देहरादून: उत्तराखंड में MBBS दाखिलों के दौरान सामने आए फर्जी दस्तावेजों के मामलों के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मेडिकल काउंसलिंग प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी एवं सख्त बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। अब आगामी MBBS काउंसलिंग में केवल मेडिकल कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर के अधिकारी ही दस्तावेजों की जांच नहीं करेंगे, बल्कि प्रशासनिक अधिकारी की मौजूदगी भी सुनिश्चित करने की तैयारी की जा रही है। इसके लिए प्रशासनिक अधिकारी को नोडल अधिकारी के रूप में नामित करने का प्रस्ताव रखा जाएगा, ताकि अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों की जांच पर अतिरिक्त स्तर की निगरानी रखी जा सके।
दरअसल, उत्तराखंड में MBBS की सीटों पर दाखिले के लिए अब तक दो चरणों की काउंसलिंग पूरी हो चुकी है और तीसरे चरण की काउंसलिंग जल्द होने वाली है। इसी बीच कुछ अभ्यर्थियों के दस्तावेजों को लेकर सामने आए विवाद ने पूरी प्रवेश प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेष रूप से आरक्षण या विशेष कोटे के तहत दाखिला लेने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाण-पत्रों की सत्यता को लेकर अब विभाग अधिक सतर्कता बरतना चाहता है।
फर्जी प्रमाण-पत्रों के मामलों के बाद लिया गया फैसला
हाल ही में उत्तराखंड में MBBS दाखिलों से जुड़े कुछ ऐसे मामले सामने आए, जिनमें अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाण-पत्रों की वैधता पर सवाल उठे। देहरादून में स्वतंत्रता सेनानी आश्रित कोटे के तहत MBBS दाखिले के लिए इस्तेमाल किए गए प्रमाण-पत्रों को लेकर जांच शुरू हुई थी। जांच के दौरान तीन प्रमाण-पत्रों को निलंबित किए जाने की कार्रवाई भी सामने आई।
इसके बाद संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर MBBS में दाखिला लेने वाले अभ्यर्थियों को लेकर जांच का दायरा बढ़ाया गया। विभागीय स्तर पर बड़ी संख्या में संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूची सामने आने की जानकारी के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग ने आगामी काउंसलिंग में दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
काउंसलिंग में प्रशासनिक अधिकारी की होगी अहम भूमिका
चिकित्सा शिक्षा विभाग का मानना है कि काउंसलिंग के दौरान प्रशासनिक अधिकारी की मौजूदगी से दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया में एक अतिरिक्त निगरानी व्यवस्था तैयार होगी। यदि किसी अभ्यर्थी द्वारा प्रस्तुत प्रमाण-पत्र की वैधता, श्रेणी या पात्रता को लेकर संदेह उत्पन्न होता है तो संबंधित दस्तावेजों की जांच को अधिक गंभीरता से आगे बढ़ाया जा सकेगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल दस्तावेजों की सामान्य जांच करना नहीं है, बल्कि उन प्रमाण-पत्रों की भी गहन पड़ताल करना है, जिनके आधार पर कोई अभ्यर्थी किसी विशेष कोटे, आरक्षण या श्रेणी का लाभ लेकर मेडिकल सीट हासिल कर रहा है।
यानी आने वाली काउंसलिंग में अभ्यर्थियों के शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों के साथ-साथ जाति, आरक्षण, स्वतंत्रता सेनानी आश्रित या अन्य विशेष श्रेणी से जुड़े दस्तावेजों की वैधता पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।
मेडिकल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के साथ हुई बैठक
इस संबंध में तमाम मेडिकल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के साथ बैठक भी की गई। बैठक में MBBS प्रवेश प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों के सत्यापन को अधिक प्रभावी बनाने को लेकर चर्चा हुई। इसी दौरान प्रशासनिक अधिकारी को भी दस्तावेज सत्यापन के लिए नोडल अधिकारी के रूप में शामिल करने का सुझाव सामने आया।
चिकित्सा शिक्षा विभाग अब इस संबंध में प्रशासन के सामने अपनी मांग रखेगा। विभाग का उद्देश्य है कि आगामी काउंसलिंग प्रक्रिया के दौरान प्रशासन और चिकित्सा शिक्षा विभाग के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो और दस्तावेजों की जांच में किसी भी स्तर पर लापरवाही की संभावना कम की जा सके।
