
देहरादून: उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मुहिम अब एक नए और जटिल दौर में प्रवेश कर चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस बहुचर्चित हत्याकांड की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की संस्तुति दिए जाने के बावजूद प्रदेश का राजनीतिक पारा चढ़ा हुआ है। 12 जनवरी को उत्तराखंड शासन ने औपचारिक रूप से सीबीआई को जांच के लिए पत्र प्रेषित कर दिया है, लेकिन विपक्ष और सामाजिक संगठनों की नाराजगी कम होती नहीं दिख रही। ‘उत्तराखंड बंद’ के बाद अब यह लड़ाई जांच की ‘पद्धति’ और ‘निगरानी’ पर आकर टिक गई है।
सीबीआई जांच का पत्र: क्या है शासन की मंशा?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनता और अंकिता के परिजनों की भावनाओं का सम्मान करते हुए 9 जनवरी को सीबीआई जांच की मंजूरी दी थी। शासन द्वारा सीबीआई को भेजे गए पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि अंकिता के माता-पिता की मांग के अनुरूप इस मामले में ‘कथित वीआईपी’ (VIP) की भूमिका की गहनता से जांच की जाए।
सरकार का तर्क है कि वह इस मामले में किसी भी अपराधी को बचाने के पक्ष में नहीं है और पारदर्शी जांच के लिए देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को मामला सौंप दिया गया है। भाजपा इस कदम को अपनी संवेदनशीलता और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में प्रचारित कर रही है।
बेटी अंकिता भंडारी को न्याय दिलाना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। अंकिता के माता-पिता ने भेंट के दौरान CBI जांच की मांग रखी थी जिसका सम्मान करते हुए हमारी सरकार ने इस मामले की जांच CBI से कराने का निर्णय लिया है।
मातृशक्ति की सुरक्षा एवं उनके सम्मान के लिए हमारी सरकार सदैव… pic.twitter.com/bl2KkYJPHu
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) January 9, 2026
विपक्ष की घेराबंदी: “देर आए पर दुरुस्त नहीं”
भले ही सरकार ने सीबीआई जांच का कार्ड खेला हो, लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इसे सरकार की मजबूरी और ‘पुरानी गलतियों का स्वीकारोक्ति’ करार दे रही है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने शुरुआती दौर में साक्ष्यों को नष्ट होने दिया और अब दबाव में आकर यह निर्णय लिया है।
'अंकिता भंडारी मर्डर' केस में CBI जांच की मांग को मानकर उत्तराखंड की BJP सरकार ने ये साबित किया है कि इस केस की जांच में गलतियां हुई हैं।
ये अंकिता भंडारी के माता-पिता के संघर्ष का परिणाम है, जनता के संघर्ष का परिणाम और कांग्रेस के संघर्ष का परिणाम है।
कांग्रेस की मांग है कि… pic.twitter.com/flR8XUpPgc
— Congress (@INCIndia) January 9, 2026
कांग्रेस की मुख्य आपत्तियां:
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निगरानी का अभाव: अंकिता के माता-पिता और कांग्रेस की मांग है कि सीबीआई जांच सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश की निगरानी में हो। उनका तर्क है कि बिना न्यायिक निगरानी के सीबीआई जांच भी प्रभावित हो सकती है।
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मसाल जुलूस और उत्तराखंड बंद: अपनी मांगों को धार देने के लिए कांग्रेस ने 10 जनवरी को प्रदेशभर में मसाल जुलूस निकाला और 11 जनवरी को ‘उत्तराखंड बंद’ का आह्वान किया। हालांकि बंद का असर मिला-जुला रहा, लेकिन इसने आंदोलन की आंच को कम नहीं होने दिया।
क्या है ‘वीआईपी’ और ‘ऑडियो’ का रहस्य?
इस पूरे मामले में राजनीतिक घमासान तब और तेज हो गया जब अभिनेत्री उर्मिला सनावर की ओर से सोशल मीडिया पर कुछ कथित ऑडियो क्लिप वायरल किए गए। इन ऑडियो क्लिपिंग्स ने ‘बाहरी शक्तियों’ और सरकार के भीतर मौजूद कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिए।
आंदोलनकारी संगठनों का दावा है कि जब तक उस ‘वीआईपी’ का नाम सार्वजनिक नहीं होता, जिसके लिए अंकिता पर अनैतिक दबाव बनाया गया था, तब तक न्याय अधूरा है। शासन ने सीबीआई को भेजे पत्र में इस बिंदु को शामिल तो किया है, लेकिन न्यायिक निगरानी की शर्त को फिलहाल स्वीकार नहीं किया है।
सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष: दावों की जंग
सत्ताधारी दल भाजपा का कहना है कि विपक्ष केवल लाशों पर राजनीति कर रहा है। भाजपा प्रवक्ताओं के अनुसार, जब सरकार ने सीबीआई जांच की मांग मान ली है, तो विरोध प्रदर्शनों का कोई तार्किक आधार नहीं रह जाता। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि राज्य पुलिस (SIT) की जांच में कई झोल थे, और सीबीआई को केस ट्रांसफर करने में हुई देरी ने अपराधियों को लाभ पहुँचाने का काम किया है।
जनता के बीच ‘मिश्रित’ प्रतिक्रिया
11 जनवरी के ‘उत्तराखंड बंद’ के दौरान देहरादून, ऋषिकेश और श्रीनगर (गढ़वाल) जैसे इलाकों में बाजार आंशिक रूप से खुले रहे, जबकि कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों और व्यापारियों के बीच नोकझोंक भी देखी गई। जनता के एक बड़े वर्ग का मानना है कि सीबीआई जांच से दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए, लेकिन बार-बार के आंदोलनों से सामान्य जनजीवन प्रभावित हो रहा है।
अंकिता के परिजनों की स्थिति: अंकिता के माता-पिता ने मुख्यमंत्री को सौंपे पत्र में स्पष्ट लिखा था कि उन्हें अब राज्य की जांच एजेंसियों पर भरोसा नहीं है। हालांकि वे सीबीआई जांच की शुरुआत से संतुष्ट दिख सकते हैं, लेकिन न्यायिक निगरानी की उनकी मांग पर अभी भी संशय बना हुआ है।
न्याय की लंबी राह
अंकिता भंडारी हत्याकांड उत्तराखंड के इतिहास में एक ऐसा घाव बन गया है जो समय के साथ और गहराता जा रहा है। सीबीआई के पास अब यह जिम्मेदारी होगी कि वह न केवल हत्या के भौतिक साक्ष्यों को जोड़े, बल्कि उस ‘पर्दे के पीछे के खिलाड़ी’ को भी बेनकाब करे जिसकी वजह से यह मामला इतना राजनीतिक रंग ले चुका है।
सीबीआई को शासन का पत्र मिलना केवल शुरुआत है। असली चुनौती यह होगी कि क्या यह जांच उन तमाम आशंकाओं को दूर कर पाएगी जो विपक्ष और जनता के मन में घर कर गई हैं? आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या केंद्र सरकार इस अनुरोध को स्वीकार कर तत्काल जांच शुरू करती है या राजनीतिक रस्साकशी का यह दौर अभी और चलेगा।



