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हिमालय में भारत का ऐतिहासिक ‘महा-ब्रेकथ्रू’: दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब ‘जोजिला टनल’ का फाइनल ब्लास्ट पूरा, सालभर खुला रहेगा लद्दाख का रास्ता

श्रीनगर/नई दिल्ली: भारतीय इंजीनियरिंग के इतिहास में आज का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील और भौगोलिक रूप से दुनिया के सबसे दुर्गम इलाकों में शुमार जोजिला दर्रे (Zojila Pass) को फतह करते हुए भारत ने एक अभूतपूर्व कामयाबी हासिल की है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने रविवार को इस महा-परियोजना के अंतिम छोर को जोड़ने वाले ‘जोजिला टनल का काम’ को गति देते हुए फाइनल ब्लास्ट (Breakthrough) किया। इस अंतिम सफल धमाके के साथ ही सुरंग की खुदाई का सबसे पेचीदा, खतरनाक और चुनौतीपूर्ण हिस्सा पूरी तरह संपन्न हो गया है।

अब वह दिन दूर नहीं जब बर्फीले तूफानों और एवलांच के कारण देश के बाकी हिस्सों से महीनों कटे रहने वाले लद्दाख में हर मौसम (All-Weather) कनेक्टिविटी का सपना हकीकत में बदल जाएगा। यह टनल न केवल कश्मीर घाटी को लद्दाख से जोड़ेगी, बल्कि चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर भारत की सैन्य ताकत और रसद आपूर्ति (Logistics) की रीढ़ साबित होगी।

इंजीनियरिंग का बेजोड़ अजूबा: 11,578 फीट की ऊंचाई पर इतिहास निर्माण

इस महत्वाकांक्षी जोजिला टनल प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने का जिम्मा हैदराबाद की प्रतिष्ठित अवसंरचना कंपनी मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MEIL) के पास है। कंपनी के शीर्ष प्रबंधन का कहना है कि यह सुरंग वैश्विक पटल पर भारत की उन्नत और आत्मनिर्भर होती इंजीनियरिंग क्षमताओं का जीता-जागता प्रतीक है।

समुद्र तल से लगभग 11,578 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर बनाई जा रही यह सुरंग 30 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबे एप्रोच रोड और टनल नेटवर्क का हिस्सा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दुनिया की सबसे लंबी सिंगल-ट्यूब टनल रोड है। यह सुरंग द्रास और करगिल जैसे अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों को पार करते हुए श्रीनगर और लेह के बीच पूरे साल निर्बाध आवाजाही को संभव बनाएगी। वर्तमान में यह रणनीतिक मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग-1 (NH-1) का अभिन्न अंग है, जो सर्दियों में भारी बर्फबारी के चलते कम से कम 5 से 6 महीने पूरी तरह बंद रहता था।

भारत की सैन्य ताकत को मिलेगा ‘सुपर बूस्टर’: LOC और LAC पर पैनी नजर

रणनीतिक और सैन्य दृष्टिकोण से इस सुरंग का महत्व किसी भी मिसाइल या लड़ाकू विमान से कम नहीं है। मई-जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई हिंसक झड़प और उसके बाद उपजे सैन्य गतिरोध ने भारत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि मुश्किल मौसम में सीमा तक भारी हथियारों और कुमुक को पहुंचाना कितना चुनौतीपूर्ण है।

इस सुरंग के पूरी तरह चालू होने के बाद भारतीय सेना पाकिस्तान से सटी नियंत्रण रेखा (LOC) और चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर अपनी ऑपरेशनल तैयारियों को कई गुना बढ़ा सकेगी।

MEIL के जनरल मैनेजर हरपाल सिंह ने इस ऐतिहासिक ब्रेकथ्रू पर भावुक होते हुए कहा:

“यह प्रोजेक्ट हमारे लिए सिर्फ एक ठेका या निर्माण कार्य नहीं था, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़ा एक सपना था जो आज सच हो रहा है। इसके माध्यम से भारतीय सैनिकों, टैंकों, तोपों और सैन्य साजो-सामान (Military Hardware) की आवाजाही माइनस डिग्री तापमान में भी बिना रुके हो सकेगी। सीमावर्ती इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में यह मील का पत्थर है।”

सुरक्षा अधिकारियों का यह भी कहना है कि टनल को आम जनता के लिए पूरी तरह से खोलने से पहले ही, यदि कोई आपातकालीन स्थिति (Emergency) आती है, तो सेना और स्थानीय नागरिकों को इसके भीतर से सुरक्षित निकालने या रसद भेजने के लिए इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया जाएगा।

‘NATM’ तकनीक और 90% कश्मीरी जांबाजों का हौसला

हिमालय की पहाड़ियां अपनी कच्ची मिट्टी और भुरभुरी चट्टानों के लिए जानी जाती हैं, जिसके कारण यहाँ सुरंग बनाना दुनिया में सबसे खतरनाक माना जाता है। इस भौगोलिक चुनौती से निपटने के लिए MEIL के इंजीनियरों ने ‘न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड’ (NATM) का उपयोग किया है। यह अत्याधुनिक तकनीक हिमालय की कमजोर और अनिश्चित भूगर्भीय संरचनाओं के बीच चट्टानों को स्थिरता देते हुए सुरक्षित खुदाई करने में पूरी तरह कारगर साबित हुई है।

इस टनल के निर्माण के पीछे देश के आम कामगारों और स्थानीय युवाओं की अटूट राष्ट्रभक्ति भी छिपी है। जनरल मैनेजर हरपाल सिंह ने बताया कि सर्दियों के दिनों में जब जोजिला का तापमान माइनस 25 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे लुढ़क जाता था और सांस लेना तक दूभर होता था, तब भी मजदूरों ने शिफ्टों में दिन-रात काम किया। गर्व की बात यह है कि इस सुरंग को बनाने वाले कुल कार्यबल में 90 प्रतिशत स्थानीय कश्मीरी युवा शामिल हैं। पिछले पांच वर्षों में सैकड़ों कश्मीरी इंजीनियरों और मजदूरों ने हाड़ कंपा देने वाली ठंड और एवलांच के खतरों के बीच इस राष्ट्रीय संपत्ति को आकार दिया है।

आर्थिक तरक्की और पर्यटन का नया सवेरा: ₹6,809 करोड़ की महा-योजना

प्रेस इंफर्मेशन ब्यूरो (PIB) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जोजिला टनल के निर्माण की कुल अनुमानित लागत 6,809.69 करोड़ रुपये है। इस भारी-भरकम निवेश का प्रतिफल भी उतना ही बड़ा होने वाला है। टनल बनने से श्रीनगर से लेह की दूरी तय करने में लगने वाले समय में कई घंटों की बचत होगी।

सेना की त्वरित पहुंच के साथ-साथ इसका दूसरा और सबसे बड़ा मानवीय चेहरा लद्दाख के स्थानीय नागरिकों के लिए है। सर्दियों में राशन, दवाओं और ईंधन की कमी से जूझने वाले लद्दाख वासियों को अब मुख्यधारा से कटे रहने का अहसास नहीं होगा। सालभर कनेक्टिविटी रहने से पूरे लद्दाख और कारगिल क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को अभूतपूर्व रफ्तार मिलेगी। देश-विदेश के पर्यटक अब बिना किसी हिचकिचाहट के सर्दियों में भी लद्दाख के अलौकिक सौंदर्य का दीदार करने आ सकेंगे, जिससे स्थानीय होमस्टे, होटल, टैक्सी व्यवसाय और हस्तशिल्प उद्योग को सीधे तौर पर बढ़ावा मिलेगा।

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