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उत्तराखंड: हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में ‘नरेन्द्र संगीत सप्ताह’ का भव्य शुभारंभ, लोकगायन परंपरा को मिला नया मंच

The Hill India News
Last updated: April 17, 2026 11:49 am
The Hill India News
Published: April 17, 2026
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श्रीनगर (गढ़वाल), 17 अप्रैल। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र द्वारा उत्तराखण्ड की समृद्ध लोक-संगीत परंपरा और प्रसिद्ध लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के योगदान को सम्मानित करने के उद्देश्य से ‘नरेन्द्र संगीत सप्ताह’ का भव्य आयोजन किया गया। यह आयोजन न केवल लोक संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, बल्कि इसे राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक प्रभावी प्रयास भी बताया जा रहा है।

इस संगीत सप्ताह में देशभर से 80 से अधिक प्रतिभागियों ने अपनी गायन प्रविष्टियां भेजी हैं, जिनमें से चयनित कलाकार इस मंच पर अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं। आयोजन का उद्देश्य गढ़वाली और उत्तराखण्डी लोक संगीत की उस परंपरा को पुनर्जीवित करना है, जिसे नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपने जीवन के 52 वर्षों से अधिक समय से न केवल जीवित रखा है, बल्कि उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई है।

कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह ने कहा कि यह आयोजन अत्यंत सकारात्मक और प्रेरणादायक है, जो आने वाले समय में लोक-संस्कृति के उन्नयन में एक मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की लोक परंपराओं में नरेन्द्र सिंह नेगी का योगदान अतुलनीय है और उनकी रचनात्मकता एवं गायन शैली ने नई पीढ़ी को गहराई से प्रभावित किया है। कुलपति ने उन्हें ऐसे कलाकार के रूप में वर्णित किया जिन्होंने स्वर को संस्कारित भाव और सामाजिक संदेशों से जोड़कर एक नई पहचान स्थापित की है।

प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह ने आगे कहा कि नरेन्द्र सिंह नेगी का नाम केवल उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि वे देश और दुनिया में लोक-संगीत के एक सशक्त प्रतिनिधि के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र की सराहना करते हुए सुझाव दिया कि इसे संगीत के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में विकसित किया जाए, ठीक उसी प्रकार जैसे प्रयाग संगीत समिति से संगीत साधक प्रमाणित होकर निकलते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में यह केन्द्र भी कलाकारों के लिए एक महत्वपूर्ण पहचान मंच बनेगा।

कुलपति ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय में स्थापित गढ़वाली भाषा एवं संस्कृति संरक्षण केन्द्र के माध्यम से क्षेत्रीय भाषा और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का कार्य किया जा रहा है। इस केंद्र के माध्यम से लोक परंपराओं, ढोल-नगाड़ों की संस्कृति और उन सभी कला रूपों को संरक्षित और संवर्धित किया जाएगा, जो उत्तराखण्ड की पहचान हैं। उन्होंने कहा कि यह प्रयास केवल अतीत को संजोने का नहीं बल्कि भविष्य को मजबूत सांस्कृतिक आधार देने का कार्य करेगा।

कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित प्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने विश्वविद्यालय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनके लिए अत्यंत गर्व और सौभाग्य की बात है कि उनके कार्य और योगदान को इतने सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा इस प्रकार के आयोजन युवाओं के लिए एक बड़ा अवसर प्रदान करते हैं, जहां वे अपनी प्रतिभा को मंच दे सकते हैं और लोक संगीत की परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं।

इस अवसर पर नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपने प्रसिद्ध गीत “ठंडो रे ठंडो मेरा पाड़ै कि हवा, ठंडी पाणी ठंडो” की प्रस्तुति देकर पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति पर उपस्थित दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत किया और पूरा वातावरण लोक-संगीत की भावनाओं से सराबोर हो गया।

लोक कला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र के संस्थापक डॉ. डी.आर. पुरोहित ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखण्ड में लोक-संगीत की परंपरा को जिस तरह नरेन्द्र सिंह नेगी ने आगे बढ़ाया है, वह किसी भी महान संगीत परंपरा से कम नहीं है। उन्होंने इस संगीत सप्ताह की तुलना बंगाल की रवीन्द्र संगीत परंपरा से करते हुए कहा कि जैसे रवीन्द्र संगीत ने एक सांस्कृतिक पहचान बनाई है, वैसे ही नरेन्द्र सिंह नेगी की गायकी उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुकी है।

उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक कदम है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने में मदद करेगा। इस आयोजन के माध्यम से न केवल प्रसिद्ध कलाकारों को मंच मिल रहा है, बल्कि उन नवोदित कलाकारों को भी अवसर मिल रहा है, जिन्होंने अब तक किसी मंच पर प्रस्तुति नहीं दी थी। यह पहल उन्हें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान कर रही है।

संगीत सप्ताह के पहले दिन सतपुली से हेमलता बिष्ट, ऋषिकेश से अम्बिका किमोठी, देहरादून से डॉ. सर्वेश सुयाल, जैंतोली चौंदकोट से सूमा रावत, लव मैठाणी, अंकित भट्ट, शकुंतला नेगी, प्राची कण्डवाल तथा केंद्र के सहायक निदेशक महेन्द्र सिंह पंवार सहित अनेक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। सभी प्रस्तुतियों ने दर्शकों को लोक-संगीत की गहराई और उसकी सांस्कृतिक महत्ता से परिचित कराया।

कार्यक्रम में हर आयु वर्ग के कलाकारों की भागीदारी देखी गई, जो इस आयोजन की व्यापकता को दर्शाता है। कई ऐसे कलाकार भी मंच पर आए जिन्हें पहली बार सार्वजनिक प्रस्तुति का अवसर मिला। यह पहल उनके लिए आत्मविश्वास और प्रेरणा का स्रोत बनी।

कार्यक्रम का संचालन उपनिदेशक डॉ. संजय पाण्डेय और निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इस अवसर पर कुल सचिव प्रोफेसर वाई.एस. रैवानी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रोफेसर ओ.पी. गुसाईं, डीन नियुक्ति एवं पदोन्नति प्रोफेसर मोहन सिंह पंवार सहित अनेक विशिष्ट अतिथि और बड़ी संख्या में संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे।

कुल मिलाकर यह आयोजन उत्तराखण्ड की लोक-सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो रहा है। ‘नरेन्द्र संगीत सप्ताह’ न केवल एक संगीत समारोह है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है, जो आने वाले समय में राज्य की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करेगा।

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