चिकित्सा शिक्षा विभाग के निदेशक डॉ. आशुतोष सयाना के अनुसार, मेडिकल कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में इस विषय पर चर्चा हुई है और दस्तावेज सत्यापन के लिए प्रशासनिक अधिकारी को भी नोडल के तौर पर नामित कराने की मांग प्रशासन के सामने रखी जाएगी।
करीब एक हजार MBBS सीटों पर चल रही प्रवेश प्रक्रिया
उत्तराखंड में इस समय करीब एक हजार MBBS सीटों पर दाखिले की प्रक्रिया चल रही है। दो चरणों की काउंसलिंग पूरी हो चुकी है और अब तीसरे चरण की काउंसलिंग को लेकर विभाग की तैयारियां जारी हैं। ऐसे में तीसरे चरण की काउंसलिंग को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विभाग की कोशिश है कि आगामी चरण में दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो। खासतौर पर ऐसे अभ्यर्थियों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिन्होंने किसी विशेष कोटे या आरक्षित श्रेणी के तहत सीट का दावा किया है।
अधिकारियों की मौजूदगी में दस्तावेजों की जांच होने से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि किसी वास्तविक और पात्र अभ्यर्थी का अधिकार गलत या फर्जी प्रमाण-पत्र के आधार पर किसी दूसरे व्यक्ति को न मिल सके।
दस्तावेजों की जांच में बढ़ेगी पारदर्शिता
MBBS जैसे महत्वपूर्ण और प्रतिस्पर्धी पाठ्यक्रम में एक-एक सीट के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थी प्रतिस्पर्धा करते हैं। ऐसे में प्रवेश प्रक्रिया में दस्तावेजों की सत्यता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। किसी भी प्रमाण-पत्र के गलत पाए जाने की स्थिति में न केवल संबंधित अभ्यर्थी की पात्रता प्रभावित होती है, बल्कि पूरी काउंसलिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा शिक्षा विभाग अब ऐसी व्यवस्था तैयार करना चाहता है, जिसमें दस्तावेज सत्यापन के दौरान मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय और प्रशासन के बीच समन्वय रहे। इससे संदिग्ध प्रमाण-पत्र सामने आने पर उनकी जांच संबंधित स्तर पर कराई जा सकेगी।
तीसरी काउंसलिंग में सख्ती की तैयारी
फर्जी दस्तावेजों से जुड़े मामलों के सामने आने के बाद अब तीसरी काउंसलिंग को लेकर विभाग विशेष सतर्कता बरत रहा है। आने वाले समय में अभ्यर्थियों को अपने सभी मूल दस्तावेज और संबंधित प्रमाण-पत्रों के साथ काउंसलिंग में उपस्थित होना होगा। विभाग का प्रयास रहेगा कि दस्तावेजों की जांच के बाद ही पात्र अभ्यर्थियों को संबंधित सीटों पर दाखिला दिया जाए।
खास बात यह है कि प्रशासनिक अधिकारी की संभावित मौजूदगी से दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया में एक अतिरिक्त जांच स्तर जुड़ सकता है। इससे विशेष श्रेणी या आरक्षण के तहत प्रस्तुत किए जाने वाले प्रमाण-पत्रों की वैधता को लेकर भी अधिक गंभीरता से जांच की जा सकेगी।
फर्जी दस्तावेजों पर शिकंजा कसने की तैयारी
कुल मिलाकर उत्तराखंड में MBBS प्रवेश प्रक्रिया को लेकर चिकित्सा शिक्षा विभाग अब किसी भी तरह की लापरवाही की गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता। फर्जी या संदिग्ध दस्तावेजों के मामलों के बाद विभाग ने यह संकेत दिया है कि आगामी काउंसलिंग में सत्यापन व्यवस्था को पहले से अधिक मजबूत किया जाएगा।
प्रशासनिक अधिकारी को नोडल अधिकारी के रूप में शामिल करने की पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अब देखना होगा कि प्रशासन के साथ समन्वय के बाद इस व्यवस्था को आगामी तीसरी काउंसलिंग में किस तरह लागू किया जाता है। यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो MBBS दाखिलों में दस्तावेजों की जांच के दौरान निगरानी का एक अतिरिक्त स्तर जुड़ जाएगा और विशेष कोटे के नाम पर गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल की संभावनाओं को रोकने की दिशा में विभाग को मदद मिल सकती है।
