नई दिल्ली। दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों महिला सुरक्षा को लेकर छात्राओं और महिलाओं की आवाज सुनाई दे रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जुड़ी छात्राओं सहित अलग-अलग छात्र संगठनों और युवाओं ने हालिया घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन करते हुए सुरक्षा, सम्मान, स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए। प्रदर्शन की सबसे खास बात यह रही कि गंभीर मुद्दों को सामने रखने के लिए इस बार पारंपरिक नारों के साथ-साथ Gen Z की भाषा, तुकबंदी, व्यंग्य और मीम कल्चर का भी इस्तेमाल किया गया।
प्रदर्शन से सामने आया ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’ वाला नारा सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। इसके अलावा ‘नारी अपने आप की’, ‘रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’ और ‘फूल नहीं, चिंगारी है, ये भारत की नारी है’ जैसे संदेशों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। इन नारों को लेकर सोशल मीडिया पर समर्थन, आलोचना और बहस—तीनों तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
हालांकि, नारों की चर्चा के बीच प्रदर्शनकारियों द्वारा उठाया गया मूल मुद्दा महिला सुरक्षा ही है। छात्राओं का कहना है कि महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, पर्याप्त रोशनी, सुरक्षित आवास और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी और स्वतंत्रता से जुड़े बुनियादी सवाल हैं।
नारे बदले, लेकिन मुद्दा वही—सुरक्षा और सम्मान
महिला आंदोलनों में लंबे समय से ‘आजादी’, ‘इंकलाब’ और समानता जैसे पारंपरिक नारे सुनाई देते रहे हैं। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में विरोध दर्ज कराने का तरीका तेजी से बदल रहा है। दिल्ली के इन प्रदर्शनों में भी यही बदलाव नजर आया।
‘एक कचौड़ी, दो समोसा… इन मर्दों का क्या भरोसा’, ‘मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है’, ‘ओ पुरुष, कल आना’, ‘नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की’ और ‘शर्म नहीं है मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में’ जैसे नारों के जरिए छात्राओं ने अपने गुस्से और असुरक्षा की भावना को तुकबंदी के जरिए व्यक्त किया।
कुछ नारों में व्यंग्य है, कुछ में आक्रोश और कुछ में महिलाओं की स्वतंत्रता का स्पष्ट संदेश। यही वजह है कि प्रदर्शन स्थल से निकलकर ये नारे सोशल मीडिया तक पहुंच गए और वहां अलग बहस शुरू हो गई।
दिलचस्प बात यह भी है कि ‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ वाला नारा इंटरनेट पर वायरल होने के बाद कुछ लोगों ने इसका संबंध लोकप्रिय टीवी शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ के एक पुराने संवाद से भी जोड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, शो के एक पुराने एपिसोड में इससे मिलता-जुलता संवाद इस्तेमाल हुआ था, जिसे प्रदर्शन के दौरान नए संदर्भ में बदलकर इस्तेमाल किया गया।
DU की छात्राओं ने कैंपस से लेकर सड़कों तक उठाई आवाज
दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने प्रदर्शन के दौरान कैंपस और उसके आसपास की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दे उठाए। छात्राओं की शिकायतों में पर्याप्त स्ट्रीट लाइट की कमी, सुरक्षित हॉस्टल की सीमित उपलब्धता और रात के समय आने-जाने को लेकर असुरक्षा जैसे सवाल शामिल रहे।
प्रदर्शन का एक बड़ा संदेश यह था कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के नाम पर उनकी आवाजाही या स्वतंत्रता सीमित करने के बजाय सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाया जाना चाहिए।
यही वजह है कि छात्राओं ने केवल अपराध की घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उस पूरे माहौल पर सवाल उठाया, जिसमें महिलाओं को घर से बाहर निकलते समय लगातार अपनी सुरक्षा के बारे में सोचना पड़ता है।
DU में हुए प्रदर्शन से जुड़े वीडियो और नारों ने सोशल मीडिया पर भी तेजी से ध्यान खींचा। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन में छात्राओं ने कैंपस और आसपास के क्षेत्रों में बेहतर सुरक्षा इंतजामों की मांग की।
JNU और जामिया की छात्राओं ने भी उठाए सवाल
प्रदर्शन का दायरा केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहा। JNU और जामिया से जुड़ी छात्राओं ने भी महिला सुरक्षा, समानता और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित वातावरण की जरूरत को लेकर अपनी आवाज उठाई।
प्रदर्शनकारियों का तर्क रहा कि महिला सुरक्षा को केवल महिलाओं का मुद्दा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरे समाज से जुड़ा सवाल है। किसी महिला को कॉलेज, नौकरी, बाजार, पार्क या सार्वजनिक परिवहन में जाने के लिए अपने समय, कपड़े, रास्ते या साथ चलने वाले व्यक्ति को लेकर लगातार डरना न पड़े—इसके लिए व्यापक सामाजिक और संस्थागत बदलाव की जरूरत है।
