नई दिल्ली: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार को रोकने के लिए बनाए गए SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के कुछ प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण दलीलें सामने आईं। याचिकाकर्ताओं की ओर से कानून के कुछ प्रावधानों को संविधान में दिए गए समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा कानूनी सुरक्षा के अधिकारों के संदर्भ में चुनौती दी गई। हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और कहा कि इस कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट पहले भी बरकरार रख चुका है।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने SC/ST Act के कथित दुरुपयोग, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे की व्यवस्था से जुड़े कई सवाल अदालत के सामने रखे। उन्होंने दावा किया कि कानून के तहत बड़ी राशि का मुआवजा वितरित किया गया है और गलत मामलों की आशंका को देखते हुए व्यवस्था में अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत है।
हालांकि, ये सभी बातें याचिकाकर्ताओं की ओर से रखी गई दलीलें और आरोप हैं। किसी विशेष मामले में कानून का दुरुपयोग हुआ या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होता है।
2020 के फैसले का सुप्रीम कोर्ट ने दिया हवाला
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह महत्वपूर्ण बात कही गई कि SC/ST Act की संवैधानिक वैधता से जुड़े प्रावधानों को अदालत पहले भी देख चुकी है। वर्ष 2020 में तीन जजों की पीठ ने संबंधित प्रावधानों को बरकरार रखा था।
SC/ST Act को लेकर सुप्रीम कोर्ट का न्यायिक रिकॉर्ड लंबे समय से विकसित होता रहा है। वर्ष 2018 में Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra मामले में गिरफ्तारी और प्रारंभिक जांच से संबंधित कुछ दिशानिर्देश दिए गए थे। इसके बाद संसद ने 2018 में कानून में संशोधन कर धारा 18-A जोड़ी। इस संशोधन के जरिए FIR दर्ज करने से पहले preliminary enquiry और गिरफ्तारी से पहले approval जैसी आवश्यकताओं को कानून के स्तर पर हटाया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में इस संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला दिया।
इसी कानूनी पृष्ठभूमि को वर्तमान याचिका में भी चुनौती का आधार बनाया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने किन धाराओं को चुनौती दी?
बृजभूषण सैनी और 18 अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल याचिका में SC/ST Act की कई धाराओं को चुनौती दी गई है। इनमें धारा 3(1), 3(2)(i), 3(2)(v), 4, 8, 18, 18-A और 19 शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन प्रावधानों में से कुछ का इस्तेमाल ऐसी परिस्थितियों में भी हो सकता है जहां आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप बाद में सही साबित न हों। उनका तर्क है कि ऐसी स्थिति में व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 का भी हवाला दिया गया है। अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार से जुड़ा है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा तथा अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
धारा 18-A को लेकर सबसे ज्यादा आपत्ति
याचिकाकर्ताओं की दलीलों में धारा 18-A विशेष रूप से चर्चा में रही। उनका कहना है कि इस प्रावधान के तहत SC/ST Act के मामलों में FIR दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और गिरफ्तारी के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था भी नहीं है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ गलत या दुर्भावनापूर्ण शिकायत दर्ज होती है, तो बिना प्रारंभिक जांच के पुलिस कार्रवाई होने की संभावना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, कानून बनाने का मूल उद्देश्य SC/ST समुदाय के खिलाफ अत्याचार के मामलों में प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। इसलिए इस मुद्दे में एक तरफ पीड़ितों को तत्काल कानूनी संरक्षण देने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ गलत शिकायत या कानून के कथित दुरुपयोग के मामलों में कानूनी सुरक्षा का सवाल भी उठता है।
अग्रिम जमानत पर भी उठाया गया सवाल
याचिका में धारा 18 को भी चुनौती दी गई है। इस प्रावधान के कारण SC/ST Act के तहत दर्ज मामलों में अग्रिम जमानत के संबंध में सामान्य आपराधिक मामलों की तुलना में अलग कानूनी स्थिति बनती है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति पर गलत आरोप लगाए जाते हैं, तो अग्रिम जमानत का रास्ता सीमित होने के कारण उसे गिरफ्तारी का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने अदालत से ऐसे मामलों में व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिशा-निर्देश देने की मांग की है।
यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि अग्रिम जमानत से जुड़े नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों में परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर कानूनी सिद्धांत विकसित हुए हैं। इसलिए हर मामले में आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध सामग्री महत्वपूर्ण होती है।
