देहरादून, 24 अगस्त 2026: भारत की समृद्ध लोक एवं जनजातीय कला परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने और राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में देहरादून में चार दिवसीय लोक एवं जनजातीय कला कार्यशाला, प्रदर्शनी एवं चित्रकला प्रतियोगिता का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर पद्मश्री प्रो. डॉ. बी. के. एस. संजय ने कहा कि लोक और जनजातीय कलाएं केवल मनोरंजन या रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं हैं, बल्कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और राष्ट्रीय पहचान की जीवंत धरोहर हैं।
यह आयोजन उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार और ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी, देहरादून के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का आयोजन 24 से 27 अगस्त तक किया जाएगा, जिसमें कलाकार, शिक्षक, विद्यार्थी और कला-प्रेमी भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, प्रकृति, परंपराओं और राष्ट्रप्रेम से जुड़े विभिन्न विषयों को अपनी रचनात्मकता के माध्यम से प्रस्तुत करेंगे।
कार्यक्रम का शुभारंभ पद्मश्री प्रो. डॉ. बी. के. एस. संजय, अध्यक्ष, एम्स गुवाहाटी ने किया। इस अवसर पर प्रो. डॉ. सुशील उपाध्याय विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि प्रसिद्ध कलाकार श्री आलोक तीरथ भौमिक विशेष अतिथि रहे। कार्यक्रम में प्रो. (डॉ.) प्रमोद एस. नायर, डीन ऑफ एकेडमिक्स, ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी तथा डॉ. आनंद करमाकर, विभागाध्यक्ष, फाइन आर्ट्स/विजुअल आर्ट्स सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और कला-प्रेमी मौजूद रहे।
पद्मश्री प्रो. डॉ. संजय ने अपने संबोधन में कहा कि इस तरह के आयोजन केवल कला प्रदर्शन तक सीमित नहीं होते, बल्कि ये समाज को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता में एकता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में भाषाएं, बोलियां, वेशभूषाएं, लोकगीत, लोकनृत्य और जीवनशैली भले ही अलग-अलग हों, लेकिन यही विविधता भारत की सांस्कृतिक समृद्धि और उसकी विशेष पहचान को मजबूत बनाती है।
उन्होंने कहा कि भारत की लोक और जनजातीय कलाओं में सदियों पुराना इतिहास और समाज की सामूहिक स्मृति छिपी हुई है। लोककला केवल रंगों और आकृतियों का मेल नहीं है, बल्कि यह उस समाज की जीवनशैली, संघर्ष, परंपराओं, विश्वासों और भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इसलिए इन कलाओं को संरक्षित करना केवल कलाकारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है।
कार्यक्रम के दौरान प्रो. डॉ. संजय ने अपनी काव्य-कृति ‘उपहार संदेश का’ से ‘कलाकार’ शीर्षक कविता भी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि समय के साथ किसी कलाकार का बाहरी स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उसकी रचना, संवेदना और सृजन लंबे समय तक जीवित रहते हैं। किसी कलाकार की वास्तविक पहचान उसके चेहरे या व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि उसके द्वारा समाज और संस्कृति को दिए गए सृजन से होती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जैसे महान रचनाकारों की रचनाएं आज भी लोगों के मन में जीवित हैं। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत जैसी कालजयी रचनाएं यह प्रमाणित करती हैं कि साहित्य, संगीत और कला समय की सीमाओं को पार कर आने वाली पीढ़ियों तक अपना प्रभाव बनाए रखती हैं।
प्रो. डॉ. संजय ने कहा कि देश की पारंपरिक और लोक कलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कलाकारों को केवल प्रशंसा ही नहीं, बल्कि उचित प्रशिक्षण, मंच, बाजार और सम्मान भी मिलना चाहिए। यदि लोक कलाकारों और जनजातीय कला से जुड़े रचनाकारों को पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएं, तो भारत की पारंपरिक कला न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान बना सकती है।
