तीन तलाक पर 2017 में रोक के बाद अब तलाक की दूसरी प्रथाओं पर नजर, 10 मुस्लिम महिलाओं की याचिकाओं में उठे संवैधानिक अधिकारों के सवाल; जानिए कैसे अलग है तलाक-ए-हसन, तलाक-ए-अहसन, खुला और मुबारात
नई दिल्ली: मुस्लिम समुदाय में विवाह-विच्छेद यानी तलाक से जुड़ी कुछ प्रथाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस चल रही है। तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन जैसी प्रथाओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि धार्मिक व्यक्तिगत कानून और संविधान से मिले मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह तय किया जाए।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक ठहराया था, जिसके बाद केंद्र सरकार ने 2019 में कानून बनाकर इसे दंडनीय अपराध भी बनाया। अब अदालत के सामने सवाल यह है कि क्या मुस्लिम तलाक की अन्य प्रथाओं में भी महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता से जुड़े संवैधानिक सवाल पैदा होते हैं।
आपकी दी जानकारी के मुताबिक, इन याचिकाओं पर 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई प्रस्तावित है। इससे पहले फरवरी 2026 में भी सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की थी और कुछ मामलों में अंतरिम राहत तथा मध्यस्थता से संबंधित निर्देश दिए थे।
आखिर किस बात को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं महिलाएं?
इस पूरे विवाद के केंद्र में पत्रकार बेनजीर हीना समेत कई मुस्लिम महिलाओं की याचिकाएं हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि तलाक-ए-हसन जैसी प्रक्रिया में पति को विवाह समाप्त करने की ऐसी शक्ति मिल जाती है, जिसमें पत्नी की भूमिका बेहद सीमित हो सकती है।
बेनजीर हीना ने अपनी याचिका में तलाक-ए-हसन को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 के संदर्भ में चुनौती दी है। उनका तर्क है कि व्यक्तिगत कानून की किसी प्रथा की आड़ में महिलाओं के समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।
फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान भी तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता का मुद्दा सामने आया था। अदालत ने इस मामले को संवेदनशील बताते हुए तत्काल व्यापक रोक लगाने की मांग पर सावधानी बरती थी। कुछ मामलों में अदालत ने कथित तलाक-ए-हसन के प्रभाव को रोकते हुए संबंधित महिलाओं को अंतरिम राहत भी दी।
तलाक-ए-हसन क्या है?
सबसे पहले समझते हैं कि आखिर तलाक-ए-हसन होता क्या है।
इस्लामी विधि की पारंपरिक व्याख्याओं में तलाक-ए-हसन को तत्काल तीन तलाक से अलग माना जाता है। इसमें पति एक ही समय में तीन बार तलाक बोलकर विवाह खत्म नहीं करता। बल्कि तलाक की घोषणा अलग-अलग चरणों में की जाती है।
आम तौर पर तलाक-ए-हसन में पति द्वारा तलाक की घोषणा तीन अलग अवसरों पर की जाती है और इनके बीच प्रतीक्षा की अवधि रहती है। इस अवधि में पति-पत्नी के बीच सुलह या वैवाहिक संबंध बहाल होने की संभावना बनी रहती है। सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले में भी तलाक-ए-हसन को तीन प्रकार के तलाक में से एक के रूप में समझाया गया था और इसे तलाक-ए-बिद्दत से अलग बताया गया था।
यानी इसे केवल ‘तीन महीने में तीन बार तलाक’ कह देना पूरी कानूनी और धार्मिक प्रक्रिया की पूरी तस्वीर नहीं देता। इसमें समय का अंतर, इद्दत और पुनर्मिलन की संभावना जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं।
फिर तलाक-ए-अहसन क्या है?
तलाक-ए-अहसन को पारंपरिक इस्लामी कानून में तलाक के अपेक्षाकृत व्यवस्थित और ‘अहसन’ यानी बेहतर तरीके के रूप में बताया गया है।
इस प्रक्रिया में पति एक बार तलाक की घोषणा करता है और उसके बाद इद्दत की अवधि रहती है। यदि इस अवधि के दौरान पति-पत्नी फिर से साथ रहने का फैसला करते हैं और वैवाहिक संबंध बहाल हो जाते हैं, तो तलाक वापस लिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले में तलाक-ए-अहसन को एकल तलाक घोषणा के बाद इद्दत की अवधि से जुड़ी प्रक्रिया बताया गया है। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, इद्दत की अवधि आम तौर पर 90 दिन या महिला के मासिक चक्र से संबंधित अवधि के आधार पर समझी जाती है।
इसलिए तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-हसन दोनों को तत्काल तीन तलाक से अलग समझना जरूरी है।
तलाक-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक से कितना अलग?
यहीं पर सबसे बड़ा अंतर सामने आता है।
तलाक-ए-बिद्दत, जिसे आम भाषा में ‘तीन तलाक’ कहा जाता है, में पति द्वारा एक ही बैठक में तीन बार तलाक कहकर विवाह समाप्त करने की कोशिश की जाती थी। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा को बहुमत के फैसले से असंवैधानिक ठहराया था।
इसके बाद मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 के जरिए तत्काल तीन तलाक को कानूनी तौर पर अपराध बनाया गया। कानून के तहत ‘तलाक’ का ऐसा उच्चारण, चाहे मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो, अपराध के दायरे में आता है।
यही वजह है कि अब तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन को लेकर चल रही कानूनी बहस को 2017 के तीन तलाक फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है, हालांकि दोनों प्रथाओं की प्रक्रिया एक जैसी नहीं है।
क्या WhatsApp और ईमेल से भी तलाक दिया जा सकता है?
