रांची: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राज्यव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है। राजधानी रांची की सड़कों पर हजारों अभ्यर्थी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और आयोग के खिलाफ जोरदार नारेबाजी कर रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं रही और परिणाम घोषित होने के बाद सामने आए तथ्यों ने भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यही वजह है कि आंदोलन दिन-ब-दिन तेज होता जा रहा है और अब यह केवल परीक्षा तक सीमित न रहकर पूरे भर्ती तंत्र की निष्पक्षता का मुद्दा बन चुका है।
रिजल्ट जारी होते ही शुरू हुआ विवाद
झारखंड लोक सेवा आयोग ने संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा आयोजित करने के बाद 2 जुलाई को परिणाम घोषित किए थे। परिणाम सामने आने के तुरंत बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने OMR शीट और मूल्यांकन प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप लगाए। छात्रों का कहना है कि कई अभ्यर्थियों के अंक और OMR रिकॉर्ड में मेल नहीं है, जिससे परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए।
इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया कि परीक्षा आयोजित कराने का जिम्मा ऐसी एजेंसी को दिया गया, जिसे पहले ब्लैकलिस्ट किया जा चुका था। इन आरोपों के सामने आने के बाद मामला गंभीर हो गया और सरकार ने इसकी जांच सीआईडी (CID) को सौंप दी। जांच शुरू होने के बाद कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और तकनीकी पहलुओं की पड़ताल की जा रही है।
JPSC अध्यक्ष का इस्तीफा, जांच हुई तेज
विवाद की आंच सीधे झारखंड लोक सेवा आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते तक पहुंची। सीआईडी ने आयोग कार्यालय में छापेमारी की और जांच का दायरा बढ़ाया। इसी बीच 22 जुलाई को एल. खियांग्ते ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
सूत्रों के अनुसार, इस मामले में अब तक 10 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और सीआईडी लगातार अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी कर रही है। जांच एजेंसियां परीक्षा से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और एजेंसियों की भूमिका की गहन जांच कर रही हैं।
क्या हैं अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगें?
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का कहना है कि केवल दोषियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं—
- पूरे मामले की CBI से जांच कराई जाए।
- JPSC और JSSC द्वारा पिछले सात वर्षों में कराई गई सभी भर्ती परीक्षाओं की जांच हो।
- इस वर्ष आयोजित संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा को पूरी तरह रद्द कर दोबारा परीक्षा आयोजित की जाए।
- OMR शीट में “Not Attempted” (पांचवां विकल्प) जोड़ा जाए ताकि मूल्यांकन में किसी प्रकार की तकनीकी त्रुटि न हो।
- परीक्षा प्रणाली में पूरी पारदर्शिता लाने के लिए नई तकनीकी व्यवस्था लागू की जाए।
अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जातीं, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।
मुख्यमंत्री के इस्तीफे की भी उठी मांग
प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस्तीफे की भी मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि राज्य की सबसे महत्वपूर्ण भर्ती परीक्षा में इतनी बड़ी अनियमितता हुई है, तो इसकी नैतिक जिम्मेदारी सरकार को लेनी चाहिए।
हालांकि सभी प्रदर्शनकारी इस मांग से सहमत नहीं हैं, लेकिन विपक्ष से जुड़े कई छात्र संगठन आंदोलन में शामिल होकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इससे आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है।
सोशल मीडिया पर आंदोलन बना चर्चा का विषय
रांची की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। हजारों छात्रों की मौजूदगी, शांतिपूर्ण धरना और लगातार उठ रही मांगों ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। विभिन्न छात्र संगठनों और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवाओं ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से आंदोलन का समर्थन किया है।
भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और विश्वास का प्रश्न बन गया है। यदि जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो भविष्य में भर्ती परीक्षाओं के संचालन, मूल्यांकन प्रणाली और परीक्षा एजेंसियों के चयन को लेकर सख्त नियम बनाए जा सकते हैं।
फिलहाल पूरे राज्य की नजर सीआईडी जांच और सरकार के अगले कदम पर टिकी है। वहीं अभ्यर्थियों का साफ कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा। ऐसे में JPSC परीक्षा विवाद आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बना रह सकता है।
