देहरादून: उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राजनीतिक माहौल लगातार गरमा रहा है। कांग्रेस की ओर से प्रदेश सरकार के खिलाफ अलग-अलग मुद्दों को उठाकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी विपक्ष के आरोपों पर जवाब देना शुरू कर दिया है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित 1,320 मेगावाट के कोयला आधारित बिजली प्रोजेक्ट और अदाणी पावर से जुड़े समझौते को लेकर कांग्रेस के आरोपों पर मुख्यमंत्री धामी ने शुक्रवार को देहरादून में अपना पक्ष रखा।
17 सितंबर को कांग्रेस ने नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बिजली परियोजना को लेकर राज्य सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। कांग्रेस ने दावा किया था कि परियोजना से संबंधित निविदा प्रक्रिया की 86 में से 84 शर्तों में बदलाव किए गए और इससे अदाणी समूह को फायदा पहुंचाने की स्थिति बनी। पार्टी ने यह भी सवाल उठाया कि पहले सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के माध्यम से परियोजना विकसित करने की योजना थी, तो बाद में व्यवस्था में बदलाव क्यों किया गया।
कांग्रेस के इन आरोपों के बाद शुक्रवार को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मीडिया से बातचीत में सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष के पास ठोस मुद्दों की कमी है और वह जिन मुद्दों को उठा रहा है, उनमें तथ्य नहीं हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि बिजली की जरूरतों को देखते हुए सरकार ने दीर्घकालिक व्यवस्था पर काम किया है और पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत आगे बढ़ाई गई है।
1,320 मेगावाट बिजली परियोजना पर क्या है विवाद?
इस पूरे विवाद के केंद्र में 1,320 मेगावाट की ताप विद्युत परियोजना है। कांग्रेस का कहना है कि वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार की ओर से इस परियोजना को UJVNL और THDC India के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से विकसित करने की दिशा में कदम उठाए गए थे। कांग्रेस के अनुसार, केंद्र से परियोजना के लिए सैद्धांतिक मंजूरी भी मिली थी।
इसके बाद परियोजना की दिशा में बदलाव और बिजली खरीद के नए विकल्प को लेकर कांग्रेस ने सवाल खड़े किए। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने 17 सितंबर को आरोप लगाया कि निविदा की 86 शर्तों में से 84 में बदलाव किया गया और इससे अदाणी समूह की कंपनी को लाभ पहुंचाने की स्थिति बनी। कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित व्यवस्था से राज्य के बिजली उपभोक्ताओं पर लंबे समय में बड़ा आर्थिक बोझ पड़ सकता है। इन आरोपों पर उस समय कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरकार की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया नहीं आई थी।
अब मुख्यमंत्री धामी ने इन आरोपों को लेकर अपना पक्ष सामने रखा है।
‘कांग्रेस के समय के करार का बोझ उत्तराखंड उठा रहा’
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बिजली परियोजना के मुद्दे पर कांग्रेस के कार्यकाल के पुराने बिजली खरीद समझौतों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, वर्ष 2014-15 के दौरान किए गए कुछ ऊर्जा करारों का प्रभाव आज भी राज्य पर पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री का कहना है कि उन पुराने समझौतों के कारण उत्तराखंड को महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ रही है। उन्होंने दावा किया कि कुछ परिस्थितियों में बिजली की लागत 31 से 32 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच जाती है। इसके विपरीत, मौजूदा व्यवस्था को राज्य की दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
धामी ने कहा कि सरकार का उद्देश्य उत्तराखंड को अपेक्षाकृत सस्ती और स्थिर बिजली उपलब्ध कराना है। उन्होंने इस प्रक्रिया को एक निर्धारित प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा बताया और किसी तरह की अनियमितता के आरोप को खारिज किया।
‘पीक टाइम की महंगी बिजली से मिलेगी राहत’
मुख्यमंत्री ने बिजली की मांग के चरम समय यानी पीक आवर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे समय उत्तराखंड को बाजार से बिजली खरीदने के लिए काफी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। उनके मुताबिक, पीक समय में बिजली की लागत करीब 14 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंच सकती है।
