
देहरादून (सूवि): उत्तराखंड सरकार की ‘अंत्योदय’ और जन-सेवा की प्रतिबद्धता धरातल पर उतरती दिख रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मार्गदर्शन में देहरादून जिला प्रशासन ने मानवीय संवेदनाओं की एक नई मिसाल पेश की है। जिलाधिकारी की पहल पर विपरीत परिस्थितियों और घोर आर्थिक तंगी से जूझ रही दो महिलाओं—मीना ठाकुर और अमृता जोशी—के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगी है। प्रशासन ने न केवल उन्हें आर्थिक संबल प्रदान किया है, बल्कि उनके बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ जैसे सुरक्षा कवच भी उपलब्ध कराए हैं।
प्रकरण 1: मीना ठाकुर की संघर्ष गाथा और प्रशासन का साथ
सुद्दोवाला निवासी मीना ठाकुर की कहानी किसी हृदयविदारक फिल्म से कम नहीं है। पिछले 8 वर्षों से मीना के पति लापता हैं। पति के अचानक गायब हो जाने के बाद पांच बच्चों (4 बेटियां और 1 बेटा) की पूरी जिम्मेदारी मीना के कंधों पर आ गई। इनमें से दो बेटियां दिव्यांग हैं, जिनकी देखभाल और उपचार के लिए विशेष संसाधनों की आवश्यकता थी।
प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा से मिली नई शिक्षा: आर्थिक तंगी के कारण मीना के बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूटने की कगार पर थी। जिलाधिकारी ने मामले का संज्ञान लेते हुए मीना ठाकुर को तत्काल 01 लाख रुपये की आर्थिक सहायता सीएसआर (CSR) फंड से प्रदान की। इसके अलावा, प्रशासन ने मीना की तीन बेटियों की शिक्षा को “प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा” के तहत पुनर्जीवित किया है, जिससे अब उनकी पढ़ाई बिना किसी बाधा के जारी रह सकेगी। जिलाधिकारी ने समाज कल्याण और प्रोबेशन अधिकारी को दिव्यांग बेटियों के लिए विशेष पेंशन और सरकारी लाभ सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।

प्रकरण 2: परित्यक्ता अमृता जोशी के लिए ‘मसीहा’ बना प्रशासन
दूसरा मामला खुड़बुड़ा क्षेत्र का है, जहाँ अमृता जोशी नामक महिला दूसरों के घरों में चूल्हा-चौका कर अपने दो बच्चों का पेट पाल रही थीं। अमृता का जीवन तब और कठिन हो गया जब उनका बड़ा बेटा मानसिक विकार की चपेट में आ गया। बेटे के इलाज के खर्च ने परिवार की कमर तोड़ दी।
जब स्कूल और मकान मालिक ने फेर लिया मुंह: गरीबी का दंश इतना गहरा था कि महीनों से स्कूल की फीस जमा न होने के कारण विद्यालय प्रबंधन ने छोटे बेटे को स्कूल से निकाल दिया। हद तो तब हो गई जब किराया न दे पाने के कारण मकान मालिक ने इस असहाय परिवार को घर से बाहर कर दिया। दर-दर की ठोकरें खा रही अमृता जब जिलाधिकारी के पास पहुँची, तो डीएम ने त्वरित जांच के आदेश दिए। उप जिलाधिकारी (न्याय) कुमकुम जोशी की रिपोर्ट के आधार पर अमृता जोशी को भी 01 लाख रुपये की सहायता राशि उनके बैंक खाते में भेजी गई। इस राशि से अमृता न केवल बकाया किराया और फीस चुका पाएंगी, बल्कि अपने बीमार बेटे का इलाज भी करा सकेंगी।
सीएसआर फंड का सार्थक उपयोग और स्वरोजगार की राह
जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह सहायता राशि केवल तात्कालिक राहत नहीं है, बल्कि यह इन महिलाओं को स्वरोजगार (Self-Employment) की ओर प्रेरित करने का एक कदम है। 1-1 लाख रुपये की इस बड़ी पूंजी से मीना और अमृता अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकेंगी, जिससे वे भविष्य में किसी और पर निर्भर न रहें और आत्मनिर्भर बन सकें।
“जिला प्रशासन असहाय, पीड़ित और जरूरतमंद नागरिकों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। हमारा प्रयास है कि कोई भी पात्र व्यक्ति सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित न रहे। मीना और अमृता जैसे मामलों में त्वरित हस्तक्षेप करना प्रशासन का नैतिक और संवैधानिक उत्तरदायित्व है।” – जिलाधिकारी, देहरादून
राष्ट्रीय स्तर की मीडिया शैली: प्रशासन की कार्यप्रणाली का विश्लेषण
देहरादून जिला प्रशासन की यह कार्रवाई दर्शाती है कि ब्यूरोक्रेसी जब फाइलों से निकलकर धरातल पर पहुंचती है, तो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को न्याय मिलता है। ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ और सीएसआर फंड का इस तरह का विवेकपूर्ण उपयोग अन्य जनपदों के लिए भी एक रोल मॉडल साबित हो सकता है। मुख्यमंत्री के विजन के अनुरूप, यह ‘प्रो-पीपल गवर्नेंस’ (Pro-People Governance) का उत्कृष्ट उदाहरण है।



