कोलकाता/नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर संवैधानिक टकराव चरम पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के बीच चल रही तकरार अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक जा पहुँची है। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर आयोग पर ‘राजनीतिक पक्षपात’ और ‘तानाशाही रवैया’ अपनाने का गंभीर आरोप लगाया है।
इस कानूनी लड़ाई ने न केवल बंगाल बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि एक सिटिंग मुख्यमंत्री ने सीधे तौर पर संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता को चुनौती दी है।
विवाद का केंद्र: ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR)
इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ राज्य में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया है। ममता बनर्जी का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से असंवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
मुख्यमंत्री का आरोप है कि इस विशेष संशोधन अभ्यास की आड़ में एक बड़ी राजनीतिक साजिश रची जा रही है। उन्होंने आशंका जताई है कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग मिलकर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) को ‘पिछले दरवाजे’ (Backdoor Entry) से लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने बुधवार को एक रैली के दौरान चेतावनी दी थी कि वह नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी कानूनी लड़ाई लड़ेंगी।
याचिका में लगाए गए गंभीर आरोप
ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिका में न केवल भारत निर्वाचन आयोग बल्कि राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) को भी प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
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संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन: याचिका में कहा गया है कि जिस संस्था (ECI) से निष्पक्षता और लोकतंत्र की रक्षा की उम्मीद की जाती है, उसका मौजूदा आचरण चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है।
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चुनिंदा लक्षीकरण (Selective Targeting): टीएमसी नेतृत्व का आरोप है कि विशेष संशोधन के नाम पर खास समुदायों और क्षेत्रों के वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है ताकि मतदाता सूची से उनके नाम काटे जा सकें।
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NRC का डर: याचिका में तर्क दिया गया है कि बिना किसी ठोस आधार के इस तरह का ‘इंटेंसिव’ अभ्यास करना असल में नागरिकों की नागरिकता पर सवाल खड़े करने जैसा है।
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केंद्र का हस्तक्षेप: मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के निर्देशों पर काम कर रहा है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की शुचिता खतरे में पड़ गई है।
क्या है ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ और क्यों है इस पर विवाद?
आमतौर पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित प्रक्रिया है, लेकिन जब आयोग ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ का आदेश देता है, तो इसमें घर-घर जाकर सत्यापन (Door-to-door verification) और दस्तावेजों की गहन जांच शामिल होती है।
बंगाल सरकार का कहना है कि राज्य में पहले ही मतदाता सूची अपडेटेड है, ऐसे में चुनाव से ठीक पहले इस तरह के ‘इंटेंसिव’ अभ्यास का उद्देश्य वोटरों को डराना और सूची में हेरफेर करना है।
राजनीतिक मायने और केंद्र-राज्य टकराव
यह मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक संदेशों से भरा है। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर बंगाली अस्मिता और नागरिक अधिकारों से जोड़ दिया है।
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विपक्ष का रुख: भाजपा ने इन आरोपों को निराधार बताया है। भाजपा नेतृत्व का कहना है कि ममता बनर्जी रोहिंग्या और घुसपैठियों के फर्जी वोट कटने के डर से बौखलाई हुई हैं।
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TMC की रणनीति: तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे को सड़क से लेकर संसद और अब अदालत तक ले जाकर यह संदेश देना चाहती है कि वह बंगाल के हितों की एकमात्र रक्षक है।
अब सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर नजर
ममता बनर्जी ने याचिका के माध्यम से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करे और चुनाव आयोग को उचित निर्देश जारी करे। उन्होंने मांग की है कि इस संशोधन प्रक्रिया पर तब तक रोक लगाई जाए जब तक कि इसकी पारदर्शिता सुनिश्चित न हो जाए।
अब सबकी नजरें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की पीठ पर टिकी हैं। क्या अदालत चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप करेगी? क्या ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ पर रोक लगेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में भारतीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे की दिशा तय करेंगे।
पश्चिम बंगाल में चुनावी शंखनाद से पहले ही कानूनी मोर्चे पर जंग छिड़ चुकी है। ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट जाना यह दर्शाता है कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कड़ा रुख अपनाता है, तो यह चुनाव आयोग की भविष्य की कार्यप्रणाली के लिए एक बड़ा मिसाल (Precedent) साबित होगा।



