
नई दिल्ली: भारतीय आकाश की सुरक्षा को अभेद्य बनाने की दिशा में केंद्र सरकार एक ऐसा कदम उठाने जा रही है, जो रक्षा क्षेत्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना (IAF) के बेड़े में 114 बहुउद्देशीय लड़ाकू विमानों (MRFA) को शामिल करने के लिए करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत वाले प्रस्ताव पर विचार शुरू कर दिया है। यह सौदा न केवल वायुसेना की ‘फायरपावर’ को कई गुना बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भारत की स्थिति को भी मजबूत करेगा।
वायुसेना की ‘घटती स्क्वाड्रन’ का स्थायी समाधान
वर्तमान में भारतीय वायुसेना लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की तुलना में वायुसेना वर्तमान में लगभग 30-31 स्क्वाड्रन के साथ काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि 114 राफेल फाइटर जेट डील (114 Rafale Fighter Jet Deal) इस कमी को पूरा करने और चीन व पाकिस्तान की दोहरी चुनौती (Two-Front War) से निपटने के लिए संजीवनी का काम करेगी।
वायुसेना के बेड़े में पहले से ही 36 राफेल विमान शामिल हैं, जिन्होंने अपनी मारक क्षमता का लोहा मनवाया है। अब 114 और विमानों के आने से वायुसेना की परिचालन क्षमता दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वायुसेनाओं के समकक्ष हो जाएगी।
‘मेक इन इंडिया’: भारत बनेगा रक्षा उत्पादन का हब
इस मेगा डील की सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य शर्त इसका निर्माण स्थल है। रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अनुरूप होगा।
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स्वदेशी निर्माण: इन 114 विमानों का उत्पादन भारत के भीतर ही किया जाएगा।
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तकनीकी भागीदारी: इस सौदे में लगभग 30 प्रतिशत स्वदेशी तकनीक और स्थानीय स्तर पर निर्मित पुर्जों का उपयोग किया जाना अनिवार्य है।
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रोजगार और एयरोस्पेस: इस परियोजना से देश में हजारों कुशल युवाओं को रोजगार मिलेगा और भारत की घरेलू एयरोस्पेस इंडस्ट्री को वैश्विक पहचान मिलेगी।
रणनीतिक बढ़त और तकनीकी हस्तांतरण
फ्रांस की दिग्गज कंपनी डसॉल्ट एविएशन के साथ होने वाली यह संभावित डील भारत और फ्रांस के सामरिक संबंधों को नई गहराई प्रदान करेगी।
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टू-फ्रंट वॉर की तैयारी: राफेल की लॉन्ग-रेंज मिसाइलें (जैसे मीटियर और स्कैल्प) सीमाओं पर भारत को दुश्मन के विमानों और ठिकानों को बिना सीमा पार किए तबाह करने की क्षमता देती हैं।
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टेक्नोलॉजी ट्रांसफर: भारत इस सौदे के माध्यम से महत्वपूर्ण लड़ाकू विमान तकनीक (Transfer of Technology) प्राप्त करने का प्रयास करेगा, जो भविष्य के स्वदेशी प्रोजेक्ट्स जैसे AMCA के लिए भी सहायक होगा।
रक्षा विशेषज्ञों का क्या है कहना?
रक्षा क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक, इस मेगा डील को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। इसमें रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) से लेकर अनुबंध (Contract) पर हस्ताक्षर होने तक कई तकनीकी और वित्तीय चरणों से गुजरना पड़ता है। हालांकि, सरकार इस प्रक्रिया को तेज करने (Fast-track) की कोशिश कर रही है ताकि अगले 5 से 7 वर्षों के भीतर विमानों की डिलीवरी शुरू हो सके।
रक्षा मंत्रालय की आगामी उच्च स्तरीय बैठक में इस प्रस्ताव के तकनीकी पहलुओं और वित्तीय ढांचे पर गहन चर्चा होने की संभावना है। यदि यह सौदा सफल होता है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े रक्षा सौदों में से एक गिना जाएगा।
114 राफेल विमानों की यह खरीद केवल एक रक्षा सौदा नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा निवेश है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत इन विमानों का निर्माण भारत को ‘रक्षा खरीदार’ से ‘रक्षा निर्माता’ बनाने की दिशा में एक बड़ी छलांग साबित होगा। भारतीय वायुसेना के लिए यह डील उसके आधुनिकीकरण और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार होने का सबसे बड़ा जरिया बनेगी।



