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‘लोन-EMI भरते हैं तो क्या बच्चों की देखभाल नहीं करेंगे?’ गुजरात हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, पिता को दिया भरण-पोषण बढ़ाने का आदेश

अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए साफ कहा है कि कोई भी पिता केवल इस आधार पर अपने बच्चों की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता कि वह लोन या EMI चुका रहा है। अदालत ने टिप्पणी की कि बच्चों का पालन-पोषण किसी भी कर्ज, EMI या निजी आर्थिक बोझ से कम महत्वपूर्ण नहीं है। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पिता की पहली जिम्मेदारी अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और बुनियादी जरूरतों को पूरा करना है।

यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जिसने अपने पहले विवाह से हुए तीन बच्चों के लिए बढ़ाई गई भरण-पोषण राशि को चुनौती दी थी। उसने अदालत में दलील दी कि उसकी आय सीमित है, वह दूसरी शादी कर चुका है और दूसरी पत्नी के लिए लिए गए कर्ज की EMI भी भर रहा है। इसी आधार पर उसने भरण-पोषण राशि कम करने और बच्चों की मां से वित्तीय जानकारी मांगे जाने की मांग की थी। लेकिन गुजरात हाई कोर्ट ने उसकी दलीलों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और बच्चों के हित को सर्वोपरि माना।

क्या है पूरा मामला?

मामला तीन नाबालिग बच्चों यानी ट्रिपलेट्स से जुड़ा है। इन बच्चों की ओर से उनकी मां ने भरण-पोषण राशि बढ़ाने के लिए अदालत में याचिका दायर की थी। 3 जुलाई 2024 को इस मामले में आदेश पारित किया गया था। उस समय तीनों बच्चों की उम्र करीब 9 वर्ष बताई गई थी। बाद में बच्चों की जरूरतों और बढ़ते खर्चों को देखते हुए अदालत में फिर सुनवाई हुई।

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि पिता जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में ‘वॉटर बेयरर’ यानी जलवाहक के पद पर कार्यरत है। उसकी मासिक आय लगभग 14,600 से 14,800 रुपये के बीच बताई गई। अदालत को यह भी बताया गया कि व्यक्ति ने दूसरी शादी कर ली है और उसे अस्थायी काम से अतिरिक्त आय भी प्राप्त होती है।

पिता ने अदालत में कहा कि उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है। वह दूसरी पत्नी के लिए लिए गए 40 हजार रुपये के कर्ज की EMI चुका रहा है। इसके अलावा दूसरी पत्नी से हुए बच्चे के नाम पर LIC प्रीमियम भी जमा करता है। उसने यह भी कहा कि उसके मासिक खर्च काफी अधिक हैं, इसलिए बच्चों के लिए बढ़ी हुई राशि देना उसके लिए कठिन होगा।

मां ने अदालत में क्या बताया?

मामले की सुनवाई के दौरान बच्चों की मां ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर बच्चों के खर्च का पूरा विवरण दिया। मां ने बताया कि तीनों बच्चों के रहने का खर्च करीब 4,500 रुपये प्रतिमाह है जबकि स्कूल फीस लगभग 9,000 रुपये है। इस तरह केवल रहने और पढ़ाई पर ही 13,500 रुपये मासिक खर्च हो रहे हैं।

इसके अलावा मेडिकल खर्च लगभग 1,500 रुपये प्रति माह बताया गया। मां ने कहा कि अब बच्चे कक्षा 11 में पढ़ रहे हैं और उनकी ट्यूशन फीस करीब 20 हजार रुपये प्रतिमाह है, हालांकि तीन में से एक बच्चा ट्यूशन नहीं लेता। मां ने यह भी बताया कि वह बालवाटिका में प्राथमिक शिक्षिका के रूप में काम करती हैं और उनका मासिक वेतन करीब 88,368 रुपये है।

मां ने अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों का भी जिक्र किया। उन्होंने अदालत को बताया कि वह हर महीने 12,779 रुपये लोन EMI, 3,488 रुपये अन्य सक्रिय लोन और करीब 2,400 रुपये पेट्रोल पर खर्च करती हैं। मां ने यह भी कहा कि वह अकेले रहती हैं और उन्होंने दोबारा शादी नहीं की है। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और बाकी जरूरतों की पूरी जिम्मेदारी वही उठा रही हैं।

पिता के हलफनामे में क्या जानकारी दी गई?

