
नई दिल्ली/मुंबई, 28 नवंबर 2025: देश इन दिनों विषैली हवा की चपेट में है। राजधानी दिल्ली से लेकर मुंबई, लखनऊ, पटना, भोपाल और कोलकाता तक हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है। स्थिति इतनी चिंताजनक है कि अब मुद्दा सीधे अदालतों के दरवाज़े तक पहुँच गया है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट तक, देश की शीर्ष अदालतें वायु प्रदूषण पर सरकार और प्रशासन से सख्त सवाल पूछ रही हैं।
27 नवंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रदूषण बढ़ाने के लिए इथोपिया में ज्वालामुखी फटने की दलील को “तर्कहीन बहाना” बताते हुए खारिज कर दिया। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि उनके पास कोई “जादू की छड़ी” नहीं है, और यदि दिल्ली-एनसीआर को बचाना है तो सरकार को तात्कालिक और ठोस कदम उठाने होंगे।
बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी—“इथोपिया का ज्वालामुखी बहाना नहीं बन सकता”
मुंबई की हवा इस महीने लगातार ‘बहुत खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई है। कई इलाकों में AQI 300 से ऊपर रहा, जो स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार ‘गंभीर खतरा’ है।
इसी संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की पीठ के समक्ष वर्ष 2023 से लंबित याचिकाओं पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाटा और जनक द्वारकादास ने दलील दी कि—
“मुंबई में वायु गुणवत्ता लगातार खराब है, हाल के दिनों में AQI 300 से भी ऊपर रहा है।”
सरकार की ओर से अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने तर्क दिया कि इथोपिया में हाल ही में ज्वालामुखी फटने के कारण हवा में राख फैल गई है, जिससे प्रदूषण बढ़ा है।
लेकिन अदालत ने इस दलील को तुरंत खारिज कर दिया। न्यायालय ने साफ कहा—
“ज्वालामुखी तो दो दिन पहले फटा है, लेकिन प्रदूषण उससे बहुत पहले ही गंभीर स्तर पर था।”
पीठ ने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति कुछ दिनों पहले भी बाहर निकलता था तो 500 मीटर से आगे दृश्यता कम हो जाती थी। यानी शहर की हवा पहले से ही जहरीली थी।
“दिल्ली को देखकर सीखिए”—हाईकोर्ट ने पूछा, प्रभावी उपाय क्या?
अदालत ने दिल्ली की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि बड़े शहरों में वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए क्या प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं, इसे गंभीरता से समझना होगा।
जस्टिस चंद्रशेखर ने कहा—
“हम देख रहे हैं कि दिल्ली में क्या हो रहा है। यदि अभी उपाय नहीं किए तो इसका असर बेहद गंभीर होगा।”
पीठ ने मामले की सुनवाई को शुक्रवार तक स्थगित कर दिया और प्रशासन को तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
बीएमसी एक्शन में—53 निर्माण स्थलों पर काम बंद
बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने गुरुवार को 53 निर्माण स्थलों पर काम रोकने के आदेश जारी किए हैं।
बीएमसी ने कहा—
- सभी निर्माण स्थलों पर AQI मॉनिटरिंग सेंसर अनिवार्य
- धूल नियंत्रण हेतु ग्रीन नेट, एंटी-स्मॉग गन, वॉटर स्प्रिंकलर
- नियमों का पालन न करने पर भारी जुर्माना और साइट सीलिंग का निर्देश
बीएमसी ने स्पष्ट किया कि सर्दियों के मौसम में प्रदूषण तेजी से बढ़ता है और निर्माण गतिविधियाँ इसके बड़े कारणों में से एक हैं।
सुप्रीम कोर्ट भी सख्त—“जादू की छड़ी नहीं है, लेकिन कार्रवाई जरूरी”
दिल्ली-एनसीआर में हवा की स्थिति लगातार बेहद खराब बनी हुई है। कई इलाकों में AQI 450 से ऊपर दर्ज हुआ। इस पर 27 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा—
“हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं कि इसे घुमाकर प्रदूषण खत्म कर दें। यह दिल्ली-एनसीआर के लिए बेहद खतरनाक समय है।”
सीजेआई ने यह भी कहा कि प्रदूषण पर सुनवाई केवल दीपावली के दौरान नहीं, बल्कि पूरे साल होनी चाहिए।
उन्होंने टिप्पणी की—
“हम देखते हैं कि दीपावली के समय प्रदूषण पर सुनवाई होती है, लेकिन बाद में यह मुद्दा सूची से गायब हो जाता है। जबकि यह समस्या सालभर रहती है।”
पीठ ने प्रदूषण से जुड़े मामले पर नियमित निगरानी और सतत सुनवाई का निर्देश दिया।
अब 1 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट मामले की अगली सुनवाई करेगा, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने कदमों की रिपोर्ट पेश करेंगी।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार—
- हवा में PM 2.5 और PM 10 कणों की मात्रा कई गुना बढ़ चुकी है
- हवा का बहाव धीमा है, जिससे प्रदूषक ऊपर नहीं उठ पा रहे
- वाहनों, निर्माण कार्य, कचरा जलाने और उद्योगों से निकला धुआँ लगातार बढ़ रहा है
- मौसम परिवर्तन भी स्थिति को और खराब कर रहा है
साइंस एंड पॉलिसी इंटरफेस विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को “स्ट्रक्चरल एयर क्वालिटी रिफॉर्म्स” की जरूरत है, केवल अस्थायी बंदिशों से समस्या हल नहीं होगी।
जनता का क्या हाल है?
देशभर के कई शहरों में—
- स्कूलों में आउटडोर खेल बंद
- अस्थमा मरीजों की संख्या बढ़ी
- अस्पतालों में सांस संबंधित मामलों में 25–30% वृद्धि
- बुजुर्ग और बच्चों को घर में रहने की सलाह
हवा की जहरीली परत अब पूरे देश के लिए एक स्थायी चिंता बन चुकी है।
अदालतें सक्रिय, लेकिन ज़रूरत है समन्वित राष्ट्रीय नीति की
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने स्पष्ट किया है कि—
- बहाने नहीं, ठोस समाधान चाहिए
- प्रदूषण “सीज़नल इश्यू” नहीं, बल्कि “सिस्टम फेल्योर” है
- केंद्र, राज्य और स्थानीय निकाय तीनों को साथ बैठना होगा
- दीर्घकालिक नीति के बिना हवा सुधरना संभव नहीं
अब 1 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट क्या दिशा-निर्देश देता है, और बॉम्बे हाईकोर्ट प्रदूषण नियंत्रण पर क्या कड़े कदम सुझाता है, इस पर पूरे देश की नजर है।



