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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > अंकिता भंडारी हत्याकांड: CBI जांच की संस्तुति के बाद भी सुलग रहा ‘न्याय’ का मुद्दा; विपक्ष ने उत्तराखंड बंद कर दागे तीखे सवाल
उत्तराखंडफीचर्ड

अंकिता भंडारी हत्याकांड: CBI जांच की संस्तुति के बाद भी सुलग रहा ‘न्याय’ का मुद्दा; विपक्ष ने उत्तराखंड बंद कर दागे तीखे सवाल

The Hill India News
Last updated: January 11, 2026 1:10 pm
The Hill India News
Published: January 11, 2026
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देहरादून। उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की गूंज एक बार फिर देवभूमि की सड़कों पर सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड की सीबीआई (CBI) जांच की संस्तुति किए जाने के बावजूद, प्रदेश में आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है। रविवार को विपक्षी दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों के आह्वान पर ‘उत्तराखंड बंद’ का आयोजन किया गया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि केवल सीबीआई जांच पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह जांच सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज की निगरानी में होनी चाहिए ताकि उस ‘कथित वीआईपी’ (VIP) का चेहरा बेनकाब हो सके।

Contents
राजधानी देहरादून में मिला-जुला असर, पहाड़ों में व्यापक आक्रोश“बिना निगरानी की CBI जांच मंजूर नहीं”: विपक्ष का कड़ा रुखसंघर्ष मंच की चेतावनी: “मांगें नहीं मानी तो होगा चक्का जाम”क्या है पूरा मामला? (Background)सरकार बनाम विपक्ष: राजनीतिक गर्माहटजनभावना और न्याय की उम्मीद

राजधानी देहरादून में मिला-जुला असर, पहाड़ों में व्यापक आक्रोश

रविवार सुबह से ही ‘अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच’ के बैनर तले राजधानी देहरादून के घंटाघर इलाके में भारी भीड़ जुटना शुरू हो गई। उत्तराखंड क्रांति दल (UKD), कांग्रेस, राज्य आंदोलनकारी कमला पंत और सामाजिक कार्यकर्ता मोहित डिमरी के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने घंटाघर से पलटन बाजार तक पैदल मार्च निकाला और व्यापारियों से हाथ जोड़कर दुकानें बंद करने की अपील की। हालांकि, देहरादून में बंद का असर मिला-जुला रहा। जैसे ही जुलूस कोतवाली की ओर बढ़ा, कई व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान पुनः खोल लिए। वहीं दूसरी ओर, उत्तरकाशी, श्रीनगर और चमोली जैसे पहाड़ी जिलों में बंद का व्यापक असर देखने को मिला, जहाँ जनभावनाएं इस मुद्दे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।

“बिना निगरानी की CBI जांच मंजूर नहीं”: विपक्ष का कड़ा रुख

प्रदर्शन के दौरान अंकिता भंडारी हत्याकांड सीबीआई जांच की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए। सीपीआई नेता समर भंडारी ने गांधी पार्क में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, “सरकार ने जनता के दबाव में सीबीआई जांच की सिफारिश तो कर दी है, लेकिन हमें इस पर तब तक भरोसा नहीं होगा जब तक इसकी निगरानी सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज न करें। हमें डर है कि राज्य सरकार के प्रभाव में सीबीआई जांच की दिशा मोड़ी जा सकती है और असली दोषियों को बचाया जा सकता है।”

वाम मोर्चे और अन्य जन संगठनों ने भी अलग से मार्च निकालकर ‘वीआईपी’ को जेल भेजने की मांग उठाई। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि घटना के दिन से ही प्रशासन और सरकार किसी प्रभावशाली व्यक्ति (VIP) को बचाने का प्रयास कर रहे हैं, जिसका नाम अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।


संघर्ष मंच की चेतावनी: “मांगें नहीं मानी तो होगा चक्का जाम”

अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच के सदस्य मोहित डिमरी ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा कि आज का बंद एक चेतावनी है। उन्होंने कहा कि:

  • सीबीआई जांच का स्वरूप: जांच केवल कागजों तक सीमित न रहे, इसे न्यायिक देखरेख में लाया जाए।

  • वीआईपी की गिरफ्तारी: उस विशिष्ट अतिथि का नाम उजागर कर उसे जांच के दायरे में लाया जाए, जिसके लिए अंकिता पर अनैतिक दबाव बनाया गया था।

  • आगामी रणनीति: यदि सरकार ने मांगों को अनसुना किया, तो आने वाले दिनों में सरकारी कामकाज बाधित किया जाएगा और पूरे प्रदेश में चक्का जाम की स्थिति पैदा की जाएगी।


क्या है पूरा मामला? (Background)

अंकिता भंडारी, जो ऋषिकेश के एक निजी रिसॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट थी, की संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रिसॉर्ट मालिक और उसके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगे। पूरे प्रदेश में हुए भारी विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया था। हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जनता की भावनाओं और मामले की गंभीरता को देखते हुए धामी सरकार सीबीआई संस्तुति का निर्णय लिया, ताकि जांच में कोई भी कसर बाकी न रहे।

सरकार बनाम विपक्ष: राजनीतिक गर्माहट

जहाँ भाजपा सरकार इसे पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे ‘देर से लिया गया अधूरा फैसला’ करार दे रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि एसआईटी (SIT) की जांच में पहले ही कई अहम साक्ष्य नष्ट होने की आशंका है, ऐसे में अब सीबीआई जांच तभी प्रभावी होगी जब उस पर कोर्ट की निगरानी हो।


जनभावना और न्याय की उम्मीद

अंकिता भंडारी का मुद्दा अब केवल एक कानूनी मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की अस्मिता और ‘बेटी सुरक्षा’ का प्रतीक बन चुका है। अंकिता न्याय यात्रा के माध्यम से सामाजिक संगठनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक केस के हर पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं होती और पर्दे के पीछे छिपे चेहरों का खुलासा नहीं होता, तब तक यह आंदोलन शांत नहीं होगा।

दोपहर डेढ़ बजे गांधी पार्क में एकत्रित होकर सभी संगठनों ने शपथ ली कि वे अंकिता को न्याय दिलाने के लिए गांव-गांव तक इस मशाल को लेकर जाएंगे। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार सीबीआई जांच को लेकर कब औपचारिक नोटिफिकेशन जारी करती है और क्या कोर्ट की निगरानी की मांग पर कोई संज्ञान लिया जाता है।


अंकिता भंडारी मामले में न्याय की मांग देवभूमि के हर घर की आवाज बन चुकी है। सीबीआई जांच की घोषणा के बाद भी उपजा अविश्वास शासन-प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है।

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