
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुआ युद्धविराम (सीजफायर) समझौता अब शुरू होने के 24 घंटे के भीतर ही टूटने की कगार पर पहुंच गया है। ईरान ने आरोप लगाया है कि इस समझौते की तीन अहम शर्तों का उल्लंघन किया गया है, जिसके चलते न केवल सीजफायर का भविष्य अधर में लटक गया है, बल्कि प्रस्तावित वार्ता प्रक्रिया पर भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
ईरान की संसद के अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने साफ शब्दों में कहा है कि जब समझौते की बुनियादी शर्तों को ही लागू नहीं किया जा रहा, तो ऐसे में न तो युद्धविराम का कोई अर्थ रह जाता है और न ही बातचीत का। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।
24 घंटे में ही क्यों बिगड़े हालात?
सीजफायर के तहत कुल 10 प्रमुख शर्तें तय की गई थीं, जिनका उद्देश्य क्षेत्र में शांति बहाल करना और आगे की स्थायी डील के लिए माहौल तैयार करना था। लेकिन ईरान का दावा है कि इनमें से तीन अहम शर्तों का उल्लंघन हुआ है।
1. लेबनान में सीजफायर लागू न होना
ईरान के अनुसार पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त थी कि सभी क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से युद्धविराम लागू किया जाए, जिसमें Lebanon भी शामिल था। इस शर्त को Shehbaz Sharif ने भी सार्वजनिक रूप से दोहराया था।
लेकिन ईरान का आरोप है कि Israel ने लेबनान में बड़े पैमाने पर बमबारी जारी रखी, जो इस शर्त का सीधा उल्लंघन है। इससे यह संकेत मिलता है कि जमीनी स्तर पर सीजफायर का पालन नहीं हो रहा।
2. ईरानी हवाई क्षेत्र में ड्रोन घुसपैठ
दूसरी बड़ी शिकायत ईरान की सुरक्षा से जुड़ी है। ईरान का कहना है कि एक घुसपैठ करने वाला ड्रोन उसके हवाई क्षेत्र में दाखिल हुआ, जिसे फार्स प्रांत के लार शहर में मार गिराया गया। यह घटना उस शर्त के खिलाफ मानी जा रही है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि ईरान की संप्रभुता और हवाई क्षेत्र का उल्लंघन नहीं किया जाएगा।
ईरान ने इस घटना को उकसावे वाली कार्रवाई बताते हुए इसे गंभीर सुरक्षा खतरा करार दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं सीजफायर की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।
3. यूरेनियम संवर्धन अधिकार पर विवाद
तीसरी और सबसे संवेदनशील शर्त ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है। ईरान का आरोप है कि उसके यूरेनियम संवर्धन (एनरिचमेंट) के अधिकार को नकारा जा रहा है, जबकि यह अधिकार समझौते की छठी शर्त में शामिल था।
Iran लंबे समय से अपने परमाणु कार्यक्रम को शांतिपूर्ण उद्देश्य के लिए बताता रहा है, जबकि United States और उसके सहयोगी इस पर संदेह जताते रहे हैं। ऐसे में इस मुद्दे पर सहमति न बन पाना पूरे समझौते के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
बातचीत शुरू होने से पहले ही अविश्वास
इस सीजफायर के बाद Islamabad में स्थायी समझौते के लिए बातचीत शुरू होनी थी, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए यह प्रक्रिया भी अनिश्चित हो गई है।
ग़ालिबाफ ने अपने बयान में कहा, “जिस व्यावहारिक आधार पर बातचीत होनी थी, उसे ही पहले तोड़ दिया गया है। ऐसे में बातचीत करना तर्कसंगत नहीं है।” इस बयान से साफ है कि ईरान फिलहाल कड़े रुख में है और वह बिना शर्तों के पालन के आगे बढ़ने के पक्ष में नहीं है।
क्षेत्रीय और वैश्विक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सीजफायर पूरी तरह टूटता है, तो इसका असर पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र पर पड़ेगा। Israel, Iran और United States के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक सुरक्षा और तेल बाजार पर भी प्रभाव डाल सकता है।
इसके अलावा, यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए भी एक बड़ा झटका साबित हो सकता है, क्योंकि कई देशों ने इस समझौते को शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना था।
फिलहाल स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। यदि संबंधित पक्ष जल्द ही इन उल्लंघनों पर स्पष्टता और समाधान नहीं निकालते, तो यह संघर्ष और गहरा सकता है। वहीं, अगर कूटनीतिक प्रयास तेज किए जाते हैं, तो अभी भी स्थिति को संभाला जा सकता है।
कुल मिलाकर, 24 घंटे के भीतर ही सीजफायर पर मंडराता संकट यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों में भरोसा और पारदर्शिता कितनी महत्वपूर्ण होती है। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या यह समझौता बच पाएगा या क्षेत्र एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ेगा।



