देश में बढ़ती चीनी की कीमतों और त्योहारों से पहले संभावित चीनी संकट को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा दावा किया है। सरकार ने साफ कहा है कि चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए इथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। सरकार के मुताबिक मौजूदा स्थिति के पीछे कम उत्पादन, गन्ने की फसल को नुकसान, मांग में बढ़ोतरी, जमाखोरी और कुछ स्थानों पर सट्टेबाजी जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। उपभोक्ता मामलों से जुड़े मंत्रालय का कहना है कि सरकार चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए लगातार बाजार की निगरानी कर रही है तथा कई बड़े कदम उठाए गए हैं।
हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में तेजी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर त्योहारों के सीजन से पहले मिठाई, खाद्य पदार्थ और घरेलू जरूरतों में चीनी की खपत बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे समय में कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में चीनी की कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 55.70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। इस बढ़ोतरी के बाद बाजार में चीनी की आपूर्ति और कीमतों को लेकर बहस तेज हो गई।
इथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना गलत, सरकार ने रखे आंकड़े
चीनी की बढ़ती कीमतों के पीछे इथेनॉल नीति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे थे। यह तर्क दिया जा रहा था कि गन्ने और चीनी का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने के कारण बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई है। हालांकि सरकार ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा है कि मौजूदा कीमतों में बढ़ोतरी के लिए इथेनॉल उत्पादन को मुख्य कारण बताना तथ्यों के अनुरूप नहीं है।
सरकार के अनुसार, इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन यानी चीनी को इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करने की हिस्सेदारी पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है। 2022-23 में जहां यह हिस्सा लगभग 12 प्रतिशत था, वहीं 2025-26 में इसके करीब 9 प्रतिशत रहने की बात कही गई है। इसका मतलब यह है कि चीनी उत्पादन का अपेक्षाकृत कम हिस्सा इथेनॉल की ओर गया है।
सरकार ने यह भी बताया कि अब देश में उत्पादित होने वाले इथेनॉल का बड़ा हिस्सा केवल गन्ने या चीनी से नहीं बनता। करीब तीन-चौथाई इथेनॉल अनाज, विशेष रूप से मक्के जैसे स्रोतों से तैयार किया जा रहा है। ऐसे में सरकार का तर्क है कि चीनी के दाम बढ़ने को सीधे तौर पर इथेनॉल नीति से जोड़ना सही तस्वीर पेश नहीं करता।
सरकार का कहना है कि इथेनॉल कार्यक्रम का उद्देश्य केवल ईंधन में मिश्रण बढ़ाना नहीं है, बल्कि अतिरिक्त कृषि उत्पादन का बेहतर उपयोग करना और किसानों तथा चीनी मिलों को आर्थिक स्थिरता प्रदान करना भी है। इसलिए मौजूदा चीनी संकट की वजह तलाशते समय उत्पादन, मौसम, फसल की स्थिति, मांग और बाजार की गतिविधियों जैसे सभी कारकों को एक साथ देखना जरूरी है।
आखिर क्यों पैदा हुआ चीनी का संकट?
