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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > HC के रजिस्ट्रार जनरल खुद से नहीं शुरू कर सकते अनुशासनात्मक कार्रवाई, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, उत्तराखंड न्यायिक अधिकारी बहाली मामले में अहम फैसला
उत्तराखंडफीचर्ड

HC के रजिस्ट्रार जनरल खुद से नहीं शुरू कर सकते अनुशासनात्मक कार्रवाई, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, उत्तराखंड न्यायिक अधिकारी बहाली मामले में अहम फैसला

The Hill India News
Last updated: May 19, 2026 6:23 am
The Hill India News
Published: May 19, 2026
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दिल्ली/देहरादून: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड की एक न्यायिक अधिकारी की बहाली से जुड़े बहुचर्चित मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल अपने स्तर पर किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्रवाई तभी वैध मानी जाएगी जब उसे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या अधिकृत समिति की औपचारिक मंजूरी प्राप्त हो। इस फैसले को न्यायिक प्रशासन और अनुशासनात्मक प्रक्रिया की पारदर्शिता के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है।

यह मामला उत्तराखंड की न्यायिक अधिकारी दीपाली शर्मा से जुड़ा है, जिन्हें हरिद्वार में तैनाती के दौरान अपनी नाबालिग घरेलू सहायिका के साथ कथित शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के आरोपों के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इस पूरे मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की।

सुनवाई के दौरान न्यायिक अधिकारी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनके खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्रवाई विधिसम्मत नहीं थी, क्योंकि इसके लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस की कोई लिखित मंजूरी मौजूद नहीं थी। अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों ने उनके मुवक्किल के खिलाफ साजिश रची और जल्दबाजी में कार्रवाई की गई।

पीठ ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्पष्ट अनुमति आवश्यक है। अदालत ने कहा कि केवल मौखिक अनुमति या टेलीफोन पर हुई बातचीत को कानूनी मंजूरी नहीं माना जा सकता। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से पेश वकील ने कहा कि रजिस्ट्रार जनरल ने चीफ जस्टिस से फोन पर अनुमति लेने के बाद कार्रवाई आगे बढ़ाई थी, लेकिन अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि रजिस्ट्रार जनरल ने अपनी शक्तियों का दायरा पार किया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या अधिकृत प्रशासनिक समिति की विधिवत मंजूरी न हो, तब तक किसी न्यायिक अधिकारी को चार्जशीट जारी नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया न्यायिक सेवा के सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के खिलाफ मानी जाएगी।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तथ्यों की गहराई में जाने से परहेज किया और कहा कि वह केवल कानून के बिंदु पर फैसला दे रहा है। अदालत ने कहा कि वह इस मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले में हस्तक्षेप नहीं करेगा, जिसमें न्यायिक अधिकारी की बहाली को बरकरार रखा गया था। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत ने अनुशासनात्मक कार्रवाई को प्रक्रिया की कानूनी खामियों के आधार पर निरस्त किया है, न कि आरोपों के सत्य या असत्य होने के आधार पर।

दरअसल यह पूरा मामला जनवरी 2018 में सामने आया था, जब हरिद्वार में तैनात सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत भेजी गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक नाबालिग लड़की को घरेलू सहायिका के रूप में अपने घर में रखा हुआ है और उसके साथ शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक प्रताड़ना की जा रही है।

शिकायत मिलने के बाद हरिद्वार के जिला जज ने मामले की जांच की और मौके का निरीक्षण कर रिपोर्ट सौंपी। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि नाबालिग लड़की के शरीर पर कई चोटों के निशान पाए गए। मेडिकल जांच में लगभग 20 चोटों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद न्यायिक अधिकारी को पहले निलंबित किया गया और फिर विभागीय जांच के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

बाद में दीपाली शर्मा ने हाईकोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने विभागीय प्रक्रिया में कई गंभीर खामियां पाईं। अदालत ने पाया कि मूल मेडिकल प्रमाणपत्र रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था और जिस डॉक्टर ने जांच की थी, उसके हस्ताक्षर भी दस्तावेज पर मौजूद नहीं थे। इसके अतिरिक्त अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते समय प्रक्रिया का पालन सर्वोपरि होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में न्यायिक संस्थानों के प्रशासनिक अधिकारों और अनुशासनात्मक प्रक्रिया की सीमाओं को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही यह भी संदेश गया है कि गंभीर आरोपों के मामलों में भी कानूनन निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है और किसी भी स्तर पर अधिकारों का दुरुपयोग स्वीकार नहीं किया जाएगा।

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