पिथौरागढ़: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। पिछले कुछ दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश के कारण थल-मुनस्यारी मोटर मार्ग पर स्थित हरड़िया की पहाड़ी अचानक दरक गई। पहाड़ी से गिरे भारी-भरकम बोल्डर और मलबे के कारण रामगंगा नदी का प्राकृतिक प्रवाह पूरी तरह रुक गया है। नदी का रास्ता रुकने से वहाँ एक विशालकाय कृत्रिम झील बन गई है, जिसका जलस्तर रविवार को बढ़कर करीब 800 मीटर तक पहुँच गया है। इस आपदा ने स्थानीय प्रशासन और नदी के निचले इलाकों में रहने वाले सैकड़ों ग्रामीणों की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
5 गांवों की आबादी पर संकट, सहमे हैं लोग
रामगंगा नदी का रुकना सिर्फ एक भौगोलिक घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे सैकड़ों जिंदगियों का खौफ छिपा है। इस मलबे के कारण बनी झील का आकार अब लगातार भैंसकोट गांव की तरफ बढ़ रहा है। इस वजह से नदी के तटवर्ती और निचले इलाकों में बसे भैंसखाल, बासगुन, और छीपा समेत पाँच गांवों की लगभग 600 से 700 की आबादी पर सीधे तौर पर डूबने या अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है।
ग्रामीणों की रातें अब खौफ के साए में कट रही हैं। उन्हें डर है कि यदि पहाड़ों से और मलबा गिरा, या झील का यह कच्चा बांध अचानक टूट गया, तो निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है। स्थानीय निवासी सरकार और प्रशासन से लगातार गुहार लगा रहे हैं कि पानी की सुरक्षित निकासी के इंतजाम जल्द से जल्द किए जाएं।
बह गए पुल, टूट गया बागेश्वर और पिथौरागढ़ का संपर्क
4 जुलाई को हुई रिकॉर्ड तोड़ बारिश इस आपदा की मुख्य वजह बनी। रातीगाड़ और हरड़िया की ये पहाड़ियाँ लंबे समय से बेहद संवेदनशील और भूस्खलन प्रभावित रही हैं। इस बार जो मलबा गिरा, उसने न सिर्फ नदी को रोका बल्कि नदी का जलस्तर बढ़ते ही रामगंगा पर बने अस्थायी पुल भी ताश के पत्तों की तरह बह गए।
ये पुल सिर्फ लोहे या लकड़ी के ढांचे नहीं थे, बल्कि पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों के सीमावर्ती ग्रामीणों के लिए दैनिक जीवन की जीवनरेखा थे। रोज़गार, राशन और इलाज के लिए लोग इन्हीं पुलों के सहारे आवाजाही करते थे। अब पुल बहने से लोगों को मीलों लंबा वैकल्पिक रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे दैनिक जीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया है।
पुराना है हरड़िया की पहाड़ी का नासूर: क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
यह पहली बार नहीं है जब रामगंगा नदी के सीने पर इस तरह का संकट आया हो। स्थानीय भूगोल और इतिहास पर नज़र डालें तो साल 2013 की केदारनाथ आपदा के समय, फिर 2016 और हाल ही में 2024 में भी यहाँ इसी तरह की झीलें बन चुकी हैं।
भूवैज्ञानिकों और आपदा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि ऐसी कच्ची झीलें ‘टाइम बम’ की तरह होती हैं। यदि इन पर जमा पानी का दबाव एक सीमा से अधिक हो जाता है, तो ये अचानक फट जाती हैं। ऐसे में ‘फ्लैश फ्लड’ (अचानक आने वाली बाढ़) का खतरा पैदा होता है, जो अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को मलबे में तब्दील कर देता है।
प्रशासनिक मुस्तैदी और आगे की रणनीति
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। मुनस्यारी के एसडीएम डॉ. ललित मोहन तिवारी ने खुद हरड़िया समेत सभी संवेदनशील इलाकों का मौका-मुआयना किया है। उन्होंने बताया कि स्थिति की गंभीरता से जिला मुख्यालय को अवगत करा दिया गया है और प्रभावित क्षेत्रों में चौबीसों घंटे निगरानी (मॉनिटरिंग) बढ़ा दी गई है।
दूसरी तरफ, सिंचाई विभाग के अपर सहायक अभियंता एसएस बिष्ट और अवर अभियंता विनय रावत की तकनीकी टीम ने भी घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया है। अधिकारियों के मुताबिक, झील के पानी को सुरक्षित तरीके से बाहर निकालने (चैनल क्रिएशन) के लिए एक नया तकनीकी आकलन तैयार कर प्रशासन को भेजा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के खतरे को टालने के लिए हरड़िया नाले का स्थायी चैनलाइजेशन किया जाना बेहद ज़रूरी है। फिलहाल, प्रशासन और ग्रामीण दोनों की नज़रें रामगंगा के थमे हुए पानी और आसमान के मिजाज पर टिकी हैं।
