
भारत में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें बढ़ सकती हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़े असर ने भारत की सरकारी तेल कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है। सरकारी तेल कंपनियों को हर महीने करीब 30 हजार करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी यानी नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में यह आशंका तेज हो गई है कि सरकार और तेल कंपनियां जल्द ही ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला ले सकती हैं।
दरअसल, ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। दो महीने पहले तक जो कच्चा तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल था, वह अब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ रहा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। भारत भी उन्हीं देशों में शामिल है, क्योंकि देश अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
हर दिन 700 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान
न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी तेल कंपनियों को हर दिन करीब 700 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा है। महीने के हिसाब से यह आंकड़ा लगभग 30 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच रहा है।
सूत्रों के अनुसार अप्रैल महीने में पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल पर 25 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी हो रही थी। यानी कंपनियां जितने दाम में ईंधन बेच रही हैं, उससे कहीं ज्यादा कीमत पर उन्हें कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा है। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए खुदरा कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है।
मिडिल ईस्ट संकट से बिगड़ी सप्लाई
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि देश का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल, 90 प्रतिशत एलपीजी और करीब 65 प्रतिशत प्राकृतिक गैस इसी क्षेत्र से आती है।
इन हालातों के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों ने देशभर में ईंधन की सप्लाई बनाए रखी। पिछले कई हफ्तों में कहीं भी पेट्रोल या डीज़ल की कमी की स्थिति नहीं बनी। न राशनिंग लागू हुई और न ही आम लोगों को ईंधन खरीदने में किसी तरह की परेशानी हुई। लेकिन इस स्थिरता की भारी कीमत अब तेल कंपनियों को चुकानी पड़ रही है।
सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर दी राहत
केंद्र सरकार ने बढ़ती कीमतों का असर कम करने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की थी। पेट्रोल पर विशेष अतिरिक्त एक्साइज ड्यूटी को 13 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 3 रुपये कर दिया गया, जबकि डीज़ल पर लगने वाली 10 रुपये प्रति लीटर की ड्यूटी को पूरी तरह खत्म कर दिया गया।
सरकार का कहना है कि अगर यह कटौती नहीं की जाती तो तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी बढ़कर 62,500 करोड़ रुपये प्रति माह तक पहुंच सकती थी। हालांकि एक्साइज ड्यूटी कम करने से सरकार को भी हर महीने करीब 14 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बेहद अस्थिर बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की कोशिश रही है कि आम जनता पर बोझ न बढ़े और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें स्थिर रहें। हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि आने वाले समय में कीमतें इसी स्तर पर बनी रहेंगी या नहीं।
दुनियाभर में बढ़ चुकी हैं ईंधन की कीमतें
भारत में भले ही अभी तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखी गई हों, लेकिन दुनिया के कई देशों में ईंधन के दामों में भारी बढ़ोतरी हो चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक स्पेन में पेट्रोल की कीमतें लगभग 34 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। जापान, इटली और इज़रायल में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं जर्मनी में 27 प्रतिशत और यूनाइटेड किंगडम में 22 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ चुकी हैं।
कई देशों ने हालात को देखते हुए ऊर्जा बचत की अपील की है। कुछ देशों में ईंधन की राशनिंग भी लागू की गई है, जबकि कई जगह सरकारों ने राहत पैकेज या ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण लगाने जैसे कदम उठाए हैं।
भारत में फिलहाल कीमतें स्थिर
भारत में फिलहाल पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल की कीमत करीब 87.67 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है। सरकार और तेल कंपनियों ने अब तक उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने से बचने की कोशिश की है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत में भी पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ाना लगभग तय हो जाएगा। लगातार बढ़ती अंडर-रिकवरी को लंबे समय तक झेल पाना तेल कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा।
आम आदमी पर पड़ सकता है सीधा असर
अगर पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। परिवहन खर्च बढ़ने से खाने-पीने की चीजों समेत रोजमर्रा के सामान महंगे हो सकते हैं। ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ने का असर महंगाई पर भी दिखाई देगा।
इसके अलावा एलपीजी, सीएनजी और बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित ईंधन पर निर्भर है। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखने और तेल कंपनियों के नुकसान के बीच संतुलन बनाने की होगी।
फिलहाल सरकार की कोशिश कीमतों को स्थिर रखने की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को देखते हुए आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीज़ल महंगा होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।



