
नई दिल्ली | विशेष संवाददाता: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने देश की निचली अदालतों की कार्यप्रणाली और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद कड़ी और विचारणीय टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि जिला स्तर के न्यायाधीश (Trial Court Judges) इस समय एक अदृश्य भय के साये में काम कर रहे हैं। उन्हें डर है कि यदि उन्होंने जमानत (Bail) देने के अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया, तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।
न्यायिक स्वतंत्रता पर ‘प्रशासनिक हथौड़े’ का प्रहार
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जिला न्यायपालिका हमारी कानूनी प्रणाली की रीढ़ है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि ट्रायल कोर्ट के जज प्रशासनिक कार्रवाई के डर से योग्य मामलों में भी जमानत देने से कतराते रहेंगे, तो पूरी न्याय प्रणाली चरमरा जाएगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर या किसी न्यायिक आदेश को “गलत विवेकाधिकार” मानकर जजों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू करना उनकी स्वायत्तता पर सीधा हमला है।
उच्च अदालतों पर बढ़ा मुकदमों का ‘अनावश्यक बोझ’
सुप्रीम कोर्ट ने इस डर के दीर्घकालिक परिणामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब जिला अदालतों में जमानत नहीं मिलती, तो आरोपी को मजबूरन हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है।
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बढ़ते मामले: उच्च अदालतें वर्तमान में जमानत याचिकाओं के अंबार से दबी हुई हैं।
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संसाधनों का नुकसान: वे मामले जो जिला स्तर पर ही सुलझ जाने चाहिए थे, वे शीर्ष अदालतों का कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं।
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न्याय में देरी: जमानत याचिकाओं की संख्या बढ़ने से अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक और दीवानी मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है।
मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी का उदाहरण: बर्खास्तगी रद्द
यह पूरी टिप्पणी मध्य प्रदेश के एक न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी से जुड़े मामले में आई। उक्त अधिकारी पर आबकारी अधिनियम के तहत जमानत देने में ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने का आरोप था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि महज संदेह या विवेकाधिकार के कथित गलत इस्तेमाल को भ्रष्टाचार मान लेना उचित नहीं है। अदालत ने पाया कि बिना किसी पुख्ता सबूत के इतनी कठोर कार्रवाई एक न्यायिक अधिकारी के करियर और मनोबल को पूरी तरह नष्ट कर देती है।
जस्टिस पारदीवाला का कड़ा संदेश: “रीढ़ की हड्डी न टूटे”
जस्टिस पारदीवाला ने अपने सहमति मत में लिखा कि जब एक जज के मन में कर्तव्य के बजाय डर हावी हो जाता है, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक अधिकारियों को बिना किसी दबाव के स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का माहौल मिलना चाहिए।
“न्यायिक अधिकारियों की स्वायत्तता ही कानून के शासन (Rule of Law) की गारंटी है। यदि जिला न्यायपालिका कमजोर होगी, तो न्याय की पूरी मीनार ढह जाएगी।” — सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ
हाई कोर्टों को स्पष्ट निर्देश: अपनी भूमिका पहचानें
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) को, जो जिला अदालतों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखते हैं, एक स्पष्ट संदेश दिया है:
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स्वतंत्रता का संरक्षण: हाई कोर्ट यह सुनिश्चित करें कि किसी जज के खिलाफ केवल इसलिए कार्रवाई न हो क्योंकि उसका कानूनी निष्कर्ष अलग था।
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कार्रवाई का आधार: विभागीय कार्यवाही तभी शुरू की जानी चाहिए जब भ्रष्टाचार या गंभीर कदाचार के ठोस प्रमाण हों।
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विवेकाधिकार का सम्मान: कानून के सिद्धांतों के भीतर दिए गए फैसलों को संरक्षण दिया जाना चाहिए।
न्याय प्रणाली में सुधार की दरकार
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय न्यायपालिका में एक बड़े सुधार की ओर इशारा करती है। यह न केवल जजों के अधिकारों की रक्षा करती है, बल्कि जेलों में बंद उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए भी उम्मीद की किरण है, जिनकी जमानत याचिकाएं केवल ‘प्रशासनिक डर’ के कारण खारिज कर दी जाती हैं।



