
हैदराबाद | समाचार ब्यूरो तेलंगाना की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाले एक बड़े घटनाक्रम में, राज्य विधानसभा ने शनिवार को तेलंगाना पंचायत राज (संशोधन) विधेयक, 2026 को सर्वसम्मति से पारित कर दिया। इस विधेयक के पारित होने के साथ ही राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए ‘दो बच्चों की अनिवार्यता’ का 30 साल पुराना नियम आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया है।
अब दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति भी पंचायत और नगर निगमों के चुनाव लड़ने के लिए पात्र होंगे। सरकार का यह कदम राज्य में तेजी से गिरती प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) और भविष्य की जनसांख्यिकीय चुनौतियों को देखते हुए उठाया गया है।
क्यों बदला गया 1994 का नियम?
पंचायत राज मंत्री दानसारी अनुसूया सीताक्का ने सदन में विधेयक पेश करते हुए इस बदलाव के पीछे के ठोस तर्क रखे। उन्होंने बताया कि यह नियम 1994 में तब लागू किया गया था जब देश ‘जनसंख्या विस्फोट’, खाद्य सुरक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा था।
बदलाव के मुख्य कारण:
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घटती प्रजनन दर: तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान प्रजनन दर गिरकर 1.7 पर आ गई है।
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भविष्य का संकट: यदि प्रजनन दर इसी स्तर पर रही, तो आने वाले दशकों में राज्य में कार्यबल (Working Population) की कमी और बुजुर्गों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो सकती है।
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संतुलन की आवश्यकता: सरकार का लक्ष्य राज्य की प्रजनन दर को 2.1 (रिप्लेसमेंट लेवल) पर स्थिर करना है, ताकि जनसांख्यिकीय संतुलन बना रहे।
पंचायत राज अधिनियम, 2018 में संशोधन
मंत्री सीताक्का ने स्पष्ट किया कि 30 साल पहले की स्थितियां आज से बिल्कुल अलग थीं। सरकार ने पंचायत राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों के सुझावों और विशेषज्ञों की राय के बाद तेलंगाना पंचायत राज अधिनियम, 2018 में संशोधन का प्रस्ताव रखा।
सदन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “प्रजनन दर का 1.7 पर बना रहना तेलंगाना के दीर्घकालिक हितों के लिए हानिकारक है। हमें आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अपनी नीतियों को लचीला बनाना होगा।”
सियासी और सामाजिक निहितार्थ
स्थानीय निकाय चुनावों के करीब होने के कारण इस फैसले को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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अधिक उम्मीदवारों की भागीदारी: इस संशोधन के बाद ग्रामीण क्षेत्रों के कई कद्दावर नेता, जो दो से अधिक बच्चों के कारण अयोग्य थे, अब चुनावी मैदान में उतर सकेंगे।
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जनसंख्या नीति में बदलाव का संकेत: तेलंगाना का यह फैसला राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन सकता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्य अभी भी ‘दो बच्चों की नीति’ को कड़ाई से लागू करने की वकालत कर रहे हैं।
जनसांख्यिकीय सुरक्षा की ओर कदम
तेलंगाना सरकार का यह निर्णय दर्शाता है कि अब भारत के कुछ राज्यों में चिंता ‘जनसंख्या विस्फोट’ की नहीं, बल्कि ‘जनसंख्या असंतुलन’ की है। 2.1 की प्रजनन दर को आदर्श मानते हुए सरकार ने स्थानीय स्वशासन में अधिक समावेशी भागीदारी का रास्ता साफ कर दिया है। विधेयक के पारित होने के बाद अब इसे राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद यह पूरे राज्य में कानून के रूप में प्रभावी हो जाएगा।