उन्होंने युवाओं से विशेष रूप से आह्वान किया कि वे कला को केवल प्रतियोगिता या पुरस्कार प्राप्त करने का माध्यम न समझें। उन्होंने कहा कि कला व्यक्ति की पहचान और उसकी अभिव्यक्ति की भाषा है। युवा पीढ़ी यदि अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझते हुए आधुनिक रचनात्मकता के साथ आगे बढ़ेगी, तो भारतीय कला परंपराओं को एक नई ऊर्जा मिल सकती है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. डॉ. सुशील उपाध्याय ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का कला को देखने और समझने का अपना अलग दृष्टिकोण होता है। यही विविध दृष्टिकोण कला को और अधिक व्यापक और समृद्ध बनाता है। उन्होंने कहा कि कला और संस्कृति किसी भी देश की अमूल्य धरोहर होती हैं और इन्हें सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता और तकनीक के दौर में पारंपरिक कलाओं को संरक्षित करने की चुनौती जरूर बढ़ी है, लेकिन डिजिटल माध्यमों के जरिए इन्हें दुनिया के सामने प्रस्तुत करने के नए अवसर भी पैदा हुए हैं। ऐसे में युवाओं और कलाकारों को पारंपरिक कला की मूल आत्मा को बनाए रखते हुए नए माध्यमों का उपयोग करना चाहिए।
प्रो. (डॉ.) प्रमोद एस. नायर ने अपने संबोधन में कहा कि भारत संस्कृति और कला के क्षेत्र में विविधता में एकता का अनूठा उदाहरण है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों की कला शैलियां भले ही अलग हों, लेकिन सभी भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा को मजबूत करती हैं। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की भी जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों को केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें कला, संस्कृति और समाज से जोड़ने के अवसर भी उपलब्ध कराएं।
कार्यशाला के समन्वयक डॉ. कृष्ण कुमार ने बताया कि यह आयोजन एनसीजेडसीसी, प्रयागराज के निदेशक सुदेश शर्मा के निर्देशन में आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम की केंद्रीय थीम ‘वन्दे मातरम्–150 वर्ष’ रखी गई है। इसी विषय को आधार बनाकर कलाकार भारतीय संस्कृति, परंपराओं, प्रकृति, लोकजीवन और राष्ट्रप्रेम के विभिन्न पहलुओं को अपनी कला के माध्यम से प्रस्तुत करेंगे।
चार दिवसीय कार्यशाला और प्रदर्शनी के माध्यम से विद्यार्थियों और युवा कलाकारों को अनुभवी कलाकारों से सीखने का अवसर मिलेगा। चित्रकला प्रतियोगिता के जरिए युवा प्रतिभाओं को अपनी रचनात्मक क्षमता प्रदर्शित करने का मंच भी प्रदान किया जाएगा।
यह आयोजन इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि यह केवल अतीत की सांस्कृतिक विरासत को याद करने का प्रयास नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को उस विरासत से जोड़ने की एक पहल भी है। लोक और जनजातीय कला में भारत के विभिन्न समुदायों की कहानियां, उनकी जीवनशैली, प्रकृति के साथ उनका संबंध और उनके सामाजिक अनुभव समाहित हैं।
‘वन्दे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक चेतना को कला के माध्यम से व्यक्त करने का एक विशेष मंच बनकर सामने आया है। कलाकार अपनी रचनाओं के जरिए यह संदेश देंगे कि भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति, कला, परंपराओं और विविध समाजों से भी बनती है।
कार्यक्रम में उपस्थित कलाकारों और विद्यार्थियों ने भी इस पहल को भारतीय लोक एवं जनजातीय कलाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। आने वाले दिनों में कार्यशाला, प्रदर्शनी और चित्रकला प्रतियोगिता के माध्यम से विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा।
कुल मिलाकर, देहरादून में आयोजित यह चार दिवसीय कार्यक्रम कला और संस्कृति के माध्यम से भारत की विविधता, परंपराओं और राष्ट्रीय चेतना को एक मंच पर लाने का प्रयास है। पद्मश्री प्रो. डॉ. बी. के. एस. संजय के शब्दों में, लोक एवं जनजातीय कला हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है और इसे सहेजकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।
