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बांग्लादेश में ‘रहमान राज’ का आगाज: तारिक रहमान बने प्रधानमंत्री; मंत्रिमंडल में हिंदू और बौद्ध चेहरों को शामिल कर दिया बड़ा संदेश

The Hill India News
Last updated: February 17, 2026 1:03 pm
The Hill India News
Published: February 17, 2026
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ढाका/नई दिल्ली (ब्यूरो): पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में एक नए युग की शुरुआत हो गई है। दशकों तक ‘दो बेगमों’ (खालिदा जिया और शेख हसीना) के बीच घूमती सत्ता की धुरी अब तारिक रहमान (Tarique Rahman) के हाथों में आ गई है। मंगलवार को एक ऐतिहासिक और भव्य समारोह में तारिक रहमान ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली।

Contents
बंगभवन नहीं, ‘जातीय संसद’ में हुआ शपथ ग्रहणमंत्रिमंडल में ‘अल्पसंख्यक’ चेहरों की एंट्री1. निताई रॉय चौधरी (हिंदू नेता):2. दीपेन दीवान चकमा (बौद्ध नेता):BNP की बड़ी जीत और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों का प्रदर्शन49 सदस्यीय मंत्रिमंडल: विभागों का इंतजारभारत के लिए क्या हैं मायने?चुनौतियों भरा है सफर

इस शपथ ग्रहण समारोह की सबसे खास बात प्रधानमंत्री का समावेशी दृष्टिकोण रहा। कट्टरपंथ और राजनीतिक अस्थिरता के आरोपों से घिरी रहने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने अपनी नई सरकार में अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देकर दुनिया को एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। तारिक रहमान के मंत्रिमंडल में एक हिंदू और एक बौद्ध नेता को कैबिनेट मंत्री के रूप में जगह दी गई है।

बंगभवन नहीं, ‘जातीय संसद’ में हुआ शपथ ग्रहण

परंपराओं को तोड़ते हुए राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 60 वर्षीय तारिक रहमान को बंगभवन (राष्ट्रपति भवन) के बजाय जातीय संसद के साउथ प्लाजा में शपथ दिलाई। इससे पहले दिन में, नवनिर्वाचित सांसदों ने सर्वसम्मति से तारिक रहमान को संसदीय दल का नेता चुना था। गौरतलब है कि तारिक रहमान पिछले दो दशकों में बांग्लादेश की सरकार का नेतृत्व करने वाले पहले पुरुष प्रधानमंत्री बन गए हैं। साल 2009 से 2024 तक शेख हसीना के लंबे शासन के बाद देश में यह बड़ा लोकतांत्रिक बदलाव देखा गया है।

मंत्रिमंडल में ‘अल्पसंख्यक’ चेहरों की एंट्री

तारिक रहमान ने अपने 49 सदस्यीय भारी-भरकम मंत्रिमंडल का ऐलान किया है, जिसमें 25 कैबिनेट मंत्री और 24 राज्य मंत्री शामिल हैं। इनमें दो नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं:

1. निताई रॉय चौधरी (हिंदू नेता):

पश्चिमी मगुरा निर्वाचन क्षेत्र से प्रचंड जीत हासिल करने वाले निताई रॉय चौधरी को मंत्रिमंडल में जगह दी गई है। निताई रॉय चौधरी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि बांग्लादेश के प्रतिष्ठित वकील और बीएनपी के शीर्ष रणनीतिकार हैं। वह पार्टी की सर्वोच्च नीति-निर्धारक ‘स्थायी समिति’ के सदस्य भी हैं। खास बात यह है कि उन्होंने चुनाव में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार को मात दी है, जो उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को और मजबूत करता है।

2. दीपेन दीवान चकमा (बौद्ध नेता):

दक्षिण-पूर्वी रंगमती पहाड़ी जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले दीपेन दीवान चकमा को बौद्ध चेहरे के तौर पर कैबिनेट में शामिल किया गया है। चकमा समुदाय से आने वाले दीपेन पेशे से वकील हैं और उनके पिता सुबिमल दीवान पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के सलाहकार रह चुके हैं। उनकी नियुक्ति को पहाड़ी क्षेत्रों और आदिवासी समुदायों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

BNP की बड़ी जीत और अल्पसंख्यक उम्मीदवारों का प्रदर्शन

इस संसदीय चुनाव में बीएनपी के टिकट पर चार अल्पसंख्यक उम्मीदवारों ने जीत का परचम लहराया था। इनमें दो हिंदू नेता— गायेश्वर चंद्र रॉय और निताई रॉय चौधरी शामिल थे, जबकि दो बौद्ध नेता— सचिन प्रू और दीपेन दीवान चकमा ने जीत दर्ज की। तारिक रहमान ने इन विजयी उम्मीदवारों में से दो को कैबिनेट में शामिल कर यह स्पष्ट किया है कि उनकी सरकार ‘सबका साथ’ लेकर चलने की मंशा रखती है।

49 सदस्यीय मंत्रिमंडल: विभागों का इंतजार

प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने मंत्रियों की सूची तो जारी कर दी है, लेकिन अभी विभागों (Portfolios) का बंटवारा होना बाकी है। चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन द्वारा नवनिर्वाचित सांसदों को शपथ दिलाने के कुछ ही घंटों बाद सरकार का शपथ ग्रहण आयोजित किया गया। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी कैबिनेट के जरिए तारिक रहमान अपनी पार्टी के विभिन्न धड़ों और गठबंधन सहयोगियों को संतुष्ट रखने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत के लिए क्या हैं मायने?

बांग्लादेश में हुए इस बड़े बदलाव पर भारत की भी पैनी नजर है। शेख हसीना के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध अपने स्वर्णिम युग में थे। अब तारिक रहमान के नेतृत्व में बीएनपी सरकार के साथ तालमेल बिठाना नई दिल्ली के लिए एक नई कूटनीतिक चुनौती और अवसर दोनों होगा। मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यकों को जगह देना भारत के लिए एक राहत भरी खबर हो सकती है, क्योंकि बांग्लादेश में हिंदुओं की सुरक्षा हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है।

चुनौतियों भरा है सफर

तारिक रहमान के सामने न केवल देश की चरमराई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती है, बल्कि उन्हें अपनी छवि एक उदारवादी नेता के रूप में भी स्थापित करनी होगी। लंबे समय तक निर्वासन में रहने के बाद लौटे तारिक के लिए यह ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं है। फिलहाल, ढाका की सड़कों पर बीएनपी समर्थकों का जश्न जारी है और दुनिया की निगाहें इस नई सरकार के पहले 100 दिनों के कामकाज पर टिकी हैं।

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