सरकार के मुताबिक मौजूदा स्थिति के पीछे सबसे बड़ी वजहों में से एक चीनी उत्पादन का अनुमान से कम रहना है। इस बार गन्ने की फसल को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के साथ-साथ अधिक बारिश और जलभराव ने भी कुछ क्षेत्रों में फसल को नुकसान पहुंचाया।
गन्ना उत्पादन प्रभावित होने का सीधा असर चीनी मिलों की पेराई और कुल चीनी उत्पादन पर पड़ता है। शुरुआत में राज्यों की ओर से चीनी उत्पादन का अनुमान करीब 343 लाख टन लगाया गया था, लेकिन बाद में उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहने का अनुमान सामने आया। उत्पादन में इस अंतर ने बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई।
दूसरी तरफ त्योहारों का मौसम नजदीक आने के साथ चीनी की मांग भी बढ़ती है। मिठाई उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, होटल-रेस्तरां और घरेलू उपभोग में चीनी की खपत बढ़ने लगती है। जब उत्पादन उम्मीद से कम हो और मांग बढ़ने की आशंका बनी रहे, तो कीमतों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
सरकार ने यह भी माना है कि कुछ स्थानों पर जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसी गतिविधियों का असर बाजार पर पड़ सकता है। जब व्यापारी भविष्य में कीमतें और बढ़ने की उम्मीद में अधिक स्टॉक जमा कर लेते हैं, तो बाजार में उपलब्धता कम दिखाई देने लगती है। इससे वास्तविक या कथित कमी का माहौल बन सकता है और कीमतों में तेजी आ सकती है। इसी वजह से सरकार ने जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट सहित कई कदम उठाने का फैसला किया है।
उत्पादन कम, लेकिन घरेलू जरूरतों को लेकर सरकार आश्वस्त
उत्पादन अनुमान में कमी के बावजूद सरकार का कहना है कि देश में मौजूद चीनी स्टॉक घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। सरकार का दावा है कि अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक उपलब्ध स्टॉक से घरेलू मांग पूरी की जा सकती है।
भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में शामिल है। सामान्य परिस्थितियों में देश में सालाना लगभग 320 से 340 लाख टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 280 से 290 लाख टन के आसपास रहती है। ऐसे में सामान्य वर्षों में उत्पादन घरेलू खपत से अधिक रहता है और अतिरिक्त चीनी का प्रबंधन सरकार तथा चीनी उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
हालांकि इस बार उत्पादन कम होने और त्योहारों के कारण बढ़ती मांग की आशंका के चलते सरकार को बाजार पर विशेष निगरानी रखनी पड़ रही है। अधिकारियों का कहना है कि नया पेराई सीजन शुरू होने के बाद बाजार में नई चीनी की आवक बढ़ने से उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है।
दुनिया में भी चीनी की सप्लाई पर दबाव
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि चीनी की कीमतों में तेजी केवल भारत तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीनी की आपूर्ति और उत्पादन को लेकर दबाव बना हुआ है। 2026-27 के दौरान वैश्विक स्तर पर करीब 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान लगाया गया है।
वैश्विक बाजार में सप्लाई की आशंका का असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी दिखाई दिया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 30 जून को चीनी की कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर लगभग 552 डॉलर प्रति टन पहुंच गई। यानी करीब दो महीने के भीतर अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 16 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों का बढ़ना भारत जैसे बड़े उपभोक्ता और उत्पादक देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। यदि वैश्विक बाजार में चीनी महंगी होती है तो आयात की लागत बढ़ सकती है। इसी कारण घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और उत्पादन बढ़ाना सरकार के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
इथेनॉल नीति से किसानों और चीनी मिलों को क्या फायदा?
सरकार का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन को केवल चीनी की उपलब्धता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। जब देश में चीनी का उत्पादन जरूरत से अधिक होता है तो चीनी मिलों के पास भारी मात्रा में स्टॉक जमा हो जाता है। स्टॉक बढ़ने से मिलों की पूंजी फंस सकती है और इसका असर किसानों के गन्ना भुगतान पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में अतिरिक्त गन्ने या अन्य कृषि स्रोतों से इथेनॉल उत्पादन चीनी मिलों के लिए आय का एक अतिरिक्त साधन बन सकता है। सरकार का दावा है कि इथेनॉल कार्यक्रम ने मिलों की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की है, जिसका सकारात्मक प्रभाव किसानों के भुगतान पर भी पड़ा है।
