
नई दिल्ली | विधि संवाददाता राजधानी दिल्ली में साल 2020 में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों की कथित ‘बड़ी साजिश’ (Larger Conspiracy) के मामले में जेल में बंद छात्र नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए सोमवार, 5 जनवरी 2026 का दिन निर्णायक साबित होने वाला है। सुप्रीम कोर्ट इस हाई-प्रोफाइल मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम और गुलफिशा फातिमा समेत सात आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाने जा रहा है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 11 दिनों तक चली मैराथन बहस के बाद 10 दिसंबर 2025 को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। अदालत के इस फैसले पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत के मानकों को प्रभावित कर सकता है।
इन 7 आरोपियों की किस्मत का होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट जिन आरोपियों की जमानत पर फैसला सुनाएगा, उनमें शामिल हैं:
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उमर खालिद (JNU के पूर्व छात्र)
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शरजील इमाम
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गुलफिशा फातिमा
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मीरान हैदर
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शिफा उर रहमान
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मोहम्मद सलीम खान
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शादाब अहमद
बचाव पक्ष की दलील: “बिना ट्रायल 5 साल की जेल सजा जैसी”
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ वकीलों—कपिल सिब्बल, डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और सिद्धार्थ दवे ने कोर्ट के सामने जोरदार दलीलें पेश कीं। बचाव पक्ष का मुख्य जोर ‘ट्रायल में अत्यधिक देरी’ पर रहा।
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सजा पूरी होने का तर्क: वकीलों ने तर्क दिया कि ये आरोपी पिछले 5 से 6 सालों से जेल में हैं। कई मामलों में तो आरोपी उतनी सजा काट चुके हैं, जितनी उन्हें दोषी पाए जाने पर मिल सकती थी।
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कोई पुख्ता सबूत नहीं: कपिल सिब्बल ने उमर खालिद की पैरवी करते हुए कहा कि 2698 पन्नों की विशालकाय चार्जशीट में कहीं भी यह साबित नहीं होता कि आरोपियों ने ‘सरकार बदलने’ (Regime Change) की कोशिश की थी। उन्होंने इसे केवल ‘प्रॉसिक्यूशन की कहानी’ करार दिया।
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भेदभाव का आरोप: अभिषेक मनु सिंघवी ने गुलफिशा फातिमा का पक्ष रखते हुए कहा कि उनकी मुवक्किल 6 साल से सलाखों के पीछे हैं, जबकि इसी तरह के आरोपों वाले अन्य आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है।
दिल्ली पुलिस का कड़ा विरोध: “यह स्वतः स्फूर्त दंगा नहीं था”
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने जमानत का पुरजोर विरोध किया। पुलिस का कहना है कि 2020 के दंगे कोई अचानक हुई घटना नहीं थी, बल्कि भारत की संप्रभुता पर हमला करने के लिए एक ‘सुनियोजित और सुनियोजित साजिश’ थी।
प्रॉसिक्यूशन ने दलील दी कि इन आरोपियों ने व्हाट्सएप ग्रुप्स और गुप्त बैठकों के जरिए हिंसा भड़काने की रणनीति तैयार की थी, जिसके कारण 53 लोगों की जान गई और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ।
कानूनी पेच: हाई कोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट
इससे पहले 2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट ने इन सभी आरोपियों को झटका देते हुए उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने तब कहा था कि दंगे “सोची-समझी साजिश” थे और केवल देरी के आधार पर यूएपीए जैसे गंभीर मामले में जमानत नहीं दी जा सकती। इसी आदेश को आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
न्यायिक जगत की नजरें
सुप्रीम कोर्ट का सोमवार का फैसला न केवल इन सात व्यक्तियों के भविष्य को तय करेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि क्या ‘जेल नहीं, बेल’ (Bail not Jail) का सिद्धांत यूएपीए के तहत लंबे समय तक जेल में बंद विचाराधीन कैदियों पर लागू होता है या नहीं।



