नैनीताल: उत्तराखंड में लंबे समय से नियमितीकरण की मांग कर रहे उपनल (UPNL) कर्मचारियों के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में वर्षों से संविदा और आउटसोर्स के आधार पर सेवाएं दे रहे उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण, न्यूनतम वेतनमान और वेतन से जीएसटी/सर्विस टैक्स की कटौती से जुड़े मामले में गुरुवार, 24 सितंबर को सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने मामले की अंतिम सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर 2026 की तारीख निर्धारित की है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ में हुई। कोर्ट के समक्ष सरकार की ओर से कहा गया कि उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए संबंधित नियमावली में संशोधन की आवश्यकता होगी और इसके लिए सरकार को कुछ और समय दिया जाए। हालांकि, कोर्ट ने सरकार की ओर से बार-बार समय मांगे जाने पर नाराजगी जताई और पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुपालन की स्थिति पर सवाल उठाए।
वर्षों से लंबित है नियमितीकरण का मुद्दा
उपनल कर्मचारियों का नियमितीकरण उत्तराखंड में लंबे समय से एक महत्वपूर्ण सेवा संबंधी मुद्दा बना हुआ है। कर्मचारियों का कहना है कि वे प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में वर्षों से लगातार काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें नियमित कर्मचारियों के समान सेवा लाभ नहीं मिल पा रहे हैं।
मामले की कानूनी पृष्ठभूमि वर्ष 2018 के हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ी है। 12 नवंबर 2018 को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ‘कुंदन सिंह बनाम राज्य एवं अन्य’ मामले में उपनल के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों के संबंध में कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। आदेश में राज्य सरकार को उपनल के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित करने की दिशा में कदम उठाने, न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते से संबंधित लाभ सुनिश्चित करने तथा वेतन से जीएसटी या सर्विस टैक्स की कटौती नहीं करने का निर्देश दिया गया था।
बाद में इसी आदेश के अनुपालन को लेकर अवमानना की कार्यवाही भी शुरू हुई। 19 नवंबर 2024 के एक हाईकोर्ट आदेश में दर्ज है कि 2018 के आदेश के अनुपालन को लेकर अवमानना याचिका दाखिल की गई थी और राज्य सरकार से जवाब मांगा गया था। उस आदेश में यह भी दर्ज है कि राज्य की ओर से 2018 के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
सरकार ने मांगा और समय, कोर्ट ने जताई नाराजगी
गुरुवार की सुनवाई में सरकार की ओर से मुख्य रूप से यह तर्क रखा गया कि उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए मौजूदा नियमों में संशोधन करना आवश्यक होगा। इसलिए सरकार को इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए।
हालांकि, कर्मचारियों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सरकार की इस मांग पर सख्त रुख अपनाया। कोर्ट की ओर से यह सवाल उठाया गया कि पूर्व में दिए गए आदेशों के अनुपालन की दिशा में अब तक ठोस निर्णय क्यों नहीं लिया गया।
कर्मचारी पक्ष का आरोप है कि सरकार पिछले करीब एक वर्ष से इस मामले को आगे बढ़ाने के बजाय लगातार समय मांग रही है। कर्मचारियों का कहना है कि लंबे समय से सरकारी विभागों में सेवाएं देने के बावजूद उनकी सेवा स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है।
यही वजह है कि नियमितीकरण का इंतजार कर रहे कर्मचारियों के बीच इस मामले को लेकर असंतोष बना हुआ है।
‘समान कार्य, समान वेतन’ का मुद्दा भी कोर्ट में उठा
सुनवाई के दौरान उपनल कर्मचारी संघ की ओर से एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा भी हाईकोर्ट के सामने रखा गया। कर्मचारी पक्ष ने आरोप लगाया कि समान कार्य के लिए समान वेतन की मांग से जुड़े मामले में कर्मचारियों पर बॉन्ड भरने का दबाव बनाया जा रहा है।
संघ की ओर से कोर्ट को बताया गया कि यदि कर्मचारी समान कार्य के लिए वेतनमान से जुड़े लाभ की मांग करते हैं तो उनसे बॉन्ड भरने को कहा जा रहा है। कर्मचारी पक्ष ने इसे अनुचित बताते हुए कोर्ट के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2018 के हाईकोर्ट के आदेश में उपनल के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते से जुड़े लाभ सुनिश्चित करने का निर्देश दर्ज है।