सरकार का तर्क है कि दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते से राज्य को भविष्य की बिजली जरूरतों के लिए अधिक निश्चितता मिल सकती है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि यदि किसी अवधि में राज्य के पास बिजली की अतिरिक्त उपलब्धता रहती है, तो उसे आगे बेचने की संभावना भी हो सकती है।
यानी सरकार इस परियोजना को केवल मौजूदा बिजली संकट के समाधान के रूप में नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की ऊर्जा जरूरतों से जोड़कर देख रही है।
UIIDB और 7 हजार बीघा जमीन के आरोप पर भी बोले धामी
अदाणी पावर के मुद्दे के साथ-साथ मुख्यमंत्री धामी ने उत्तराखंड इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड यानी UIIDB को लेकर कांग्रेस के आरोपों पर भी प्रतिक्रिया दी।
कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि सरकार UIIDB के माध्यम से लगभग 7,000 बीघा सरकारी जमीन को निजी निवेशकों के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है और इससे सरकारी संपत्तियों के उपयोग को लेकर सवाल खड़े होते हैं। कांग्रेस ने इस मुद्दे को प्रदेश के हितों से जोड़ते हुए सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था। 12 सितंबर को कांग्रेस नेताओं ने 7,000 बीघा सरकारी जमीन को 90 वर्ष की लीज पर निजी निवेशकों को देने की योजना पर सवाल उठाए थे।
मुख्यमंत्री धामी ने इन आरोपों को भी गलत बताया। उन्होंने कहा कि UIIDB का उद्देश्य प्रदेश में निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ाना, पर्यटन को प्रोत्साहित करना और नई आर्थिक संभावनाओं को विकसित करना है।
सरकार के आधिकारिक UIIDB पोर्टल के अनुसार, यह संस्था Uttarakhand Investment and Infrastructure (Development and Regulation) Act, 2023 के तहत बनाई गई है और इसका उद्देश्य राज्य में बुनियादी ढांचे तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी से जुड़े विकास को बढ़ावा देना है। UIIDB की वेबसाइट पर विभिन्न परियोजनाओं का भी उल्लेख है।
धामी ने कहा कि सरकार ने केंद्र सरकार और नीति आयोग से संबंधित निर्धारित प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए काम किया है। उन्होंने कांग्रेस के 7,000 बीघा वाले दावे पर सवाल उठाते हुए कहा कि UIIDB को अभी तक इतनी जमीन मिली ही नहीं है।
इस मुद्दे पर भाजपा की ओर से भी कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया गया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने पहले कहा था कि UIIDB के नाम पर फिलहाल लगभग 18 हेक्टेयर भूमि होने की बात सामने आई है।
हल्द्वानी विवाद को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना
मुख्यमंत्री धामी ने हल्द्वानी से जुड़े हालिया विवाद को लेकर भी कांग्रेस पर राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने इस मुद्दे को एक विशेष सामाजिक-राजनीतिक नैरेटिव के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन सरकार के अनुसार वह प्रयास प्रभावी नहीं हुआ।
धामी ने कांग्रेस पर वोट की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि विपक्ष को हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय तथ्य और विकास से जुड़े विषयों पर बात करनी चाहिए।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से विभिन्न मुद्दों को उठाए जाने को पार्टी लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका का हिस्सा बताती रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला आने वाले समय में और तेज होने की संभावना है।
अंकिता भंडारी मामले पर भी आया मुख्यमंत्री का बयान
मीडिया बातचीत के दौरान अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर भी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सवाल पूछे गए। यह मुद्दा 18 सितंबर 2022 की घटना के चार साल पूरे होने के कारण एक बार फिर चर्चा में है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि अंकिता के साथ हुई घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण थी और सरकार ने शुरुआत से ही इस मामले में कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि मामले में तीन दोषियों को अदालत से उम्रकैद की सजा हो चुकी है।
वास्तव में मई 2025 में कोटद्वार की अदालत ने पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को हत्या और साक्ष्य मिटाने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अगस्त 2026 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तीनों दोषियों की जमानत याचिकाएं भी खारिज कर दी थीं।
हालांकि, मामले से जुड़े कथित ‘VIP एंगल’ को लेकर सार्वजनिक बहस अभी समाप्त नहीं हुई है। इसी मुद्दे को लेकर सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों की ओर से अलग-अलग समय पर जांच की मांग उठती रही है।
मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा कि मामले में CBI जांच की सिफारिश की गई है और जांच चल रही है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि इस मुद्दे को लेकर लगातार राजनीति की जा रही है।
दूसरी ओर, जनवरी 2026 में उत्तराखंड पुलिस ने कहा था कि उपलब्ध साक्ष्यों और अदालत में पेश किए गए मामले के आधार पर किसी VIP की संलिप्तता सामने नहीं आई है। पुलिस ने वायरल ऑडियो को लेकर भी SIT जांच का उल्लेख किया था।
इसलिए इस पूरे मुद्दे में अदालत से साबित हुए तथ्य और कथित VIP एंगल से जुड़े आरोपों को अलग-अलग समझना जरूरी है। तीन दोषियों की सजा न्यायिक प्रक्रिया का स्थापित तथ्य है, जबकि कथित VIP भूमिका को लेकर अलग-अलग पक्षों की मांग और दावे अभी सार्वजनिक बहस का हिस्सा हैं।
चुनाव से पहले बढ़ती राजनीतिक गर्मी
उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में बिजली, सरकारी जमीन, निवेश, रोजगार, कानून-व्यवस्था और अंकिता भंडारी जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में बने हुए हैं। कांग्रेस लगातार सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा और मुख्यमंत्री धामी इन आरोपों का जवाब देते हुए सरकार के विकास कार्यों और नीतिगत फैसलों को सामने रख रहे हैं।
अदाणी पावर से जुड़ा 1,320 मेगावाट का बिजली समझौता भी अब इसी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। कांग्रेस जहां निविदा प्रक्रिया और शर्तों में बदलाव को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं सरकार का कहना है कि बिजली की दीर्घकालिक जरूरतों को देखते हुए निर्णय लिया गया है।
मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक हमला करते हुए कहा कि उसके पास उत्तराखंड में उठाने के लिए पर्याप्त मुद्दे नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस कभी-कभी अपने प्रदेश से बाहर दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके राज्य सरकार को घेरने की कोशिश करती है।
‘कांग्रेस खत्म हो चुकी है’—धामी का दावा
मीडिया से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि उत्तराखंड में कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है और पार्टी के पास अपने दम पर आगे बढ़ने की क्षमता नहीं बची है। उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस के प्रवक्ताओं के उत्तराखंड दौरे का उल्लेख करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा।
मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के पुराने शासन और नीतियों पर भी सवाल उठाए तथा कहा कि उनकी सरकार पिछली सरकारों के दौरान हुई कथित गड़बड़ियों को सामने लाने का काम करेगी।
हालांकि, ये मुख्यमंत्री के राजनीतिक आरोप और बयान हैं, जिन्हें कांग्रेस स्वीकार नहीं करती। कांग्रेस की ओर से सरकार के खिलाफ उठाए जा रहे मुद्दे पार्टी की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं और उनका अंतिम मूल्यांकन जनता तथा संबंधित संस्थाओं द्वारा उपलब्ध तथ्यों के आधार पर किया जाना है।
अब आगे क्या?
अदाणी पावर से जुड़े 1,320 मेगावाट बिजली समझौते पर कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से निविदा प्रक्रिया, शर्तों में बदलाव और सरकारी परियोजना से निजी कंपनी तक पहुंचे निर्णय पर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत हुई है और इसका उद्देश्य उत्तराखंड को भविष्य के लिए बिजली की बेहतर उपलब्धता और अपेक्षाकृत कम लागत सुनिश्चित करना है।
इसी तरह UIIDB और सरकारी जमीन के मुद्दे पर भी सरकार और विपक्ष के दावे अलग-अलग हैं। UIIDB का आधिकारिक उद्देश्य निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास को बढ़ावा देना बताया गया है, जबकि कांग्रेस ने जमीन के इस्तेमाल और निजी निवेश से जुड़े सवाल उठाए हैं।
अंकिता भंडारी मामले में तीन दोषियों की उम्रकैद और उनकी जमानत याचिकाओं के खारिज होने के बावजूद कथित VIP एंगल को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है।
ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में बिजली परियोजना, सरकारी जमीन, निवेश, कानून-व्यवस्था और अंकिता भंडारी प्रकरण जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण राजनीतिक बहस का हिस्सा बने रह सकते हैं। फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि इन मुद्दों पर लगाए जा रहे आरोपों और सरकार के जवाबों को अलग-अलग दर्ज किया जाए और तथ्यात्मक निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों, जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाले जाएं।
