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इलाहाबाद हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: ‘पत्नी की योग्यता भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं’, पति को निभानी होगी जिम्मेदारी

प्रयागराज (इलाहाबाद)। वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पत्नी का अधिक शिक्षित होना या उसके पास किसी व्यावसायिक कौशल (Professional Skill) का होना, उसे अपने पति से भरण-पोषण पाने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।

जस्टिस गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि एक सक्षम पति अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से केवल इसलिए नहीं बच सकता कि उसकी पत्नी के पास डिग्री है या वह कार्य करने की क्षमता रखती है।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला बुलंदशहर के एक परिवार न्यायालय (Family Court) के आदेश से जुड़ा है। निचली अदालत ने एक महिला की सीआरपीसी की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत प्रासंगिक) के तहत दायर भरण-पोषण की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि महिला अत्यधिक शिक्षित है और उसने अपनी पेशेवर योग्यता छिपाई है। परिवार अदालत का मानना था कि ऐसी महिला स्वयं का भरण-पोषण करने में सक्षम है।

निचली अदालत ने महिला की अर्जी तो खारिज कर दी थी, लेकिन उसके बेटे के लिए ₹3,000 प्रति माह का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘क्षमता’ और ‘रोजगार’ में अंतर

हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के तर्क को पलटते हुए कहा कि “कमाने की संभावना” (Potential to earn) और “वास्तविक रोजगार” (Actual Employment) के बीच एक बड़ा अंतर होता है। अदालत ने अपने फैसले में उल्लेख किया कि भारतीय सामाजिक परिवेश में कई उच्च शिक्षित महिलाएं शादी के बाद घरेलू जिम्मेदारियों, बच्चों की परवरिश और ससुराल के माहौल के कारण कार्यबल (Workforce) में शामिल नहीं हो पाती हैं। केवल इसलिए कि किसी महिला के पास आईटीआई डिप्लोमा है या वह बीएड/एमएड है, यह मान लेना गलत है कि वह वास्तव में कमा रही है।

“पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पत्नी की शैक्षणिक योग्यता को ढाल नहीं बना सकता। जब तक यह साबित न हो जाए कि पत्नी वास्तव में किसी लाभकारी रोजगार में है और उसकी आय पर्याप्त है, तब तक पति भरण-पोषण देने के लिए बाध्य है।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट

ससुराल में दुर्व्यवहार और अलग रहने का कारण

पति ने अदालत में दलील दी थी कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस कारण के अलग रह रही है और वह एक निजी शिक्षिका के रूप में कार्यरत है। साथ ही, उसके पास सिलाई-कढ़ाई में आईटीआई डिप्लोमा भी है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने ससुराल में निरंतर दुर्व्यवहार और प्रताड़ना के कारण घर छोड़ा था, जिसे कानून की नजर में ‘पर्याप्त कारण’ माना गया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति यह साबित करने के लिए कोई भी ठोस दस्तावेज या सबूत पेश करने में विफल रहा कि पत्नी वर्तमान में किसी संस्थान में कार्यरत है या उसकी नियमित आय है।

बच्चे के भरण-पोषण पर भी सख्त रुख

हाईकोर्ट ने बच्चे के लिए तय किए गए ₹3,000 के मासिक भत्ते को भी ‘हास्यास्पद’ और ‘अपर्याप्त’ करार दिया। अदालत ने कहा कि आज की महंगाई के दौर में एक बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य और एक स्वस्थ वातावरण में परवरिश के लिए यह राशि अत्यंत कम है। बच्चे को अपने पिता के सामाजिक और आर्थिक स्तर के अनुरूप जीवन जीने का पूरा अधिकार है।

निर्णय का कानूनी महत्व

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों लंबित मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा जहाँ पति अक्सर यह दलील देकर गुजारा भत्ता देने से बचते हैं कि उनकी पत्नी शिक्षित है और खुद कमा सकती है।

अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु:

  1. योग्यता बनाम आय: केवल डिग्री होना आय का प्रमाण नहीं है।

  2. सबूत का भार: पति को यह साबित करना होगा कि पत्नी वास्तव में कहीं नौकरी कर रही है।

  3. ससुराल में प्रताड़ना: यदि पत्नी दुर्व्यवहार के कारण अलग रह रही है, तो वह भरण-पोषण की हकदार है।

  4. बच्चे का भविष्य: बच्चे का गुजारा भत्ता केवल जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि उसकी गरिमापूर्ण परवरिश के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

अदालत ने बुलंदशहर परिवार न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया है और मामले को पुनर्विचार के लिए भेजा है, ताकि महिला और बच्चे के लिए सम्मानजनक भरण-पोषण राशि तय की जा सके। जस्टिस गरिमा प्रसाद के इस फैसले ने महिला अधिकारों और वैवाहिक कानूनों के मानवीय पक्ष को और मजबूती प्रदान की है।

यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि शिक्षा सशक्तिकरण के लिए है, न कि उसे किसी महिला के कानूनी अधिकारों को छीनने का हथियार बनाया जाना चाहिए।

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