प्रयागराज: भगवान श्रीराम से जुड़ी आस्था और धार्मिक पर्यटन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले राम वन गमन पथ के निर्माण की गुणवत्ता को लेकर उत्तर प्रदेश में सवाल खड़े हो गए हैं। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किए जा रहे इस महत्वाकांक्षी मार्ग के कुछ हिस्सों में निर्माण के बाद सड़क धंसने की शिकायतों ने लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली और निर्माण की गुणवत्ता पर बहस छेड़ दी है। इसी बीच सड़क की बदहाली को लेकर सवाल पूछे जाने पर उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की कथित टिप्पणी—“सड़क बनेगी तो धंसेगी, धंसेगी तो बनेगी”—अब विवाद का केंद्र बन गई है।
राम वन गमन पथ को भगवान श्रीराम की वन यात्रा से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ने वाली परियोजना के रूप में देखा जाता है। इसका उद्देश्य धार्मिक स्थलों तक पहुंच आसान करने के साथ-साथ श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर सड़क सुविधा उपलब्ध कराना है। ऐसे में जिस परियोजना को आस्था, पर्यटन और बेहतर कनेक्टिविटी से जोड़कर देखा जा रहा है, उसमें सड़क के शुरुआती दौर में ही धंसने की खबरें सामने आने से निर्माण की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
निर्माण के कुछ समय बाद ही सड़क पर सवाल
आरोप है कि सड़क पर डामरीकरण का काम पूरा होने के कुछ ही समय बाद कई स्थानों पर सड़क धंसने लगी। कुछ जगहों पर सड़क की ऊपरी परत कमजोर दिखाई देने और डामर के साथ गिट्टियां निकलने की शिकायतें सामने आईं। इसको लेकर स्थानीय लोगों और मीडियाकर्मियों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर नई बनी सड़क इतनी जल्दी कैसे धंसने लगी? क्या सड़क निर्माण से पहले जमीन और बेस की पर्याप्त तैयारी की गई थी? क्या सड़क निर्माण में निर्धारित तकनीकी मानकों का पूरी तरह पालन किया गया? और अगर निर्माण में कोई कमी थी, तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?
इन सवालों का जवाब अब संबंधित विभाग और निर्माण एजेंसियों से मांगा जा रहा है।
डिप्टी सीएम के बयान ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
सड़क की गुणवत्ता पर सवाल पूछे जाने के दौरान डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की ओर से दिया गया कथित जवाब अब राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। “सड़क बनेगी तो धंसेगी, धंसेगी तो बनेगी” जैसे शब्दों को विपक्ष सरकार की कार्यशैली से जोड़कर देख रहा है।
विपक्ष का कहना है कि अगर किसी नई सड़क में निर्माण के तुरंत बाद समस्या सामने आती है तो सरकार को सबसे पहले उसकी तकनीकी जांच करानी चाहिए। निर्माण में कमी पाए जाने पर संबंधित ठेकेदार और अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सड़क की खराब गुणवत्ता पर सवाल उठाने के बजाय इस तरह की टिप्पणी समस्या को हल्का करके दिखाने की कोशिश है।
हालांकि, सड़क निर्माण से जुड़े तकनीकी कारणों की वास्तविक स्थिति का पता विस्तृत जांच के बाद ही चल सकता है। सड़क धंसने के पीछे कमजोर मिट्टी, पर्याप्त कॉम्पेक्शन न होना, जल निकासी की समस्या, बेस की गुणवत्ता, निर्माण सामग्री या अन्य तकनीकी कारण हो सकते हैं। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विशेषज्ञ जांच जरूरी है।
राम वन गमन पथ सिर्फ सड़क नहीं, आस्था से जुड़ा मार्ग
राम वन गमन पथ को लेकर सबसे संवेदनशील पहलू इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। चित्रकूट भगवान श्रीराम की वनवास यात्रा से जुड़े प्रमुख धार्मिक स्थलों में माना जाता है। यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
ऐसे में इस मार्ग की खराब गुणवत्ता का मुद्दा केवल सड़क निर्माण की तकनीकी समस्या नहीं माना जा सकता। श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा भी इससे सीधे जुड़ी है। अगर किसी महत्वपूर्ण धार्मिक मार्ग पर सड़क बार-बार खराब होती है या निर्माण के कुछ समय बाद ही धंसने लगती है, तो इससे यात्रियों को परेशानी के साथ-साथ सरकार की परियोजना की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।
क्या मरम्मत के नाम पर बढ़ता रहेगा सरकारी खर्च?
इस पूरे विवाद के बीच एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आया है—क्या सरकारी परियोजनाओं में निर्माण की गुणवत्ता पर पर्याप्त निगरानी हो रही है?
आम तौर पर नई सड़क के निर्माण के बाद उसका लंबे समय तक टिकाऊ रहना जरूरी माना जाता है। यदि सड़क बार-बार खराब होती है और हर बार उसकी मरम्मत पर सरकारी धन खर्च होता है, तो इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। इसलिए निर्माण के समय ही गुणवत्ता सुनिश्चित करना मरम्मत करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
यही वजह है कि अब लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि सड़क निर्माण के लिए जारी बजट का कितना हिस्सा वास्तविक निर्माण पर खर्च हुआ और गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर की गई।
जांच और जवाबदेही की उठ रही मांग
विवाद बढ़ने के बाद अब मांग उठ रही है कि राम वन गमन पथ के प्रभावित हिस्सों की तकनीकी जांच कराई जाए। सड़क के बेस, सामग्री, डामर की गुणवत्ता, जल निकासी व्यवस्था और निर्माण प्रक्रिया की जांच के साथ यह भी देखा जाए कि निर्माण एजेंसी ने निर्धारित मानकों का पालन किया या नहीं।
अगर जांच में निर्माण संबंधी खामी सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी तेज हो सकती है। साथ ही यह भी जरूरी है कि मरम्मत के बजाय सड़क को टिकाऊ बनाने के लिए समस्या की मूल वजह को दूर किया जाए।
फिलहाल राम वन गमन पथ की खराब हालत और डिप्टी सीएम के कथित बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है। एक तरफ सरकार के सामने धार्मिक और पर्यटन महत्व वाली परियोजना की गुणवत्ता बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे से जोड़कर सवाल उठा रहा है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और लोक निर्माण विभाग सड़क की गुणवत्ता को लेकर क्या कदम उठाते हैं। यदि सड़क निर्माण में वास्तव में तकनीकी कमी पाई जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा। क्योंकि राम वन गमन पथ केवल डामर और गिट्टी से बनी सड़क नहीं, बल्कि आस्था, पर्यटन और करोड़ों लोगों की भावनाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण मार्ग है।