जामिया की छात्राओं ने भी सार्वजनिक स्थानों पर रोशनी और सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं का मुद्दा उठाया। रात में सड़क या सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के लिए पर्याप्त रोशनी और भरोसेमंद सुरक्षा व्यवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है।
‘रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं’—सुरक्षा की बहस का दूसरा पहलू
प्रदर्शन में सुनाई देने वाला एक और संदेश था—‘रेपिस्ट को अंदर करो, लड़कियों को नहीं।’
यह नारा महिला सुरक्षा को लेकर लंबे समय से चली आ रही उस बहस की ओर इशारा करता है जिसमें अपराध के बाद महिलाओं की आवाजाही, पहनावे या समय को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। प्रदर्शनकारी इस सोच पर सवाल उठाते हुए कहती नजर आईं कि सुरक्षा का समाधान महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित करना नहीं होना चाहिए।
इसी तरह ‘हमारी आजादी से जिसको दर्द है…’ और ‘तोड़ के रख दो वो समाज, नारी जिसमें बंधी है आज’ जैसे संदेश महिलाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक बराबरी के सवाल को सामने रखते हैं।
पोस्टरों में भी दिखी Gen Z की क्रिएटिविटी
नारे ही नहीं, प्रदर्शन में इस्तेमाल किए गए पोस्टरों ने भी लोगों का ध्यान खींचा। कुछ पोस्टरों पर अंग्रेजी और हिंदी को मिलाकर संदेश दिए गए। इनमें ‘She is Somebody, not Some-Body’ जैसे संदेश शामिल रहे, जिनके जरिए महिलाओं को केवल शरीर या वस्तु के रूप में देखने वाली सोच पर सवाल उठाया गया।
एक अन्य पोस्टर में व्यंग्यात्मक भाषा का इस्तेमाल किया गया। सोशल मीडिया पर वायरल हुए पोस्टरों और वीडियो ने प्रदर्शन को कैंपस की सीमाओं से बाहर निकालकर डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंचा दिया।
यह Gen Z के विरोध प्रदर्शन के बदलते तरीके का उदाहरण भी माना जा रहा है। आज की युवा पीढ़ी किसी मुद्दे को उठाने के लिए केवल लंबे भाषणों या पारंपरिक राजनीतिक नारों पर निर्भर नहीं है। मीम, रील, छोटे वीडियो, पोस्टर, पॉप-कल्चर और तुकबंदी भी विरोध की भाषा का हिस्सा बन चुके हैं।
सोशल मीडिया पर शुरू हुई ‘स्लोगन बैटल’
जैसे ही प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए, नारों को लेकर ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया। कई लोगों ने प्रदर्शनकारी छात्राओं के समर्थन में नए नारे लिखे, जबकि कुछ यूजर्स ने ‘हर मर्द एक जैसा नहीं होता’ जैसी प्रतिक्रिया भी दी।
कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने ‘एक इडली, दो डोसा… हर मर्द नहीं एक जैसा’ जैसे जवाबी स्लोगन भी लिखे। इस तरह प्रदर्शन का मुद्दा ऑनलाइन एक तरह की ‘स्लोगन बैटल’ में बदलता दिखाई दिया।
हालांकि इस बहस के बीच एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सोशल मीडिया पर नारे कितने मजेदार या वायरल होते हैं, इससे अलग प्रदर्शन के मूल मुद्दे—महिला सुरक्षा और सम्मान—अपनी जगह गंभीर बने रहते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि सवाल सिर्फ सोशल मीडिया का नहीं
महिला सुरक्षा को लेकर उठ रही आवाजों को देश में दर्ज अपराधों के आंकड़ों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। NCRB की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिलाओं के खिलाफ 4,41,534 मामले दर्ज हुए। 2023 में यह संख्या 4,48,211 और 2022 में 4,44,256 थी। यानी 2024 में दर्ज मामलों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 1.5 प्रतिशत कम रही, लेकिन कुल संख्या अब भी चार लाख से अधिक है।
2024 में देश में 29,536 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता सबसे बड़ी श्रेणी रही, जिसमें 1,20,227 मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा बताता है कि महिला सुरक्षा का सवाल केवल सड़क, पार्क या सार्वजनिक परिवहन तक सीमित नहीं है; घर और पारिवारिक वातावरण भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दिल्ली में 2024 के दौरान महिलाओं के खिलाफ 13,396 मामले दर्ज हुए, जो किसी केंद्रशासित प्रदेश में सबसे अधिक संख्या थी।
इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि NCRB के आंकड़े पुलिस में दर्ज मामलों पर आधारित होते हैं। इसलिए ये देश में महिलाओं द्वारा अनुभव की गई हर घटना का पूर्ण माप नहीं माने जा सकते। शिकायत दर्ज होने, FIR लिखे जाने और अपराध की कानूनी श्रेणी तय होने की प्रक्रिया भी आंकड़ों को प्रभावित करती है।
महिला सुरक्षा सिर्फ ‘सड़क’ का मुद्दा नहीं
दिल्ली के प्रदर्शनों ने एक महत्वपूर्ण सवाल को फिर सामने ला दिया है—महिला सुरक्षा को आखिर किस नजरिए से देखा जाए?
