पौड़ी गढ़वाल | उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले में गुलदार के बाद अब भालू के आतंक ने ग्रामीणों की रातों की नींद उड़ा दी है। ताजा मामला तहसील लैंसडाउन के द्वारीखाल ब्लॉक का है, जहां मंगलवार को जंगल गई एक महिला पर भालू ने अचानक हमला कर दिया। इस खूनी संघर्ष में महिला गंभीर रूप से घायल हो गई है, जिन्हें प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए एम्स ऋषिकेश (AIIMS Rishikesh) रेफर किया गया है।
घास काटने गई महिला पर घात लगाकर बैठा था भालू
जानकारी के अनुसार, द्वारीखाल ब्लॉक के ग्राम च्वारा निवासी भुन्द्रा देवी (उम्र लगभग 50 वर्ष) मंगलवार दोपहर अपनी पुत्री के साथ घर के पास ही स्थित जंगल में मवेशियों के लिए घास लेने गई थीं। दोनों मां-बेटी जंगल में काम कर ही रही थीं कि तभी झाड़ियों में घात लगाकर बैठे एक विशालकाय भालू ने अचानक भुन्द्रा देवी पर हमला कर दिया। भालू का हमला इतना अचानक और जोरदार था कि महिला को संभलने तक का मौका नहीं मिला। भालू ने उनके चेहरे और सिर पर गहरे जख्म कर दिए।
पुत्री के साहस और ग्रामीणों की तत्परता से बची जान
अपनी आंखों के सामने मां को भालू के चंगुल में फंसा देख साथ गई पुत्री ने हिम्मत नहीं हारी और जोर-जोर से शोर मचाना शुरू कर दिया। शोर सुनकर पास के खेतों में काम कर रहे ग्रामीण लाठी-डंडों के साथ मौके की ओर दौड़े। ग्रामीणों की भारी भीड़ को अपनी ओर आता देख भालू लहूलुहान महिला को छोड़कर जंगल की ओर भाग निकला। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि यदि पुत्री ने समय पर साहस न दिखाया होता और ग्रामीण मौके पर न पहुँचते, तो कोई बड़ी अनहोनी हो सकती थी।
इलाज के लिए एम्स ऋषिकेश रेफर
घटना के तुरंत बाद लहूलुहान हालत में भुन्द्रा देवी को ग्राम प्रधान और स्थानीय ग्रामीणों की मदद से निजी वाहनों के जरिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) चेलूसैण ले जाया गया। अस्पताल के डॉक्टरों ने बताया कि भालू के हमले के कारण महिला के शरीर पर गहरे घाव हैं और अत्यधिक रक्तस्राव हुआ है। उनकी नाजुक हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद तत्काल उच्च केंद्र (हायर सेंटर) एम्स ऋषिकेश रेफर कर दिया। वर्तमान में पीड़िता का इलाज एम्स में जारी है, जहाँ उनकी स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है।
ग्रामीणों में आक्रोश: ‘पलायन और वन्यजीवों के बीच पिसता पहाड़’
इस पौड़ी गढ़वाल भालू का हमला की खबर के बाद पूरे क्षेत्र में दहशत के साथ-साथ प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश भी है। ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ में खेती और पशुपालन ही आजीविका का मुख्य साधन है, लेकिन अब जंगल जाना मौत को दावत देने जैसा हो गया है।
ग्रामीणों ने रोष व्यक्त करते हुए कहा:
“एक तरफ सरकार पलायन रोकने की बात करती है, लेकिन दूसरी तरफ हम अपने ही खेतों और जंगलों में सुरक्षित नहीं हैं। पहले गुलदार का भय था और अब भालू घरों की दहलीज तक पहुँच रहे हैं। अगर वन्यजीवों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो बचा-खुचा पहाड़ भी खाली हो जाएगा।”
वन विभाग की भूमिका और प्रशासन से मांग
घटना की सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुँचकर घटनास्थल का मुआयना किया और ग्रामीणों के बयान दर्ज किए। हालांकि, विभाग की इस रूटीन कार्रवाई से स्थानीय लोग संतुष्ट नहीं हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन और वन विभाग से मांग की है कि:
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आदमखोर या हिंसक हो चुके भालू को पकड़ने के लिए क्षेत्र में तत्काल पिंजरा लगाया जाए।
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जंगल के रास्तों और आबादी वाले क्षेत्रों में गश्त (Patrolling) बढ़ाई जाए।
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घायल महिला के परिवार को उचित मुआवजा और इलाज का पूरा खर्च दिया जाए।
लगातार बदलता हमले का पैटर्न: थलीसैंण से अब द्वारीखाल तक
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव के कारण जंगली जानवरों के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। कुछ समय पूर्व पौड़ी के थलीसैंण क्षेत्र में भालू का जबरदस्त आतंक बना हुआ था। कुछ समय की शांति के बाद अब द्वारीखाल और लैंसडाउन जैसे क्षेत्रों में भालू की सक्रियता बढ़ना चिंता का विषय है। भोजन की तलाश और रिहायशी इलाकों के पास बढ़ती झाड़ियों के कारण ये जानवर अब इंसानी बस्तियों के बेहद करीब पहुँच रहे हैं।
सुरक्षा की दरकार
पौड़ी गढ़वाल में हो रही ये घटनाएं सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। पहाड़ी जनजीवन पहले ही भौगोलिक चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे में वन्यजीवों के बढ़ते हमले पलायन की आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। अब देखना होगा कि वन विभाग केवल मुआवजे की फाइलों तक सीमित रहता है या ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए धरातल पर कोई ठोस सुरक्षा तंत्र विकसित करता है।
तब तक के लिए, प्रशासन ने स्थानीय लोगों को अकेले जंगल न जाने और शाम के समय सतर्क रहने की सलाह दी है।



