देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, जो कभी अपनी स्वच्छ आबोहवा, शांत वादियों और लीची के बागों के लिए दुनिया भर में मशहूर थी, आज एक गंभीर पर्यावरणीय और प्रशासनिक संकट के मुहाने पर खड़ी है। शहर के बीचों-बीच स्थित कारगी चौक डंपिंग जोन अब केवल एक स्थानीय समस्या या नगर निगम का सिरदर्द नहीं रह गया है, बल्कि यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक बड़ा राष्ट्रीय मामला बन चुका है। आम नागरिकों के स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार पर गहराते संकट को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले में बेहद कड़ा और सख्त रुख अख्तियार किया है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने देहरादून के जिलाधिकारी (DM) को एक आधिकारिक पत्र भेजकर कारगी चौक डंपिंग जोन देहरादून की वर्तमान स्थिति, इससे जनता को हो रही परेशानी और इस पर की गई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर चार सप्ताह के भीतर ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ (ATR) तलब की है। एनएचआरसी के इस औचक और कड़े दखल के बाद शासन से लेकर नगर निगम तक के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है, क्योंकि सालों से फाइलों में दफन और आश्वासनों के सहारे चल रहा यह संवेदनशील मुद्दा अब सीधे देश की सर्वोच्च मानवाधिकार संस्था की सीधी निगरानी में आ गया है।
एक सजग नागरिक की पहल और NHRC का संज्ञान
इस पूरे कानूनी और प्रशासनिक घटनाक्रम की शुरुआत देहरादून के ही एक सजग निवासी मनीष गुप्ता की शिकायत से हुई। मनीष गुप्ता ने इस कचरा घर से उत्पन्न होने वाले गंभीर स्वास्थ्य खतरों, बदबू और प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया था। उनकी इस जनहित से जुड़ी शिकायत पर त्वरित संज्ञान लेते हुए आयोग ने 19 जून को एक महत्वपूर्ण और कड़ा पत्र जारी किया।
आयोग ने अपने पत्र में बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि शहर के बिल्कुल मध्य में, जहां अंतरराज्यीय बस अड्डा (ISBT), कई प्रतिष्ठित स्कूल, घनी आबादी वाले आवासीय क्षेत्र और व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित हैं, वहां इस तरह के ओपन डंपिंग ग्राउंड का संचालन करना आम नागरिकों के जीने के अधिकार (Article 21) का स्पष्ट उल्लंघन है। आयोग का मानना है कि यह डंपिंग जोन लोगों के स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार पर अत्यंत प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है, जिसे किसी भी सभ्य समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था में लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
शहर के सीने पर सुलगता कचरे का ढेर: धरातल की हकीकत
अगर हम कारगी चौक डंपिंग जोन देहरादून की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति को देखें, तो प्रशासनिक अदूरदर्शिता साफ तौर पर उजागर होती है। यह डंपिंग ग्राउंड किसी सुदूर या निर्जन इलाके में नहीं, बल्कि देहरादून के सबसे व्यस्त प्रवेश द्वारों में से एक, आईएसबीटी के ठीक पास और नेशनल हाईवे से सटा हुआ है। रोजाना हजारों की संख्या में देश-विदेश से आने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग यहां से गुजरते हैं, जिन्हें राजधानी में प्रवेश करते ही कचरे के विशाल पहाड़ों और हवा में तैरती असहनीय दुर्गंध का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल उत्तराखंड की ‘टूरिज्म हब’ वाली वैश्विक छवि धूमिल हो रही है, बल्कि यह पूरा क्षेत्र एक साइलेंट ‘टाइम बम’ बन चुका है।
इस डंपिंग जोन के आसपास की दर्जनों कॉलोनियों में रहने वाले हजारों परिवारों का जीना मुहाल हो चुका है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि हवा का रुख बदलते ही पूरे इलाके में सड़ांध फैल जाती है, जिससे घरों में बैठना तक दूभर हो जाता है। मानसून के दिनों में तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब कचरे से निकलने वाला जहरीला और संदूषित पानी (लीचेट) रिसकर जमीन के अंदर जाने लगता है, जिससे भूजल के दूषित होने का खतरा पैदा हो गया है। आसपास के स्कूलों में पढ़ने वाले मासूम बच्चों के स्वास्थ्य पर इसका सबसे घातक असर पड़ रहा है। सांस की बीमारियां, फेफड़ों में संक्रमण, त्वचा रोग, और हर साल फैलने वाले मलेरिया-डेंगू जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा यहां के लोगों पर हर वक्त मंडराता रहता है।
बैकफुट पर प्रशासन: नगर निगम से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस सख्त और अल्टीमेटम वाले तेवरों को देखते हुए देहरादून के जिलाधिकारी ने तुरंत एक्शन मोड में आते हुए नगर निगम देहरादून के अपर नगर आयुक्त से इस पूरे मामले में एक विस्तृत और बिंदुवार रिपोर्ट तलब की है। जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया है कि नगर निगम को अब कागजी दावों से हटकर यह बताना होगा कि आखिर कारगी चौक डंपिंग जोन देहरादून को लेकर अब तक धरातल पर क्या ठोस कदम उठाए गए हैं?