20 अगस्त 2026 तक 2025-26 सीजन के गन्ना बकाये का लगभग 97 प्रतिशत भुगतान किसानों को किए जाने की जानकारी सामने आई है। सरकार का कहना है कि किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है और इथेनॉल से मिलने वाली अतिरिक्त आय ने चीनी मिलों की नकदी व्यवस्था को मजबूत करने में भूमिका निभाई है।
इसलिए सरकार का तर्क है कि इथेनॉल को चीनी संकट का ‘विलेन’ बताना एकतरफा निष्कर्ष होगा। सरकार के अनुसार, इस समय असली चुनौती उत्पादन में कमी, फसल को नुकसान, मांग में बढ़ोतरी और बाजार में जमाखोरी जैसी गतिविधियों से निपटने की है।
जमाखोरी रोकने के लिए सरकार के बड़े फैसले
चीनी की कृत्रिम कमी और जमाखोरी को रोकने के लिए सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं। सबसे महत्वपूर्ण फैसला चीनी कारोबारियों के लिए स्टॉक लिमिट लागू करना है। 1 अगस्त से 30 नवंबर 2026 तक चीनी कारोबारियों के लिए 400 टन की स्टॉक सीमा लागू की गई है।
इसके अलावा 1 सितंबर से बड़े खरीदारों के लिए भी नई व्यवस्था लागू की जाएगी। इसके तहत वे अपनी 15 दिन की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। सरकार का मानना है कि इससे बड़ी मात्रा में चीनी जमा कर कृत्रिम कमी पैदा करने की संभावना कम होगी।
केंद्र और राज्य सरकारों की टीमें भी चीनी मिलों और अन्य संबंधित प्रतिष्ठानों में जाकर स्टॉक की जांच कर रही हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपलब्ध चीनी को अनावश्यक रूप से रोककर बाजार में कीमतें न बढ़ाई जाएं।
10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी
घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन रॉ शुगर के ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति देने का फैसला किया है। इससे घरेलू बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराने में मदद मिलने की उम्मीद है।
सरकार ने राज्यों और चीनी मिलों से भी कहा है कि गन्ने की पेराई 15 अक्टूबर से शुरू करने की दिशा में तैयारी की जाए। सामान्य तौर पर अक्टूबर में चीनी उत्पादन लगभग 3 से 4 लाख टन के आसपास रहता है, लेकिन इस बार सरकार का अनुमान है कि उत्पादन बढ़कर 10 लाख टन से अधिक हो सकता है।
यदि नया पेराई सीजन तय समय पर शुरू होता है और उत्पादन उम्मीद के अनुरूप रहता है तो त्योहारों के दौरान बाजार में चीनी की उपलब्धता बेहतर हो सकती है। इससे कीमतों पर बने दबाव को कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है।
त्योहारों से पहले कीमतों पर सरकार की नजर
त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि चीनी की कमी का माहौल न बने और कीमतें अनियंत्रित न हों। चीनी का इस्तेमाल मिठाई से लेकर पेय पदार्थों और अनेक खाद्य उत्पादों में होता है। इसलिए कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर केवल घरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि छोटे व्यापारियों, मिठाई दुकानदारों और खाद्य उद्योग पर भी पड़ सकता है।
सरकार का कहना है कि वह उपभोक्ताओं और गन्ना किसानों दोनों के हितों में संतुलन बनाने का प्रयास कर रही है। एक तरफ उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य और समय पर भुगतान मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल सरकार का साफ संदेश है कि देश में चीनी संकट के लिए केवल इथेनॉल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उत्पादन में कमी, गन्ने की फसल पर बीमारी और मौसम का असर, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, जमाखोरी और वैश्विक बाजार में कीमतों की तेजी जैसे कई कारणों ने मिलकर मौजूदा स्थिति पैदा की है।
अब सरकार की रणनीति स्टॉक लिमिट, बाजार की कड़ी निगरानी, ड्यूटी फ्री रॉ शुगर आयात और नए पेराई सीजन को जल्द शुरू कराने पर केंद्रित है। आने वाले हफ्तों में इन कदमों का असर चीनी की उपलब्धता और खुदरा कीमतों पर कितना पड़ता है, यह देखने वाली बात होगी। आम उपभोक्ताओं की नजर अब इसी पर टिकी है कि त्योहारों के दौरान चीनी के दाम नियंत्रण में रहते हैं या बाजार में बढ़ती मांग कीमतों को और ऊपर ले जाती है।
