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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > नैनीताल हाईकोर्ट का कड़ा रुख: कोसी नदी में ‘पाताल’ तक खनन पर सरकार तलब, अधिकारियों से पूछा—’क्यों नहीं माना आदेश?’
उत्तराखंडफीचर्ड

नैनीताल हाईकोर्ट का कड़ा रुख: कोसी नदी में ‘पाताल’ तक खनन पर सरकार तलब, अधिकारियों से पूछा—’क्यों नहीं माना आदेश?’

The Hill India News
Last updated: April 29, 2026 3:27 pm
The Hill India News
Published: April 29, 2026
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नैनीताल। उत्तराखंड की नदियों के अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण को लेकर नैनीताल उच्च न्यायालय ने एक बार फिर सख्त तेवर अपनाए हैं। उधमसिंह नगर के सुल्तानपुर पट्टी क्षेत्र में कोसी नदी के सीने को चीर रहे अवैध खनन के मामले में कोर्ट ने शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और खनन विभाग को दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है।

Contents
हाईटेंशन टावर पर मंडरा रहा खतरा: जनहित याचिका में खुलासाअदालती आदेश की अवहेलना पर नाराजगीनंधौर रेंज विवाद: जनप्रतिनिधियों और वन विभाग के बीच तलवारें खिंचीसमझौते की कॉपी बनी मुख्य आधारप्रशासन की जवाबदेही तय होना जरूरी

हाईटेंशन टावर पर मंडरा रहा खतरा: जनहित याचिका में खुलासा

मामले की जड़ सुल्तानपुर पट्टी निवासी सलीम अहमद द्वारा दायर की गई वह जनहित याचिका है, जिसने कुंभकर्णी नींद में सोए प्रशासन की पोल खोलकर रख दी है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि कोसी नदी में नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से अवैध खनन किया जा रहा है। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि नदी के तट पर स्थित बिजली के हाईटेंशन टावरों के ठीक नीचे लगभग 20 फीट तक खुदाई कर दी गई है।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह दलील दी गई कि यदि समय रहते इस अंधाधुंध खनन पर रोक नहीं लगाई गई, तो ये विशालकाय टावर कभी भी धराशाई हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में न केवल क्षेत्र की बिजली व्यवस्था ठप होगी, बल्कि भारी जान-माल का नुकसान भी हो सकता है। उत्तराखंड हाईकोर्ट अवैध खनन सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस स्थिति को ‘अत्यंत संवेदनशील’ माना है।


अदालती आदेश की अवहेलना पर नाराजगी

यह मामला केवल खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक आदेशों की अनदेखी का भी उदाहरण बनता जा रहा है। पूर्व में हुई सुनवाई में कोर्ट ने एसएसपी, जिला खनन अधिकारी और जिलाधिकारी को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे खनन कार्य में लगी भारी मशीनों पर तत्काल रोक लगाएं और अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करें।

बुधवार को हुई सुनवाई में जब यह बात सामने आई कि अधिकारियों ने अब तक अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की है, तो खंडपीठ ने गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में पूछा कि आखिर पूर्व के आदेशों को अब तक अमल में क्यों नहीं लाया गया? अब सरकार को दो सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करना होगा कि मशीनों पर रोक लगाने के आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ।


नंधौर रेंज विवाद: जनप्रतिनिधियों और वन विभाग के बीच तलवारें खिंची

एक तरफ कोसी नदी का मामला गरमाया हुआ है, तो दूसरी तरफ हल्द्वानी के चोरगलिया थाना क्षेत्र के नंधौर रेंज में वन विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच कानूनी जंग छिड़ गई है। मामला अगस्त 2025 का है, जब वन विभाग की टीम लखनमंडी क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने पहुंची थी।

विवाद की मुख्य बातें:

  • समाजसेवियों का विरोध: समाजसेवी भुवन पोखरिया, प्रतीक्षा पांडे और महेश जोशी ने एक स्थानीय निवासी के घर को ढहाए जाने का विरोध किया था।

  • BNS के तहत मुकदमा: मौके पर हुए कथित समझौते के बावजूद, वन क्षेत्राधिकारी की तहरीर पर इन समाजसेवियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 132, 221 और 352 के तहत ‘सरकारी कार्य में बाधा’ का मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

  • हाईकोर्ट की शरण: अब भुवन पोखरिया ने इस एफआईआर (FIR) को निरस्त करने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।


समझौते की कॉपी बनी मुख्य आधार

समाजसेवी भुवन पोखरिया की ओर से पैरवी करते हुए कोर्ट को बताया गया कि घटना के समय वन विभाग के अधिकारियों (SBO Forest) और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच एक लिखित समझौता हुआ था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब मामला आपसी सहमति से सुलझ गया था, तो बाद में द्वेषवश मुकदमा दर्ज करना न्यायसंगत नहीं है।

न्यायालय ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए डीएफओ (DFO) हल्द्वानी वन प्रभाग को आगामी शनिवार तक अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई शनिवार को तय की गई है, जिस पर पूरे हल्द्वानी और वन विभाग की नजरें टिकी हैं।

प्रशासन की जवाबदेही तय होना जरूरी

नैनीताल हाईकोर्ट के ये दोनों ही आदेश उत्तराखंड के प्रशासनिक ढर्रे पर बड़े सवाल खड़े करते हैं। चाहे वह कोसी नदी में उत्तराखंड हाईकोर्ट अवैध खनन सुनवाई का मामला हो या नंधौर में अतिक्रमण विरोधी अभियान का, दोनों ही जगह अधिकारियों की जवाबदेही संदिग्ध नजर आ रही है। कोसी नदी के मामले में अगर बिजली के टावर गिरते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

कोर्ट की सख्ती ने यह साफ कर दिया है कि पर्यावरण और जन सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले तत्वों और ढिलाई बरतने वाले अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा। अब सबकी नजरें दो सप्ताह बाद होने वाली रिपोर्ट और शनिवार को आने वाले डीएफओ के जवाब पर टिकी हैं।

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