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Reading: हरिद्वार जमीन घोटाला: निलंबित IAS अधिकारियों को फिलहाल राहत नहीं, बहाली पर फैसला टला
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उत्तराखंडफीचर्ड

हरिद्वार जमीन घोटाला: निलंबित IAS अधिकारियों को फिलहाल राहत नहीं, बहाली पर फैसला टला

The Hill India News
Last updated: January 3, 2026 4:25 pm
The Hill India News
Published: January 3, 2026
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हरिद्वार: लगभग 54–57 करोड़ की नगर निगम भूमि खरीद में अनियमितताओं के आरोप के बाद निलंबित किए गए जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह और पूर्व नगर आयुक्त वरुण चौधरी के निलंबन की समीक्षा में भी कोई निष्कर्ष नहीं निकल सका, राजनीतिक आरोप‑प्रत्यारोप के बीच सरकार ने फिलहाल स्थिति यथावत रखी।

Contents
घोटाले की पृष्ठभूमिनिलंबन कार्रवाई और जांच प्रक्रियाछह महीने बाद भी राहत नहींराजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आरोपआगे की संभावित कार्रवाई

घोटाले की पृष्ठभूमि

पिछले वर्ष सामने आए इस कथित घोटाले में आरोप है कि हरिद्वार नगर निगम के लिए सराय ग्राम क्षेत्र में 33 बीघा कृषि भूमि को कम मूल्य वाली जमीन होते हुए भी वाणिज्यिक उपयोग के नाम पर कई गुना अधिक कीमत पर खरीदा गया।

शुरुआती जांच में पता चला कि मार्केट वैल्यू करीब 13–15 करोड़ रुपये मानी जा रही थी, जबकि नगर निगम ने यह जमीन लगभग 54–56 करोड़ रुपये में खरीदी, जिससे सरकारी खजाने को भारी वित्तीय नुकसान की आशंका जताई गई।

जांच रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज गति से पूरी की गई और जरूरी समितियों व नियमानुसार अनुमोदन की औपचारिकताओं का पालन ठीक तरह से नहीं किया गया।

आरोप है कि आचार संहिता लागू रहने के दौरान ही यह खरीद प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई और नगर निगम कानून व शासन के स्पष्ट निर्देशों की अनदेखी की गई।

निलंबन कार्रवाई और जांच प्रक्रिया

राज्य सरकार ने प्रारंभिक जांच रिपोर्टों के आधार पर हरिद्वार के तत्कालीन जिलाधिकारी आईएएस कर्मेंद्र सिंह और तत्कालीन नगर आयुक्त व बाद में प्रशासक बने आईएएस वरुण चौधरी को निलंबित कर दिया।

इनके साथ तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह और नगर निगम से जुड़े अन्य अधिकारियों‑कर्मचारियों पर भी निलंबन सहित विभागीय कार्रवाई शुरू की गई, कुल मिलाकर एक दर्जन से अधिक अधिकारियों‑कर्मचारियों पर सख्त कदम उठाए गए।

मामले की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी आईएएस अधिकारी रणवीर सिंह चौहान को सौंपी गई, जिन्होंने मौके का निरीक्षण, संबंधित फाइलों की पड़ताल और जमीन बेचने वाले पक्षों एवं अधिकारियों से पूछताछ कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी।

उनकी जांच में भूमि उपयोग बदलाव, लैंड पूल कमेटी का गठन न होना, प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और अत्यधिक भुगतान जैसे कई गंभीर सवाल उठाए गए, जिसके बाद इस पूरे प्रकरण को उच्च स्तर पर अत्यंत संवेदनशील श्रेणी में रखा गया।

छह महीने बाद भी राहत नहीं

निलंबन की अवधि लगभग छह माह पूरी होने के साथ ही नियमों के तहत इन आईएएस अधिकारियों के मामले की नियमित समीक्षा की प्रक्रिया शुरू की गई।

इसी कड़ी में मुख्य सचिव आनंद वर्धन की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में निलंबन की स्थिति और अब तक की जांच रिपोर्टों पर विचार‑विमर्श किया गया, लेकिन बैठक किसी निर्णायक नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।

मुख्य सचिव ने एक मीडिया मंच से बातचीत में स्पष्ट किया कि फिलहाल निलंबित अधिकारियों को न तो बहाली की कोई अनुमति दी गई है और न ही निलंबन आदेश वापस लेने पर कोई अंतिम निर्णय हुआ है।

परिणामस्वरूप, दोनों आईएएस अधिकारियों की सेवा‑स्थिति यथावत निलंबित ही बनी हुई है और उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आरोप

इस पूरे मामले ने उत्तराखंड की राजनीति में भी तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल सहित विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार बाहरी दबावों के चलते कथित तौर पर दोषी माने जा रहे अधिकारियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रही है और उनकी बहाली की तैयारी चल रही है।

गोदियाल के बयानों के तुरंत बाद ही शासन स्तर पर निलंबन की समीक्षा बैठक होना राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, विपक्ष इसे “जनभावनाओं और दबाव” के बीच लिया गया कदम बता रहा है।

हालांकि, सरकार के स्तर से यह संकेत दिया गया है कि किसी भी तरह की ढिलाई देने के बजाय जांच प्रक्रिया को पहले पूर्णता तक पहुंचाना प्राथमिकता रहेगी और अभी तक निलंबन में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

आगे की संभावित कार्रवाई

मामला अब उच्च स्तर की जांच और विभागीय कार्यवाही के दौर में है, जिसमें केवल स्थानीय स्तर के कर्मचारियों ही नहीं बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। शासन ने इस घोटाले से जुड़े वित्तीय लेन‑देन, भूमि मूल्यांकन, उपयोग परिवर्तन और अनुमोदन प्रक्रिया की अलग‑अलग स्तर पर समीक्षा कराने के संकेत दिए हैं, ताकि जिम्मेदारी तय कर आगे की दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।

फिलहाल निलंबित आईएएस अधिकारियों की वापसी पर कोई निर्णय न होने से संकेत मिलता है कि सरकार मामले में सख्त रुख बनाए रखना चाहती है और अंतिम फैसला विस्तृत कानूनी व विभागीय राय मिलने के बाद ही लिया जाएगा।

अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि आगामी समीक्षा बैठकों में निलंबन जारी रखने, बहाली, या किसी कठोर दंडात्मक कार्रवाई में से कौन‑सा विकल्प चुना जाता है और यह मामला राज्य की ब्यूरोक्रेसी एवं राजनीतिक परिदृश्य को किस हद तक प्रभावित करता है।

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