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UP: मिशन 2027 के लिए BJP की बड़ी ‘सर्जरी’, मंत्रिमंडल विस्तार और संगठन में बदलाव की सुगबुगाहट तेज

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बिगुल बजने में अभी भले ही करीब दस महीने का वक्त शेष हो, लेकिन सूबे की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। शनिवार को मुख्यमंत्री आवास पर हुई एक उच्च स्तरीय बैठक ने राज्य के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह की लंबी मुलाकात के बाद यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि सरकार और संगठन के भीतर बहुत जल्द बड़े फेरबदल होने जा रहे हैं।

बैठक का एजेंडा: क्या है BJP का ‘मास्टर प्लान’?

शनिवार को हुई इस बैठक को ‘मिशन 2027’ की नींव के तौर पर देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व इस बात पर मंथन कर रहा है कि आगामी चुनाव से पहले टीम योगी और संगठन के ढांचे को कैसे नया रूप दिया जाए। इस चर्चा के केंद्र में न केवल नए चेहरों को जगह देना है, बल्कि उन मंत्रियों की छुट्टी करना भी शामिल हो सकता है जिनका रिपोर्ट कार्ड उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा है।

विनोद तावड़े का लखनऊ दौरा: दिल्ली की पैनी नजर

उत्तर प्रदेश की इस ‘सियासी सर्जरी’ को अंतिम रूप देने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े कल लखनऊ पहुंच रहे हैं। तावड़े का यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा है। वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष और महामंत्री संगठन के साथ अलग-अलग चरणों में फीडबैक लेंगे।

माना जा रहा है कि विनोद तावड़े केंद्रीय नेतृत्व का ‘संदेश’ लेकर आ रहे हैं। संगठन में बदलाव की प्रक्रिया इसी महीने पूरी की जा सकती है, ताकि नई टीम को चुनाव की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सके। हालांकि, मंत्रिमंडल विस्तार की तारीखों को लेकर पेंच अभी फंसा हुआ है।

मंत्रिमंडल फेरबदल: बंगाल चुनाव का ‘कनेक्शन’

यूपी के मंत्रिमंडल में फेरबदल को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि चुनाव से पहले मंत्रिमंडल का पुनर्गठन अनिवार्य है ताकि क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधा जा सके। लेकिन, केंद्रीय नेतृत्व का पूरा फोकस फिलहाल पश्चिम बंगाल के चुनाव पर है।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि अप्रैल में बड़े बदलाव की संभावना कम है। मंत्रिमंडल में संभावित बदलाव बंगाल चुनाव के नतीजों और वहां की व्यस्तता खत्म होने के बाद ही संभव लग रहे हैं। दिल्ली दरबार का मानना है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में फेरबदल के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा की सीधी भागीदारी जरूरी है, जो अभी बंगाल में मोर्चा संभाले हुए हैं।

सपा के ‘PDA’ काट और लोकसभा की ‘चोट’ से सबक

हालिया लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने बीजेपी को तगड़ा झटका दिया था। सूत्रों की मानें तो बीजेपी इस बार उस गलती को दोहराना नहीं चाहती। संभावित बदलावों में जातिगत संतुलन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है:

  • जातीय समीकरण: गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्ग को मंत्रिमंडल व संगठन में अधिक प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है।

  • क्षेत्रीय संतुलन: पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के उन इलाकों को तवज्जो दी जाएगी जहां लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा था।

  • युवा चेहरे: सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को कम करने के लिए कुछ पुराने चेहरों को संगठन में भेजकर नए और ऊर्जावान युवाओं को सरकार में शामिल किया जा सकता है।

हिंदुत्व, विकास और ‘योगी मॉडल’

2027 की चुनावी जंग में बीजेपी की रणनीति स्पष्ट है। पार्टी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दस साल के कार्यकाल की उपलब्धियों को ढाल बनाएगी। साथ ही, ‘हिंदुत्व’ के मूल एजेंडे और ‘डबल इंजन’ सरकार के विकास कार्यों को पीएम मोदी के चेहरे के साथ जनता के बीच ले जाने की तैयारी है। संगठन को इस तरह से कसने की कवायद चल रही है कि बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे।

लखनऊ से दिल्ली तक जारी इस सुगबुगाहट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश को किसी भी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देना चाहती। आने वाले कुछ सप्ताह यूपी की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होंगे। क्या ये बदलाव बीजेपी को 2027 में फिर से पूर्ण बहुमत दिला पाएंगे? या विपक्ष की घेराबंदी बीजेपी की इस रणनीति पर भारी पड़ेगी? यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल लखनऊ की राजनीति ‘बदलाव’ के मुहाने पर खड़ी है।

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