मुआवजे के 493 करोड़ रुपये का मुद्दा
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने SC/ST Act के तहत पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवजे की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया। उनके अनुसार इस व्यवस्था के तहत लगभग 493 करोड़ रुपये का मुआवजा वितरित किया जा चुका है।
याचिकाकर्ता पक्ष की दलील थी कि मुआवजे की व्यवस्था और FIR की प्रक्रिया के बीच ऐसा संबंध नहीं होना चाहिए जिससे गलत शिकायत दर्ज कराने के लिए किसी व्यक्ति को प्रोत्साहन मिले।
हालांकि, मुआवजा दिए जाने का उद्देश्य SC/ST अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों को आर्थिक सहायता और तत्काल राहत प्रदान करना है। इसलिए किसी भी मामले में यह देखना आवश्यक होता है कि मुआवजा किस कानूनी प्रावधान और निर्धारित प्रक्रिया के तहत दिया गया है।
सिर्फ मुआवजे की कुल राशि को आधार बनाकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी मामले गलत थे या सभी FIR मुआवजे के लिए दर्ज कराई गई थीं।
कानून के कथित दुरुपयोग का मुद्दा
याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने SC/ST Act के कथित दुरुपयोग की बात भी रखी। उनका कहना है कि कुछ मामलों में कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत विवादों या अन्य परिस्थितियों में किया जा सकता है।
दूसरी ओर, इस कानून का मूल उद्देश्य जाति आधारित अत्याचार और भेदभाव से प्रभावित लोगों को प्रभावी कानूनी सुरक्षा देना है। ऐसे में कानून के दुरुपयोग की शिकायत और कानून की आवश्यकता—दोनों को अलग-अलग कानूनी प्रश्नों के रूप में देखना जरूरी है।
किसी कानून के खिलाफ व्यक्तिगत मामले या आरोप सामने आने मात्र से पूरा कानून असंवैधानिक नहीं हो जाता। इसी वजह से अदालतें सामान्यतः कानून की संवैधानिक वैधता और किसी विशेष मामले में उसके गलत इस्तेमाल के सवाल को अलग-अलग देखती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से क्यों किया इनकार?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कानून की संवैधानिक स्थिति और पहले के न्यायिक फैसलों का संदर्भ दिया। अदालत के रुख से यह स्पष्ट है कि संबंधित प्रावधान पहले न्यायिक समीक्षा से गुजर चुके हैं और अदालत उन्हें बरकरार रख चुकी है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि SC/ST Act के तहत दर्ज किसी विशेष FIR या मामले में आरोपी को कोई कानूनी राहत नहीं मिल सकती। गलत FIR, जांच में खामी, गिरफ्तारी या जमानत जैसे सवालों को संबंधित मामले के तथ्यों के आधार पर उचित अदालत के सामने उठाया जा सकता है।
SC/ST Act का उद्देश्य क्या है?
Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना, ऐसे अपराधों के मामलों में विशेष कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराना और पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास की व्यवस्था करना है।
कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो सामान्य आपराधिक कानून से अलग विशेष सुरक्षा प्रदान करते हैं। इसका कारण यह है कि संसद ने SC/ST समुदाय के खिलाफ होने वाले विशिष्ट प्रकार के अत्याचारों को रोकने के लिए अलग कानूनी ढांचा तैयार किया है।
इसी विशेष कानूनी व्यवस्था को लेकर समय-समय पर अदालतों में संवैधानिक और प्रक्रियात्मक सवाल उठते रहे हैं।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्तमान याचिका पर सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद SC/ST Act के संबंधित प्रावधानों की संवैधानिक स्थिति में इस याचिका के कारण कोई बदलाव नहीं हुआ है।
हालांकि, कानून के कथित दुरुपयोग, गलत FIR, गिरफ्तारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवाल आगे भी अलग-अलग मामलों में अदालतों के सामने उठाए जा सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके खिलाफ गलत या दुर्भावनापूर्ण मामला दर्ज किया गया है, तो उसके पास उपलब्ध कानूनी उपाय संबंधित मामले की परिस्थितियों के अनुसार तय होंगे।
फिलहाल इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि SC/ST Act को चुनौती देने वाली याचिका में कानून के कई प्रावधानों, गिरफ्तारी की प्रक्रिया, अग्रिम जमानत और मुआवजे की व्यवस्था पर सवाल उठाए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पहले के संवैधानिक फैसलों और कानून में मौजूद सुरक्षा उपायों का हवाला देते हुए इस स्तर पर याचिका सुनने से इनकार कर दिया।
यह मामला एक बार फिर इस व्यापक कानूनी बहस को सामने लाता है कि SC/ST समुदाय को अत्याचार से प्रभावी सुरक्षा देने और साथ ही किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया की रक्षा के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए। इस संतुलन को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित कानून, न्यायिक फैसलों और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।