इसके साथ ही, आयोग के निर्देशों के क्रम में इस डंपिंग ग्राउंड को शहर की घनी आबादी की सीमा से बाहर किसी अन्य उपयुक्त और वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित (Shift) करने की भविष्य की क्या कार्ययोजना है, इसका पूरा खाका मांगा गया है। प्रशासनिक हलकों में इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज है कि अब तक केवल ‘जल्द कार्रवाई होगी’ का खोखला आश्वासन देने वाले अधिकारी इस बार असमंजस में हैं, क्योंकि चार हफ्ते की समयसीमा बेहद कम है और एनएचआरसी को दी जाने वाली रिपोर्ट में किसी भी प्रकार की टालमटोल या लफ्फाजी भारी पड़ सकती है।
सालों पुराना जन-आक्रोश और सियासत का केंद्र
कारगी डंपिंग जोन का मुद्दा देहरादून के इतिहास में कोई नया नहीं है। पिछले एक दशक से स्थानीय जनता, पर्यावरणविद और विभिन्न सामाजिक संगठन इस कचरा घर को यहां से हटाने की मांग को लेकर लगातार आंदोलन, क्रमिक अनशन, धरना और प्रदर्शन करते आ रहे हैं। समय-समय पर यह मुद्दा स्थानीय राजनीति का मुख्य केंद्र भी बनता रहा है।
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस डंपिंग ग्राउंड के विरोध में कई बार नगर निगम और राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला है, उग्र प्रदर्शन किए हैं और पुतले भी फूंके हैं। इसके बावजूद, अब तक इस दिशा में कोई ठोस या परिणामोन्मुखी कदम नहीं उठाया जा सका। देहरादून नगर निगम हर बार एक ही रटा-रटाया तकनीकी तर्क सामने रखता आया है कि “वैकल्पिक भूमि की तलाश की जा रही है और फॉरेस्ट क्लीयरेंस या अन्य तकनीकी अड़चनों के कारण देरी हो रही है।” लेकिन कड़वा सच यह है कि इच्छाशक्ति की कमी के कारण राजधानी के माथे से यह बदबूदार कलंक नहीं मिट पाया है, जबकि इस बीच क्षेत्र में अनियोजित विकास के कारण आबादी का घनत्व कई गुना बढ़ गया है।
क्या अब बदलेगी सूरत? उम्मीद की नई किरण
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस ऐतिहासिक और कड़े हस्तक्षेप के बाद देहरादून की त्रस्त जनता में एक बार फिर यह उम्मीद जगी है कि शायद अब उनके इस नरकीय जीवन का अंत होगा और उन्हें साफ हवा नसीब हो सकेगी। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि स्वच्छ पर्यावरण में सांस लेना और स्वस्थ जीवन जीना कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि भारत के संविधान द्वारा हर नागरिक को दिया गया बुनियादी अधिकार है।
सरकार और नगर निगम को अब पारंपरिक बहानों और फाइलों को घुमाने की आदत से आगे बढ़कर, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स (ठोस कचरा प्रबंधन नियम) के तहत इस कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करना होगा और इस पूरी साइट को ‘बायो-माइनिंग’ के जरिए रीस्टोर करना होगा। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि देहरादून जिला प्रशासन और नगर निगम चार हफ्ते के भीतर एनएचआरसी के समक्ष क्या ठोस रिपोर्ट पेश करते हैं। क्या इस बार वाकई जमीन पर कोई बड़ी तब्दीली देखने को मिलेगी, या फिर देहरादून की जनता को हमेशा की तरह इसी बदबूदार और बीमार माहौल में जीने के लिए छोड़ दिया जाएगा? यह आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन एनएचआरसी के इस हंटर ने सोते हुए प्रशासनिक सिस्टम को हिलाकर जरूर रख दिया है।
