच्छी खबर बहुत जल्द मिलेगी”। खान के इस बयान ने सत्ता-साझेदारी के पुराने फॉर्मूले को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।


दिल्ली में विधायकों की आवाजाही से बढ़ा सस्पेंस

कई दिनों से चर्चा थी कि डीके शिवकुमार समर्थक विधायक नेतृत्व के सवाल पर स्पष्टता की मांग को लेकर दिल्ली पहुंचे थे। हालांकि इन दौरों की आधिकारिक पुष्टि कांग्रेस हाईकमान की ओर से नहीं हुई, लेकिन जिस तरह विधायकों ने मीडिया के सामने बयान दिए, उससे स्पष्ट हो गया कि पार्टी के भीतर असंतोष सतह पर आ रहा है।

दिल्ली से लौटने के बाद विधायक इक़बाल खान ने कहा:

“मैंने शुरुआत से कहा है कि डीके शिवकुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे। मुझे 200 प्रतिशत भरोसा है। वापसी के बाद अच्छी खबर मिलेगी। हाईकमान इस पर चर्चा कर रहा है और वही अंतिम फैसला लेगा।”

उनके इस बयान ने यह संकेत भी दिया कि दिल्ली में पार्टी आलाकमान स्तर पर गंभीर चर्चा चली है, और निर्णय की घड़ी नजदीक हो सकती है।


आलाकमान से ‘असमंजस दूर करने’ की अपील

दिल्ली दौरे पर पहुंचे कुछ अन्य विधायक और नेता भी खुलकर यह मांग कर चुके हैं कि आलाकमान को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए कि क्या सत्ता-साझेदारी की बात 2023 में तय हुई थी या नहीं।

कुछ विधायकों ने कहा कि:

  • मुख्यमंत्री बदलने को लेकर असमंजस लंबा नहीं चलना चाहिए
  • हाईकमान को जल्द स्पष्ट फैसला देना चाहिए
  • पार्टी को नेतृत्व विवाद से बचाने के लिए दिशा-निर्देश जरूरी हैं

वहीं, समर्थक गुट का एक बड़ा हिस्सा इसे “सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि युवाओं को कैबिनेट में मौका देने” के मुद्दे पर दिल्ली दौरा बता रहा है। इस बयान से यह भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि पार्टी अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक रूप से छोटा दिखाने की कोशिश कर रही है।


सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच ‘साझा सत्ता’ का दावा

2023 विधानसभा चुनावों के समय से ही यह चर्चा राजनीतिक हलकों में रही है कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच एक अनौपचारिक ‘पावर शेयरिंग फॉर्मूला’ तय किया गया था। इसके अनुसार:

  • लगभग 2.5 साल तक सिद्धारमैया मुख्यमंत्री रहेंगे
  • उसके बाद अगला कार्यकाल शिवकुमार संभालेंगे

हालांकि, इस फॉर्मूले की न तो कभी आधिकारिक पुष्टि हुई और न ही सार्वजनिक चर्चा। लेकिन समय जैसे-जैसे आधे कार्यकाल की ओर बढ़ा, यह प्रश्न फिर उठ खड़ा हुआ कि क्या यह फॉर्मूला वास्तव में अस्तित्व में था?

अब 20 नवंबर को कांग्रेस सरकार के ढाई साल पूरा होने के साथ ही इस चर्चा को नई मजबूती मिल गई है। शिवकुमार समर्थक विधायकों की हलचल ने इसे और अधिक तीखा बना दिया है।


राजनीतिक संकेत: क्या बदल सकता है कर्नाटक में सत्ता संतुलन?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि:

  1. कांग्रेस नेतृत्व बदलाव चाहता है या नहीं, यह इस समय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
  2. सिद्धारमैया अभी भी एक अनुभवी व लोकप्रिय नेता हैं, जिन्हें पार्टी ने दलित, पिछड़े और वंचित समुदायों का चेहरा माना है।
  3. दूसरी ओर, डीके शिवकुमार का संगठन पर मजबूत नियंत्रण और वित्तीय संसाधनों पर पकड़ उन्हें पार्टी के भीतर बेहद प्रभावशाली बनाती है।

यह भी कहा जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच ‘संतुलन’ बनाए रखना केंद्रीय नेतृत्व के लिए सबसे कठिन चुनौती बन चुका है।


विधानसभा की समीकरण और 2028 की तैयारी

कर्नाटक में अगले विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, लेकिन कांग्रेस को अभी से रणनीति तय करनी होगी कि पार्टी किस चेहरे के साथ जनता के बीच जाएगी।

  • सिद्धारमैया 76 वर्ष के हैं, और यह संभवतः उनका अंतिम सक्रिय कार्यकाल हो सकता है।
  • जबकि डीके शिवकुमार संगठनात्मक रूप से अगली पीढ़ी के नेतृत्व में माने जाते हैं।

इसलिए पार्टी के सामने यह भी सवाल है कि दीर्घकालिक रणनीति किसके नेतृत्व में बनाई जाए।


हाईकमान की भूमिका सबसे अहम

कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल स्थिति पर बारीकी से नजर रख रहा है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे—तीनों नेताओं के बीच कर्नाटक संकट पर चर्चा की खबरें लगातार आ रही हैं।
यह भी कहा जा रहा है कि निर्णय जल्द आने की संभावना है ताकि:

  • सरकार में अस्थिरता का माहौल न बने
  • विपक्ष (खासतौर पर बीजेपी) इस विवाद का फायदा न उठा सके
  • पार्टी 2028 की तैयारियों को लेकर स्पष्ट दिशा में आगे बढ़ सके

अभी क्या है स्थिति?

फिलहाल स्थिति इस प्रकार है:

  • विधायकों के एक धड़े में शिवकुमार की दावेदारी को लेकर उत्साह है
  • सिद्धारमैया के समर्थक इसे अनावश्यक विवाद बताते हुए स्थिरता की मांग कर रहे हैं
  • हाईकमान ने अभी आधिकारिक बयान नहीं दिया
  • लेकिन ‘अच्छी खबर’ और ‘200% मुख्यमंत्री’ वाले बयान से पूरे राजनीतिक परिदृश्य में नई उथल-पुथल मच गई है.

कर्नाटक कांग्रेस अभी सत्ता के मध्य बिंदु पर खड़ी है, जहाँ उसे यह तय करना है कि पार्टी की स्थिरता और भविष्य किस नेतृत्व के हाथों में सुरक्षित है। चाहे बदलाव हो या न हो—इतना तय है कि आने वाले कुछ हफ्तों में कर्नाटक की राजनीति में बड़े घटनाक्रम सामने आ सकते हैं।
कांग्रेस के लिए यह समय नाजुक है, और जिस प्रकार दिल्ली में लगातार बैठकों और दौरों का सिलसिला चल रहा है, उससे साफ है कि पार्टी निर्णय की तरफ बढ़ रही है।कर्नाटक की राजनीति अब दिल्ली के फैसले का इंतजार कर रही है।

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