नियमितीकरण के साथ वेतन और कटौती का भी सवाल
उपनल कर्मचारियों की मांग केवल नियमितीकरण तक सीमित नहीं है। लंबे समय से कर्मचारी न्यूनतम वेतनमान, महंगाई भत्ता और वेतन से होने वाली विभिन्न कटौतियों को लेकर भी अपनी बात न्यायालय के समक्ष रखते रहे हैं।
2018 के हाईकोर्ट के फैसले में स्पष्ट रूप से उपनल के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते से जुड़े लाभ देने तथा वेतन से जीएसटी या सर्विस टैक्स की कटौती नहीं करने के निर्देश दर्ज हैं।
इसी वजह से मौजूदा अवमानना कार्यवाही में कर्मचारियों की नजर इस बात पर भी है कि सरकार पूर्व के न्यायालयीय निर्देशों को किस तरह लागू करने की योजना सामने रखती है।
22 हजार कर्मचारियों पर टिकी नजरें
उपनल कर्मचारी संगठन के अनुसार, नियमितीकरण से जुड़े इस पूरे विवाद का प्रभाव प्रदेश के करीब 22 हजार उपनल कर्मचारियों पर पड़ रहा है। ये कर्मचारी अलग-अलग सरकारी विभागों और संस्थानों में विभिन्न पदों पर सेवाएं दे रहे हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि कई लोग वर्षों से एक ही विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन उनकी सेवा स्थिति संविदा या आउटसोर्स व्यवस्था के दायरे में बनी हुई है। ऐसे में कर्मचारियों के भविष्य, सेवा सुरक्षा और वेतन संबंधी लाभों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
वहीं सरकार की ओर से नियमों में संशोधन की जरूरत का तर्क दिए जाने से अब पूरा मामला इस बात पर केंद्रित हो गया है कि सरकार अदालत के सामने क्या ठोस व्यवस्था प्रस्तुत करती है।
हाईकोर्ट के पुराने फैसले से जुड़ा है मामला
उपनल कर्मचारियों से जुड़ा विवाद नया नहीं है। 2018 के हाईकोर्ट के फैसले में अदालत ने कहा था कि उपनल के माध्यम से सरकारी विभागों में काम कर रहे कर्मचारियों के नियमितीकरण के लिए चरणबद्ध व्यवस्था बनाई जाए। इसी फैसले में न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते से जुड़े लाभ तथा जीएसटी/सर्विस टैक्स की कटौती नहीं करने के निर्देश भी दिए गए थे।
हालांकि, बाद के विभिन्न मामलों में नियमितीकरण को लेकर कानूनी स्थिति अलग-अलग परिस्थितियों और सेवा नियमों के आधार पर सामने आई है। उदाहरण के लिए, जुलाई 2024 के एक हाईकोर्ट मामले में अदालत ने एक अलग संदर्भ में आउटसोर्स कर्मचारियों की नियमित कर्मचारियों के साथ वेतन समानता और नियमितीकरण के दावे पर अलग कानूनी परिस्थितियों का उल्लेख किया था।
इससे स्पष्ट है कि उपनल कर्मचारियों के नियमितीकरण का प्रश्न केवल एक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सेवा नियम, नियुक्ति की प्रकृति, नियमितीकरण की नीति और संबंधित न्यायालयीय आदेशों का अनुपालन जैसे कई कानूनी पहलू शामिल हैं।
7 अक्टूबर को क्या होगा?
अब सभी की नजरें 7 अक्टूबर 2026 को होने वाली अंतिम सुनवाई पर टिकी हैं। गुरुवार की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने इस मामले को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।
इस सुनवाई में सरकार की ओर से यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि पूर्व न्यायालयीय निर्देशों के अनुपालन के लिए उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं और यदि नियमावली में संशोधन आवश्यक है तो उसकी प्रक्रिया किस स्तर तक पहुंची है।
वहीं कर्मचारी पक्ष की ओर से नियमितीकरण, समान कार्य के लिए वेतन संबंधी मांग और वेतन से जुड़ी कटौतियों के मुद्दे पर अपनी दलीलें रखी जाएंगी।
कर्मचारियों के लिए निर्णायक पड़ाव
उपनल कर्मचारियों के लिए 7 अक्टूबर की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि लंबे समय से चल रहे विवाद में अब हाईकोर्ट ने अंतिम सुनवाई की तारीख तय कर दी है। कर्मचारियों की नजर इस बात पर है कि कोर्ट सरकार के रुख और पूर्व आदेशों के अनुपालन को किस तरह देखता है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि नियमितीकरण का मामला अभी अंतिम रूप से समाप्त नहीं हुआ है और 7 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में आगे की कानूनी दिशा स्पष्ट होगी। तब तक कर्मचारियों और सरकार दोनों की निगाहें हाईकोर्ट की कार्यवाही पर रहेंगी।