अगर किसी इलाके में स्ट्रीट लाइट नहीं है, तो वहां रोशनी बढ़ाना जरूरी है। अगर छात्राओं के लिए पर्याप्त सुरक्षित हॉस्टल नहीं हैं, तो आवास की व्यवस्था बेहतर करनी होगी। अगर सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा को लेकर चिंता है, तो निगरानी और शिकायत व्यवस्था को मजबूत करना होगा।
लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि अपराध होने के बाद शिकायत दर्ज करने, जांच करने और न्याय दिलाने की प्रक्रिया प्रभावी और भरोसेमंद हो।
महिला सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, शैक्षणिक संस्थान, परिवहन व्यवस्था, स्थानीय प्रशासन और समाज—सभी की भूमिका इसमें जुड़ती है।
क्या Gen Z की भाषा आंदोलन को नया रूप दे रही है?
दिल्ली के इन प्रदर्शनों का एक पहलू विशेष रूप से चर्चा में है—विरोध की भाषा।
Gen Z ने गंभीर मुद्दों को सोशल मीडिया के दौर की भाषा में रखने की कोशिश की है। छोटी, तुकबंदी वाली और आसानी से याद रह जाने वाली लाइनें तेजी से वीडियो और रील का हिस्सा बन जाती हैं। यही कारण है कि ‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ जैसे नारे प्रदर्शन स्थल से निकलकर लाखों सोशल मीडिया यूजर्स तक पहुंच जाते हैं।
इसका एक फायदा यह है कि जिस मुद्दे पर शायद हर व्यक्ति विस्तार से चर्चा न करे, वह एक छोटे और वायरल संदेश के जरिए बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ, किसी गंभीर मुद्दे के नारे के वायरल होने से यह खतरा भी रहता है कि चर्चा मूल समस्या से हटकर केवल नारे की भाषा या उसके हास्य पक्ष पर केंद्रित हो जाए।
यही वजह है कि सोशल मीडिया की बहस से आगे जाकर महिला सुरक्षा के वास्तविक सवालों पर ध्यान देना जरूरी है।
सवाल यह नहीं कि नारे कितने नए हैं, सवाल यह है कि बदलाव कितना आया
दिल्ली की सड़कों पर छात्राओं की आवाज में नाराजगी भी है, व्यंग्य भी और बदलाव की मांग भी। ‘एक कचौड़ी, दो समोसा…’ जैसे नारे भले ही सुनने में हल्के या मजाकिया लगें, लेकिन जिस संदर्भ में उन्हें लगाया गया, वह महिला सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता से जुड़ा है।
महिलाएं चाहती हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें सुरक्षित महसूस हो, कॉलेज जाने या रात में घर लौटने के लिए उन्हें डर के साथ योजना न बनानी पड़े और किसी अपराध के बाद सवाल पीड़िता से नहीं बल्कि अपराधी और व्यवस्था से पूछे जाएं।
आंकड़े बताते हैं कि महिला सुरक्षा का मुद्दा अभी भी व्यापक है। 2024 में 4.41 लाख से अधिक मामले दर्ज होना इस बात की याद दिलाता है कि समस्या को केवल वायरल वीडियो या कुछ दिनों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं किया जा सकता।
दिल्ली की सड़कों पर गूंज रहे Gen Z के नारे इसलिए चर्चा में हैं क्योंकि उनकी भाषा नई है, लेकिन उनके पीछे उठाया गया सवाल पुराना और बेहद गंभीर है—क्या महिलाओं को अपनी आजादी और सुरक्षा के लिए हर बार सड़क पर उतरकर आवाज उठानी पड़ेगी, या समाज और व्यवस्था ऐसी स्थिति बनाएगी जहां सुरक्षा उनका अधिकार हो और डर उनकी जिंदगी का हिस्सा न बने?