याचिकाओं में यह आरोप भी लगाया गया है कि कुछ मामलों में महिलाओं को WhatsApp, ईमेल या वकील के माध्यम से तलाक के नोटिस भेजे गए।
फरवरी 2026 की सुनवाई में भी अदालत के सामने ऐसे आरोपों का उल्लेख हुआ था। एक याचिका में महिला ने कथित तौर पर अपने पति की ओर से जारी तलाक-ए-हसन को चुनौती दी थी। अदालत ने उस मामले में कथित तलाक के प्रभाव पर रोक लगाते हुए महिला और उसके पति को वैवाहिक स्थिति बनाए रखने से जुड़ा अंतरिम निर्देश दिया था, जब तक पति वैध तलाक की प्रक्रिया साबित न करे।
इससे यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या किसी महिला को केवल एकतरफा नोटिस भेजकर विवाह की कानूनी स्थिति बदलने की कोशिश की जा सकती है, और यदि ऐसा किया जाता है तो महिला के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी।
हालांकि, किसी विशेष मामले में तलाक वैध है या नहीं, इसका फैसला उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर अदालत ही करती है।
क्या मुस्लिम महिलाएं खुद तलाक ले सकती हैं?
यह भी इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुस्लिम कानून में महिलाओं के लिए भी विवाह समाप्त करने के रास्ते मौजूद हैं।
इनमें ‘खुला’ प्रमुख रूप से जाना जाता है। इसमें पत्नी की ओर से विवाह समाप्त करने की पहल होती है और पारंपरिक रूप से पति-पत्नी के बीच सहमति तथा मुआवजे से जुड़े प्रश्न उठ सकते हैं। कई परिस्थितियों में महिला अदालत का भी रुख कर सकती है।
इसके अलावा ‘मुबारात’ एक ऐसा तरीका है जिसमें पति और पत्नी दोनों आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने के लिए तैयार होते हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि मुस्लिम कानून में केवल पुरुष को ही विवाह समाप्त करने का अधिकार है। हालांकि, महिलाओं की याचिकाओं का मुख्य सवाल यही है कि व्यवहार में उपलब्ध अधिकार कितने प्रभावी और समान हैं, खासकर तब जब पति एकतरफा तलाक की प्रक्रिया शुरू करता है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या है?
अब अदालत के सामने मूल सवाल धार्मिक प्रथा बनाम संविधान के अधिकारों के बीच संतुलन का है।
एक तरफ संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। दूसरी तरफ अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव के खिलाफ संरक्षण और अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसी व्यवस्था जारी नहीं रहनी चाहिए जिससे महिलाओं के साथ असमानता या अन्याय हो।
वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत कानून से जुड़े मामलों में अदालतों के सामने यह संवेदनशील सवाल भी रहता है कि धार्मिक प्रथाओं में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए।
2017 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
2017 के ऐतिहासिक तीन तलाक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तलाक की विभिन्न प्रथाओं के बीच अंतर स्पष्ट किया था। अदालत के रिकॉर्ड में तलाक-ए-अहसन को एक घोषणा और उसके बाद इद्दत की अवधि वाली प्रक्रिया तथा तलाक-ए-हसन को अलग-अलग अवसरों पर तलाक की घोषणाओं वाली प्रक्रिया के रूप में समझाया गया है। उस फैसले का मुख्य विवाद तलाक-ए-बिद्दत को लेकर था।
अब नई याचिकाओं में अदालत के सामने यह सवाल अलग रूप में आया है कि क्या तलाक-ए-हसन जैसी प्रथाओं की संवैधानिक समीक्षा की जानी चाहिए।
फैसला सिर्फ तलाक का नहीं, महिलाओं के अधिकारों का भी हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई केवल एक धार्मिक प्रथा की वैधता तक सीमित नहीं है। इसका असर भारत में मुस्लिम महिलाओं के वैवाहिक अधिकार, व्यक्तिगत कानून और लैंगिक समानता से जुड़े व्यापक विमर्श पर पड़ सकता है।
अगर अदालत इन प्रथाओं को संवैधानिक कसौटी पर परखती है तो आने वाले समय में मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों पर कानूनी बहस और तेज हो सकती है।
फिलहाल अदालत के सामने याचिकाएं हैं, दलीलें हैं और अलग-अलग मामलों के तथ्य हैं। अंतिम फैसला आने तक तलाक-ए-हसन या तलाक-ए-अहसन को लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
अब 27 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी नजर
तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि अदालत इन प्रथाओं को धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानून और मौलिक अधिकारों के बीच किस संवैधानिक कसौटी पर परखेगी।
फरवरी 2026 की सुनवाई में अदालत ने कुछ याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी थी और एक मामले में मध्यस्थता का रास्ता भी अपनाया गया था।
अब आगे की सुनवाई में सबसे ज्यादा नजर इस बात पर होगी कि क्या तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन को मौजूदा स्वरूप में संवैधानिक संरक्षण मिलता है या अदालत इनके इस्तेमाल में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कोई नई कानूनी सीमा तय करती है।
एक बात स्पष्ट है—2017 में तीन तलाक पर आए ऐतिहासिक फैसले के बाद मुस्लिम विवाह-विच्छेद की प्रथाओं पर कानूनी बहस खत्म नहीं हुई थी। अब तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस बहस का अगला बड़ा अध्याय बन सकती है।