पिता की ओर से अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा गया कि उसके कुल मासिक खर्च लगभग 10 हजार रुपये हैं। उसने दावा किया कि एक आश्रित व्यक्ति पर 3,500 रुपये का खर्च आता है। हालांकि अदालत ने पाया कि उसकी मां को हर महीने 8 हजार रुपये पेंशन मिलती है, इसलिए उन्हें आर्थिक रूप से आश्रित नहीं माना जा सकता।

पिता ने अपनी नौकरी और आय का विवरण देते हुए कहा कि वह जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम में जलवाहक के पद पर कार्यरत है और लगभग 14,600 रुपये प्रतिमाह कमाता है। उसने अदालत को बताया कि दूसरी पत्नी से हुए बच्चे के लिए LIC प्रीमियम के रूप में हर महीने 560 और 455 रुपये जमा करता है। इसके अलावा दूसरी पत्नी के लिए लिए गए लोन की EMI करीब 2,140 रुपये प्रतिमाह है।

अदालत की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान गुजरात हाई कोर्ट की जस्टिस गीता गोपी ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी किसी भी EMI या निजी कर्ज से कम नहीं हो सकती। यदि कोई व्यक्ति दूसरी शादी करता है या अन्य आर्थिक दायित्व लेता है, तो इससे उसके पहले विवाह से हुए बच्चों के अधिकार खत्म नहीं हो जाते।

अदालत ने कहा कि पिता बच्चों के भोजन, कपड़े, रहने की व्यवस्था, इलाज और शिक्षा जैसे बुनियादी खर्चों से मुंह नहीं मोड़ सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि तीनों बच्चों की पढ़ाई और चिकित्सा का अधिकतर खर्च मां ही उठा रही है और वही बच्चों का मुख्य सहारा बनी हुई है।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पिता को अपनी आय का संतुलित बंटवारा करना होगा। अदालत ने कहा कि पिता की जिम्मेदारी केवल दूसरी पत्नी और उसके बच्चे तक सीमित नहीं हो सकती। पहले विवाह से हुए तीन बच्चों का अधिकार भी बराबर है। अदालत ने खर्च के संतुलन के लिए कुल छह यूनिट मानीं, जिनमें पहले विवाह से तीन बच्चे, दूसरी पत्नी और दूसरी पत्नी से हुआ एक बच्चा शामिल किया गया।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

इस मामले में पिता ने सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था। उसने स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दाखिल कर गुजरात हाई कोर्ट के पहले आदेश को चुनौती दी थी। पिता के वकील ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले के अनुसार यदि पत्नी अपनी वित्तीय स्थिति का खुलासा नहीं करती, तो भरण-पोषण आदेश रद्द किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए केस को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया। इसके बाद हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपनी-अपनी आर्थिक स्थिति के हलफनामे दाखिल करने के निर्देश दिए। अदालत ने दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता यानी मेडिएशन की कोशिश भी की, लेकिन समझौता नहीं हो सका।

अदालत ने क्या आदेश दिया?

सभी तथ्यों और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद गुजरात हाई कोर्ट ने बच्चों के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि बच्चों की बढ़ती उम्र, पढ़ाई और चिकित्सा जरूरतों को देखते हुए उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए।

कोर्ट ने पहले प्रति बच्चे 1,800 रुपये की भरण-पोषण राशि को बढ़ाकर 2,500 रुपये प्रति बच्चा किया था। बाद में अदालत ने अपने आदेश में प्रत्येक बच्चे के लिए 1,000 रुपये प्रतिमाह अतिरिक्त सहायता तय की। अदालत ने कहा कि पिता को अपनी सीमित आय के बावजूद बच्चों की जिम्मेदारी निभानी ही होगी।

फैसले का व्यापक संदेश

गुजरात हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश है जहां माता-पिता आर्थिक जिम्मेदारियों का हवाला देकर बच्चों के भरण-पोषण से बचने की कोशिश करते हैं। अदालत ने साफ कर दिया कि बच्चों का अधिकार सर्वोच्च है और माता-पिता की व्यक्तिगत आर्थिक परेशानियां उन्हें इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकतीं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि दूसरी शादी, लोन, EMI या अन्य निजी खर्च बच्चों की बुनियादी जरूरतों से ऊपर नहीं हो सकते।

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